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मनमोहना… कान्हा सुनो ना…

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प्रेम, प्रतीक्षा, प्रारब्ध और पीड़ा यात्रा है… और मिलन एक चमत्कार जो सिर्फ चयनित लोगों के लिए सुरक्षित स्थान है… एक ऐसा स्थान जो इस धरती पर नहीं, ब्रह्माण्ड में किसी ऐसे स्थान पर होता है जहाँ तक पहुँचने की असुरक्षित और टूट जाने तक की यात्रा में जीते हुए भी मनुष्य के अवचेतन में स्थित इसकी झलक कभी बिसराती नहीं… उसकी पुन: प्राप्ति के लिए वह सारी पीड़ा भोगने को आतुर होता है… कभी होश पूर्वक, कभी अज्ञानता में…

कोई पीड़ा है… कोई प्रतीक्षा है… लेकिन वह पीड़ा क्या है, प्रतीक्षा किसकी है इससे अनभिज्ञ मनुष्य बार बार श्री हरि के चरणों में गिर गिर पड़ता है… कि हे प्रभु…

इक पल उजियारा आये,
इक पल अँधियारा छाये,
मन क्यूं ना घबराये,
कैसे ना घबराये..
मन जो कोई कान्हा अपनी राहों में पाए
कौन दिशा जाए
तुम बिन कौन समझाए…

मनमोहना… मनमोहना…
कान्हा सुनो ना…
तुम बिन पाऊं कैसे चैन…
तरसूं तुम्हीं को दिन रैन…

भक्त की पुकार बहुत निश्छल होती है, उसे यह नहीं पता कि उसे कहीं पहुंचना है, वह तो बार बार अपने प्रभु को ही पुकारता है कि…

छोड़ के अपने काशी-मथुरा
आके बसो मोरे नैन
तुम बिन पाऊं कैसे चैन… कान्हा….
तरसूं तुम्ही को दिन-रैन

कहते हैं यह संसार मात्र दो विभागों में ही विभाजित है… नर और नारी… पुरुष और प्रकृति … क्षोभ-आनंद, प्रतिकूल-अनुकूल, बाधक-साधक, कनिष्ठ-श्रेष्ठ,पाप-पुण्य, मृत्यु-जीवन, बंधन-मोक्ष… यह दो ही प्रकार है जो विभिन्न रूपों में इस स्थावर-जंगमात्मक जगत में विस्तारित है….

इसलिए मनुष्य की पूरी यात्रा इस दो से एक हो जाने की है… बहुत कम लोग उस परम अवस्था को पाते हैं जिसे हम अर्धनारीश्वर कहते हैं और उस अवस्था में इस ज्ञान को प्राप्त करते हैं कि शिव और शक्ति दो स्वरूप होने पर भी ज्ञान के आत्मस्फुरण से चितशक्ति का बहि स्फुरण होता है… इसलिए इस जगत में जो कुछ भी संचालित होता दिखाई देता है वह उस शक्ति का ही बहि-प्रसरण है…

जब तक यह दो भासते हैं तब तक ही ये सारे विपरीत एक दूसरे को आकर्षित करते हैं… और यह आकर्षण ही है जो एक दूसरे में विलीन होकर एक के प्राकट्य के लिए प्रयासरत है…

तो यह जो आकर्षण कभी हमें आत्मा का दिखाई देता है, तो कभी मात्र देह का दिखाई देता है वह सबकुछ उस प्रक्रिया का अभिन्न अंग है… इसलिए इसमें ग्लानि भाव नहीं आना चाहिए. परन्तु यदि यह मात्र कामना और वासना के दमन और शमन के कारण के लिए है तो यह ऊर्जा के क्षय से अधिक कुछ नहीं…

इसलिए इस ज्ञान की प्राप्ति तक की यात्रा के कई मार्ग होते हुए भी सामान्य मनुष्य के लिए एक सबसे सरलता से उपलब्ध मार्ग दिया गया है जिसे प्रेम मार्ग कहते हैं, जिसमें भक्ति स्वत: ही सम्मिलित हो जाती है…

एक स्त्री की देह में जन्म लेने के कारण जो मुझे अनुभव होता है वह यही कि मैं भी उन बहुत सामान्य मनुष्यों में से ही हूँ, जिसे प्रेम मार्ग में नितांत अकेला छोड़ दिया गया है… सांसारिक दृष्टि से सारी उपलब्धता के बाद भी मन से एक करुण आर्तनाद निकलता है कि…

रास रचइया वृन्दावन के गोकुल के वासी
राधा तुम्हरी दासी
दरशन को है प्यासी
श्याम सलोने नंदलाला कृष्णा बनवारी
तुम्हरी छब है न्यारी
मैं तो हूँ तन-मन हारी

यह तन और मन हार जाना, बहुत सांसारिक भासित होता है… कहने को एक फ़िल्मी गीत है परन्तु गीत भी तो मानुष मन से निकले सामान्य प्रश्न और संदेह ही तो है… जिसके लिए कई लोग मुझसे प्रश्न करते हैं कि… मन और आत्मा के प्रेम में तन क्यों हार जाने को विवश होता है…

