Menu

गुड्डी मिली? : किरदार के भीतर और बाहर की दुनिया

0 Comments


जीवन में घटने वाली हर महत्वपूर्ण घटना एक फिल्म के समान होती है जिसकी स्क्रिप्ट नियति द्वारा पहले से लिख दी गयी है, साथ में आपका किरदार भी.

अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप अपना वास्तविक चरित्र उसमें लाए बिना उस किरदार को अपने अभिनय से कितना सशक्त बनाते हो.

बावजूद इसके कि कई बार आपको फिल्म का अंत मालूम नहीं होता लेकिन यह अनभिज्ञता की स्थिति ही अभिनेता के लिए एक मौका है जब वो अपना पूरा पूरा इस कदर किरदार को समर्पित कर दे कि फिल्म बनाने वाले को भी उसका अंत बदलना पड़ जाए.

और फिल्म देखने वालों को भी अचंभित होना पड़े कि इस शख्स से इस किरदार को इतनी कुशलता से निभा ले जाने की उम्मीद तो नहीं थी.

वरना अभिनेता तो शाहरुख़ भी है जो हर फिल्म में शाहरुख ही नज़र आता है और अभिनेता कमल हसन भी है जिसके किसी किरदार में कमल कहीं नज़र नहीं आता. और एक अभिनेता संजीव कुमार भी थे जो एक ही फिल्म में नौ अलग अलग भूमिकाएं निभाकर लोगों को दांतों तले ऊंगली दबवा देते थे.

और यदि कहीं फिल्म में सस्पेंस है तो फिर कहना ही क्या. ऐसी फिल्म एक ही बार देखने लायक होती है. जीवन में कुछ घटनाएं इतनी ही रहस्यमय होती हैं जो सिर्फ और सिर्फ एक ही बार घटित होती है. यहाँ पुनरावृत्ति जैसा कुछ नहीं हो सकता. तब नियति की स्क्रिप्ट पर आपका अभिनय ही है जो एक नया इतिहास रच देगा. उसके बाद उसको देख कर कई फ़िल्में बनेगी लेकिन उस पहली फिल्म सा जादू नहीं रच सकेगी.

यूं तो जीवन की हर घटना एक ही बार घटित होती है लेकिन हर घटना में इतना ही सस्पेंस और थ्रील हो ज़रूरी नहीं. कुछ घटनाएं कायनाती साज़िश कही जाती है जो कुछ विशेष चुने हुए लोगों के लिए ही आयोजित होती है. और वो विशेष होते ही इसलिए हैं कि उन्हें भी इस बात का ज्ञान होता है. इसलिए कहानी के साथ पूरा न्याय करते हुए भी अपनी नई संभावनाओं को खुद ही परखते रहते हैं और अपने ही अभिनय के साथ प्रयोग करते हुए नए आयामों को छू पाते हैं, एक नई रहस्यमयी कहानी में चुने जाने के लिए.

इसलिए जीवन में आनेवाली हर कहानी में पूरे साक्षीभाव के साथ उतरिये, अपने अभिनय से उसमें चार चाँद लगाइए. अंत मालूम हो तब भी दर्शकों को पता नहीं लगने दीजिये. और अंत नहीं मालूम तो फिर कहना ही क्या हर सीन के बाद पूरे आत्मविश्वास से कहिये पिक्चर अभी बाकी है दोस्त.

यूं तो उपरोक्त लिखीं बातें आपको मात्र दार्शनिक लगेंगी लेकिन जीवन में जो कुछ भी चमकता सा दिखे उसके पीछे के स्याह अँधेरे भी हैं, दीपक तले अँधेरा की तरह… यहाँ दो अन्य रचनाएं प्रस्तुत कर रही हूँ. एक राजेश जोशी की कविता और प्रणय कुमार का लेख जो यह साबित करता है कि आपके पास दोनों विकल्प हैं. आप चाहें तो रजत परदे के चमकते सितारों से सकारात्मक सन्देश ग्रहण कर सकते हैं. और आप चाहें तो उस नकारात्मक स्याह अँधेरे में खो भी सकते हैं, जिसको पार कर इन सितारों ने ये चमक पाई है.

किरदारों के बाहर

कहानी के
किरदारों के बाहर खड़ा हो कर देखती हूँ
तो मंद -मंद मुस्कुराती हूँ

एक लड़की भगवद्गीता गीता पढ़ती है
और सोचती है
जब सब फ़िज़ूल है
किसी बात के कोई मायने नहीं
अंत कुछ भी नहीं
तो क्यूँ न अभी मर जाया जाए

एक लड़की ‘मिली’ पिक्चर देखती है
अपने बाबू जी की छाती पे सर रख कर चुपके-चुपके रोती है
ऐसे कैसे बिछुड़ सकता है किसी से कोई
कभी बाबू जी नहीं रहेंगे
यह ख़ौफ़नाक ख़्याल सिहर जाता है उसे

एक लड़की माँ बनती है पहली बार
बेइंताह दर्द से गुज़रती है
सोचती है
फिर कभी नहीं बनेगी माँ
एक बच्चा ही काफ़ी है
कुछ साल बाद भूल जाती है सारा दर्द

एक लड़की बहुत डरती है अकेलेपन से
सहती रहती है सब ज़्यादतियाँ
सिर्फ़ एक स्पर्श की ख़ातिर
एक मीठे बोल की ख़ातिर
अपनी हद से गुज़र जाती है

वही लड़की लड़ती है अपना महाभारत
अकेले
अपने मन में, तन में, घर में
अर्जुन भी ख़ुद, कृष्ण भी ख़ुद
कहती है
बाबू जी जाओ, आराम से जाओ
बहुत दुःख भोग लिए
बहुत जी ली ज़िंदगी

