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अनोखी रात : क्या होगा कौन से पल में, कोई जाने ना

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मैं तुम्हारे लिखे एक-एक अक्षर पर पाँव धर पार कर लेती हूँ हर वो कविता जो तुम विरह की रात में लिखकर बहा देते हो बनारस के घाट पर… ताकि मुझ तक पहुँच न सके…

और उन्हीं अक्षरों को मैं यहाँ नर्मदा में पाँव डाले प्रतीक्षा की बेड़ी बना लेती हूँ… यही अंतिम बंधन है जो मुझे जीवन में रोके हुए है…

तुम जब भी मेरी यादों को विसर्जित करने किसी नदी के तट पर जाओ तो एक बार अवश्य पुकारना, मुझे नहीं, नदी के उस जल को… कहते हैं पानी की अपनी स्मृतियाँ होती हैं…

पिछले कई जन्मों से एक नदी प्यासी है, अपने सागर से मिलने को…

कभी किसी कविता को अवतरित होने पीड़ा की आवश्यकता हो तो जाना उस नदी के पास कि विरह के आंसू जो बहे नहीं संसार के भय से वो मैं उस नदी को दे आयी हूँ…

बस शर्त यही है कि इस बार अपनी उस कविता बनारस के घाट पर नहीं किसी सागर के तट को समर्पित कर देना… जो नदी अपने सागर से नहीं मिल पाती उसकी पीड़ा कम से कम उस सागर तक पहुंचे, क्योंकि नदी को तो फिर भी पता है कि उसकी यात्रा सागर तक है… सागर तो यह भी नहीं जानता उसका अंतिम ठिकाना क्या है….

ओह रे ताल मिले नदी के जल में
नदी मिले सागर में
सागर मिले कौन से जल में
कोई जाने ना

यात्रा सूरज, चन्द्रमा, धरती और गगन की नहीं होती, यात्रा तो उस प्यास की ही है जिसे न जाने कहाँ कहाँ से गुज़रकर उस तृप्ति तक पहुंचना होता है, जिसे अभी तक उसने जाना भी नहीं, अभी चखा तक नहीं, अभी पीया तक नहीं…

लेकिन क्या ये अद्भुत बात नहीं कि उस अज्ञात के पीछे हमने न जाने कितने ज्ञात समय को न्यौछावर कर दिया… चाहे वो एक क्षण को ही प्राप्त होकर फिर विलुप्त हो जाए… लेकिन उस एक क्षण को पाने के लिए हम कई जन्म उस पर वार देना चाहते हैं… मिलन का एक क्षण विरह के कई जन्मों से कीमती होता है इसलिए भी हमें विरह का मूल्य पता है और हम उसे भरपूर जी भी लेते हैं…

सूरज को धरती तरसे धरती को चंद्रमा
पानी में सीप जैसे प्यासी हर आत्मा
ओ मितवा रे…
बूंद छुपी किस बादल में
कोई जाने ना…

अज्ञात के प्रेम में हमें अपनी सारी पहचान खोना पड़ती है, ये हमसे बेहतर कौन जानेगा, जबकि हम यह भी नहीं जानते प्रेम का वास्तविक अर्थ विरह है या मिलन… प्रेम के प्रार्थना में बदल जाने की पूरी प्रक्रिया से गुज़रकर, चेतना में आए अभूतपूर्व परिवर्तन को अनुभव करने के पश्चात् भी हम आज तक जान न सके कि हमारी किस्मत का एक साझा क्षण निर्मित करने में अस्तित्व ने इतनी देर लगाई है वो वास्तव में निर्मित हो भी सका है या नहीं…

अन्जाने होंठों पर ये पहचाने गीत हैं
कल तक जो बेगाने थे जनमों के मीत हैं
ओ मितवा रे…
क्या होगा कौन से पल में
कोई जाने ना…

इन सब के बावजूद मैंने फिर भी एक बहुत अद्भुत बात तो जान ली है… और वो बात क्या है ये जानने के लिए कम से कम तुम्हें मुझ तक आना होगा… क्योंकि अस्तित्व के कान में मैंने हौले से यह बात कह दी है कि चाहे कुछ भी हो जाए मेरी अंतिम बात मुझसे तुम तक पहुँचने के लिए मुझे बीच में कोई माध्यम नहीं चाहिए…

– माँ जीवन शैफाली

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