जब तक यह भाव अंतर्मन से न जागे कि तन-मन सबकुछ वार देने को जी चाहे तब तक यह मात्र जीवन की निरंतरता के लिए उपयोग में आता है… या फिर सांसारिक भोग के अनुभव को भोगकर उसकी निरर्थकता जानने के लिए… और यह जानने के लिए कि अलग अलग व्यक्ति से प्रेम चाहे दैहिक हो या आत्मिक, करने के बाद भी ऐसा क्या है जो समाप्त नहीं होता, जिसका क्षय नहीं होता, जो हमेशा स्थिर रहता है… वह कई व्यक्तियों के जीवन में आने जाने के बाद भी समाप्त नहीं होता, वह प्रेम बाह्य कारकों से प्रभावित नहीं होता, तो वह प्रेम अवश्य ही किसी विशेष के लिए है…

लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि आप जब भी किसी के प्रेम में हैं तो यह सोचें कि नहीं यह प्रेम तो किसी विशेष के लिए है… बल्कि आपका हर प्रेम उस विशेष प्रेम को परिपक्व, गहन और उस विशेष प्रेम के प्रति समर्पण को ही समृद्ध करता है…

बहुत बड़े ग्रन्थ और पुस्तकों का मेरा कोई अध्ययन नहीं है, और यह भी मैं बार बार कहती हूँ मैंने कोई वेद उपनिषद नहीं पढ़ें तो पुस्तकें क्या कहती हैं यह मैं नहीं जानती… मेरी अपनी यात्रा के अपने अनुभव हैं, जो बहुत सामान्य मानुष के होते हैं, जिन्हें इन पुस्तकों में लिखी भाषा समझ नहीं आती… मुझे कोई मंत्र-पूजा पाठ नहीं आता…. जब मैं प्रेम की भावभूमि पर होती हूँ तो मेरे लिए तो कोई फ़िल्मी गीत भी उसी मंत्र की तरह काम करता है… और उसी तरह मेरी ऊंगलियों से फिसला हर शब्द मेरे लिए उसी हरि की कृपा है जो मुझे इन अनुभवों से गुज़ारता हुआ ही अपने पास बुला रहा है…

मेरे शब्दों को भी बस मेरी तरह प्रेम करना आता है और प्रेम के वशीभूत होकर वह अपना सबकुछ दांव पर लगा देते हैं… ऐसे में उन शब्द ऊर्जा पर सवार कौन कहाँ पहुँच रहा है उसका भी मुझे भान नहीं, ना ही मुझे अपने लिखे की परिपक्वता का विचार है… मिट्टी में खेलती किसी बालिका के हाथों से बनी मिट्टी की ही मूरत है, जिसमें वह अपने कान्हा को देखती है… और उससे कहती है….

मैं हूँ तुम्हारी,
है तुम्हारा ये मेरा जीवन
तुमको ही देखूं मैं, देखूं कोई दर्पण
बंसी बन जाउंगी, इन होठों की हो जाउंगी
इन सपनों से जल-थल
है मेरा मन आँगन…

तो जब भी कोई हृदय निश्छल होकर, बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के मात्र प्रेम के वशीभूत सबकुछ हार जाता है… तब ऐसे कई रास्ते खुलते हैं जो इन ग्रंथों और पुस्तकों की ओर जाते हैं जिसमें हमारे ऋषि मुनियों ने बहुत सारे रहस्य लिख छोड़े हैं… लेकिन उसके लिए भी इन सांसारिक रास्तों को पार करना आवश्यक है… बिना अनुभव का ज्ञान आपके व्यक्तित्व में एक और आवरण डालने के अलावा कुछ नहीं करता… और भक्ति अनावृत हो जाने का मार्ग है.. जहाँ कभी कभी वस्त्र रूपी आवरण भी छूट जाते हैं तो कभी देह रूपी आवरण को भी छोड़ना पड़ता है…

देह रूपी आवरण को छोड़ने के पूर्व ऐसे कई आवरण मैंने खुद से उतारे हैं… और सांसारिक जगत में लांछनों से बचाने के लिए मेरे कान्हा ने वैसे ही रहस्यमय आवरणों से मुझे सुरक्षित कर लिया… जिसे पांचाली को द्यूतगृह में दु:शासन के हाथों निर्वस्त्र होने से बचाने के लिए किया था… इसलिए ये ‘जीवन’ बार बार अपने मनमोहन के चरणों में गिर कर गाती है…

जीवन इक नदिया है
लहरो- लहरो बहती जाए
इसमें मन की नइया डूबे, कभी तर जाए
तुम ना खेवइया हो तो कोई तट कैसे पाए
मझदार बहलाये, तो तुम्हरी शरण आये
हम तुम्हरी शरण आये…

– माँ जीवन शैफाली

हे री सखी मंगल गावो री, धरती अम्बर सजावो री, आज उतरेगी पी की सवारी

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1 thought on “मनमोहना… कान्हा सुनो ना…”

  1. D.k.verma says:

    अद्भुत विश्लेषण

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