अपनी बेटी को समझाती है
माँ बनना कितना ज़रूरी है
पूरी औरत बनने के लिए

अकेलापन रास आ गया है उसे
अपने आनंद में है, शांति में है
कोई ख़ौफ़ नहीं
किसी के साथ रहना बड़ा बे-आराम कर जाता है

भगवद्गीता गीता पढ़ती है
आँखें मूँद एक-एक शब्द ग्रहण करती है
सोचती है संस्कृत सीख लूँ तो मूल ग्रंथ पढ़ पाऊँगी

ज़िंदगी ड्रामा ही सही, शोर-शराबे से भरी ही सही
पर बेमतलब बिलकुल नहीं है
हमारी रूहें ख़ुद चुनती हैं अपनी ज़िंदगी, जैसी भी
ख़ुद को विकास के कुछ पायदान और ऊपर ले जाने के लिए
अंत अपने मूल में मिल जाने के लिए…

– राजेश जोशी

उपरोक्त लिखी कुछ दार्शनिक बातों के अलावा कुछ ऐसे कठोर यार्थार्थ भी हैं भी जो रजत परदे की चकाचौंध के पीछे की कहानी कहता है..

प्रणय कुमार कहते हैं –

यदि आपने ”गुड्डी” फ़िल्म देखी हो तो उसमें एक ओर रुपहले जगत के सम्मोहन में फँसे युवाओं को उससे बाहर निकलने की प्रेरणा दी गई है, तो दूसरी ओर पर्दे के पीछे काम करने वाले सच्चे नायकों की बेबसी की दास्तान भी सुनाई गई है.

जया भादुड़ी और उत्पल दत्त जैसे कलाकारों ने अपने अभिनय की संजीदगी से फिल्म के कथ्य में चार चाँद लगा दिए हैं.

आप जानते ही होंगें कि अभी भी हज़ारों-लाखों युवा फ़िल्मी दुनिया के चकाचौंध में फँसकर वास्तविकता से कोसों दूर एक काल्पनिक और वायवीय जीवन जी रहे हैं.

क्या आपने आज के कूल-ड्यूड पीढ़ी को यह कहते नहीं सुना कि-”ओहो, फ़लाना एक्टर, उसके लिए तो मैं जान भी दे सकती हूँ; ओहो, ढिमाका ऐक्ट्रेस-जिसे मिल जाए उसकी तो लाइफ़ बन जाय!”

मेरे नौजवान दोस्तों, लाइफ़ एक्टर-ऐक्ट्रेस जैसे लुभावने-मनमोहक चेहरों के प्रति दीवानगी दिखाने से नहीं बनती, न उनकी स्टाइल कॉपी करने से, न उन्हें अपना आदर्श बनाने से; लाइफ़ बनती है- आपकी सोच से, आपके व्यवहार से, आपकी मेहनत से, आपकी मौलिकता और रचनात्मकता से; लाइफ़ बनती है ख़ुद की खूबियों और कमज़ोरियों को जानने-समझने से; लाइफ़ बनती है – जो काम आपने चुना है, उसके प्रति जुनून या दीवानगी से; लाइफ़ बनती है- कल्पना और यथार्थ के बीच के अंतर को समझने से!

इसलिए नींद से जागिए और पर्दे पर जिए जा रहे और सचमुच के जीवन के अंतर को समझिए. यदि कॉपी ही करनी है तो कॉपी कीजिए उनकी मेहनत की, उनकी अदाकारी की, उनके संघर्ष की.

आज के हर नौजवान को एक बार ‘गुड्डी’ फ़िल्म ज़रूर देखनी चाहिए. यह जानने के लिए भी कि कहानी अगर हो तो अभिनय करना नहीं पड़ता, अभिनय स्वतः होता चला जाता है. और यह जानने के लिए भी कि हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती; जगमगाती पाँच सितारा ज़िन्दगी के पीछे के स्याह अँधेरे किस्से बड़े घिनौने और भयावह होते हैं.

मेरे नौजवान कूल-ड्यूड दोस्तों, असली नायक आपके आस-पास हैं. भले ही वे निहत्थे सैकड़ों खलनायकों की हड्डी-पसली एक न करते हों, भले ही वे हजारों गोलियों के बीच से सुरक्षित निकल दुश्मन का अंत न कर पाते हों; पर वे आपके सपनों को पूरा करने के लिए दिन को दिन और रात को रात नहीं समझते होंगे, आपके अरमानों को पूरा करने के लिए न जाने अपने कितने अरमानों का गला घोंटते होंगें, आपको एक दिन एक नई ख़ूबसूरत सुबह मिले इसके लिए न जाने कैसी-कैसी घनी काली भयावह रातों का सफ़र उन्होंने अकेले तय किया होगा.

ज़रा, एक बार उनकी आँखों में झाँककर तो देखिए, वहाँ उन पलकों की कोरों में आपके ही सपने पल रहे होंगे. ज़रा एक बार सोचकर तो देखिए, क्या आपके माता-पिता ने जो जिंदगी जी है, जो संघर्ष किए हैं, जो त्याग किया है, जो अरजा है, सिरजा है- वह किसी नायक से कम है??

आइए, नक़ली नायकों की जगह आज से ही असली नायकों अपने दिल में स्थान दें, मान दें, उन्हें सर ऊँचा कर चलने का मौका दें.

– प्रणय कुमार

– माँ जीवन शैफाली

Facebook Comments
Tags: , , ,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!