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सदमा : अंग्रेज़ी वर्णमाला का नौवां वर्ण ‘I’ यानी ‘मैं’ का खो जाना

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प्रेम का नफरत में बदल जाना, प्रेम में धोखा खाना, यहाँ तक कि प्रेम का मर जाना भी बर्दाश्त हो जाता है… नीलकंठ की तरह कंठ में इस पीड़ा को धारण किये भी कभी कभी इंसान पूरा जीवन गुज़ार लेता है.

कुम्भ के विशाल मेले में पिता की ऊंगली छूट जाने से खो गए किसी बच्चे को देखा है? प्रेम का दुनिया की भीड़ में खो जाना भी एक बार सहन हो जाता है, इस उम्मीद के साथ कि कोई न कोई पहुंचा ही देगा पिता तक…

लेकिन प्रेम की याददाश्त चली जाए तो कैसा लगता है…
यह बहुत बड़ा सदमा है… जिससे इंसान कभी उबर नहीं पाता …. कभी नहीं….

प्रेम का भूल जाना या भूला दिया जाना आकाशगंगा के आख़िरी ग्रह के धीरे धीरे विलुप्त हो जाने जैसा होता है… बचपन से पढ़ते आये थे सूर्य के आसपास नौ ग्रह चक्कर लगाते हैं… और अचानक उसका अंतिम ग्रह का ब्रह्माण्ड में खो जाना और ग्रहों का नौ से आठ हो जाना आकाशगंगा में भी एक खालीपन छोड़ जाता है… तो मन के आकाशगंगा से प्रेम रूपी ग्रह के ब्रह्माण्ड में विलीन हो जाने की पीड़ा क्या होती होगी….

इस भावभूमि पर बहुत सी कथाएँ हैं… जिसमें शकुंतला और दुष्यंत की कहानी से लेकर सिनेमा के परदे पर ‘सदमा’ फिल्म के रूप में हम देखते आये हैं… उस समय हमारी पूरी सहानुभूति उस व्यक्ति के लिए होती है जो प्रेम के खो जाने की पीड़ा को अनुभव कर रहा होता है…

शकुंतला तो फिर भी अपनी खोई मुद्रिका के कारण अपने प्रेम को वापस पा लेती है, परन्तु फिल्म सदमा के अंत में नायक कमल हसन दर्शक की सारी सहानुभूति समेटकर ले जाता है…

स्टेशन से छूटती नायिका की गाड़ी के आगे पुराने खेल और उट- पटांग मुंह बनाना भी कुछ याद दिलाने में असमर्थ होता है… उसने तो अपने इश्क को भी कभी ज़ाहिर नहीं होने दिया था तो उस इश्क़ की याद दिलाने के लिए उसके पास कोई अंगूठी भी कहाँ थी…

लेकिन न जाने क्यों मुझे कमल हसन से अधिक दयनीय स्थिति फिल्म की नायिका श्रीदेवी की लगती है… नायक को तो फिर भी प्रेम याद है, उसकी पीड़ा और मधुर यादों के सहारे वो पूरा जीवन गुज़ार लेगा लेकिन नायिका का खुद नवां ग्रह बन जाना उसे ब्रह्माण्ड के न जाने किस कोने में छोड़ आएगा कोई नहीं जानता….

अपने वास्तविक जीवन को भुलाकर जब वो नए जीवन में प्रवेश करती है, तो कितनी मासूम और प्रेम से भरी होती है…

नायक का कभी पिता बनकर, कभी दोस्त बनकर, कभी रक्षक बनकर उस पर प्रेम के हर रूप का बरसाना और अपने अन्दर के आशिक को हर बार मन के आकाशगंगा में सहेज लेना… भविष्य के किसी सुन्दर स्वप्न के रूप में… बहुत ही मार्मिक लगता है…

नायिका का जीवन अपने उद्गम से निकलती उस नदी की तरह हो जाता है… जिसे सिर्फ और सिर्फ अपने बहते रहने का स्वभाव याद हो… ना बाढ़ आ जाने की चिंता, ना सूखा पड़ने का भय… अपनी ही लहरों के साथ खेलती स्वच्छंद अल्हड़ प्रकृति… सबसे अलहदा जीवन…

वो जब अपने वास्तविक सभ्य समाज में लौटती है… तो उसे पता भी नहीं होता पीछे वो कितना सुन्दर और प्राकृतिक जीवन छोड़ आयी है… जैसे कोई व्यक्ति टाइम मशीन से पिछले जन्म के किसी काल को भरपूर जीकर वापस लौटे और उसे याद भी न हो कि वापस लौटने से उसने कितना कुछ खो दिया है…

बस प्रेम की याददाश्त का खो जाना कुछ ऐसा ही है… जैसे सिर्फ आपके लिए संख्या में से अचानक नौ नम्बर गायब हो जाए… आपको याद ही ना रहे के एक से लेकर शून्य तक की गिनती में नौ की संख्या भी होती है तो आप दुनिया के हिसाब में कहीं पर भी फिट नहीं बैठेंगे….

Alphabets का नौवां अक्षर “I” यदि आपको याद ही न रहे तो आपको कैसा लगेगा… “I” यानी “मैं” का हमेशा के लिए खो जाना….

यह सच में बहुत बड़ा सदमा है… जिससे इंसान कभी उबर नहीं पाता …. कभी नहीं….

– माँ जीवन शैफाली

 

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