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ऑक्टोबर : जीवन-अजीवन के महीन फ़र्क़ को सिखाती फिल्म

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धुँध से उठती एक महीन धुन, शाख़ पर खिलता फूल, टूट कर बिखरता चाँद हो या फिर पत्तों की सरसराहट; दरअसल भाषायी संस्कारों में ये सभी प्रकृति की अद्भुत लीला के प्रतीक भर हैं.

इस लीला से साक्षात्कार आपको अपनी ओर सिर्फ़ खींच ही नहीं लेता है वरन् बिठा लेता है अपने पास और जादू ऐसा कि आप उससे मुक्त ही ना हो पाए.

कुछ ऐसा जिसे देख – जी, शिउली के फूलों की महक सा कुछ, मुरार सा बहुत कोमल कुछ, आप विस्मृति से स्मृति की उस यात्रा में अपने साथ ले आए.

कुछ इतना कोमल कि जिसे आपने सहजता से व्यक्त नहीं किया तो वो खंडित हो जाएगा क्योंकि वह आपको चुप कर देता है. ऐसे ही किसी सुरूर में हूँ जो रोमावली से होकर रूह तक पहुँचा है. उस आत्मा की प्रकृति के इतना अनुकूल कि वहाँ ही रमा है अब तलक.

निर्मल वर्मा कहते हैं हम प्राय: लेखक के अकेले क्षणों की चर्चा तो करते हैं, कभी पाठक के एकान्त की बात नहीं करते. अक्टूबर इसी सूक्ति का अनुसरण कर दर्शक या पाठक के उस एकान्त पर सीधे दस्तक देती है.

कोमल भावों को बनावट की आवश्यकता नहीं होती. वे जितनी सहजता से खिलते हैं उतनी ही सहजता से झर भी जाते हैं, नि:शब्द. इस प्रक्रिया में बस कुछ शब्दों की प्रतिध्वनियाँ हैं जो स्थायी बनकर रह जाती है. यह स्थायित्व एक दु:ख का कारण तो किसी अन्य अपरिचित सुख का जन्मदाता बन जाता है। (Where is Dainn???)

ऑक्टोबर को देखना एक ख़ूबसूरत कविता का शब्द दर शब्द खुलना है. इसे अनुभव करना संचारी भाव से स्थायी भाव तक पहुँचने की यात्रा है जो क्षणिक नहीं गहरी चोट करती है आपके मानस पर.

हमारा सच, हमारा जीवन वह क़तई नहीं जिसे हम जी रहे हैं. इससे इतर सच वह है जो नीली चादर ओढ़ लेने पर आँख में पलता है, वह जिसका हम चयन नहीं कर पाए हैं, वह जो हमारे भीतर तो जीवित है; परन्तु जगत् की कृत्रिमता में कहीं खो गया है.

यह वह है जिसे हम सुनना तो चाहते हैं पर सुन नहीं पाए हैं. इतना कच्चा कि ठीक से अभिव्यक्त नहीं हो पाया तो टूट कर बिखर जाएगा.

अब तक रजत पटल पर भव्यता देखी, क्रूरता देखी, प्रेम का अतिरेक देखा पर किसी कविता को इतनी ख़ूबसूरती से जीवित होते नहीं देखा. खिड़की पर ठिठका चाँद हो, शीत नीरवता में झरता हरसिंगार हो या फिर वे छोटी -छोटी बातें जो जीवन का ईंधन हैं, जीने के लिए ज़रूरी हैं, इतनी कलात्मक सहजता से अरसे बाद देखी है. रूई के फ़ाहे के अहसास की मानिंद यह कहानी जीवन-अजीवन के महीन फ़र्क़ को सिखाती है.

शब्द आत्मा पर दस्तक देते हैं उनकी कीमिया कुछ ऐसी है कि देह चेरी की तरह उसके साथ हो लेती है, मीरा की ही तरह. कोई शर्त, कोई बात, कोई मुहर वहाँ फिर नहीं बच पाती. प्रेम को अनुभवों की आवश्यकता भी नहीं , वह बस घट जाता है और फिर एक मिसरी सी डली सा कुछ घुलता रहता है सतत. ऐसा कुछ जो साथ रहेगा अक्टूबर में खिलने और बाद मौसम बिखरने के बाद भी.

इसे देखते हुए अनेक साहित्यिक चरित्र बुदबुद से ज़ेहन में उठते-बैठते रहे. चाहे बात चेखव की कहानियों की हो, निर्मल वर्मा की हो या अपने ही कैमरे पर चढ़ी ख़ूबसूरत फ्रेमों की, परदे पर इन्हें हूबहू बिना किसी छेड़छाड़ के आप देख पा रहे हों तो एक चौंक तो उभरती ही है ना!

सुजित सरकार ने इस फ़िल्म को इतनी ख़ूबसूरती और यथार्थ के साथ हम सिरफिरे दर्शकों तक पहुँचाया है कि इसके लिए शुक्रिया कहना औपचारिकता भर है, दरअसल बात उसके कहीं आगे ठहरती है.

– विमलेश शर्मा

एक नज़र रिस्क@इश्क पर…

21वीं सदी के युवाओं का मिजाज़ समझने वाली इरा टाक जी ने रिस्क@इश्क के माध्यम से आज के युवाओं के अंदर जमे छोटे-छोटे अनकहे बोझों को उतारने की कोशिश की है – जो ना जाने कब से इश्क बन के हमारे जीवन में, हमारे रिश्तों में आकर बैठ गए थे.

इन कहानियों की सुंदरता की एक शब्द में समीक्षा नहीं की जा सकती. इसमें भाषा, कथ्य, उद्देश्य, पात्र बहुत बेहतर ढंग से प्रस्तुत किये गए हैं.

भाषा के स्तर से रिस्क@इश्क नॉवेल कहीं से वल्गर नहीं लगता. हिन्दी कहानियों को अंग्रेजी स्टाईल में जिस तरह से ‘बाज़ार की चीज़’ बनाने की होड़ मची है, ये उपन्यास उस अश्लीलता को कहीं से नहीं छूता. लेकिन बाजार का तो पता नहीं, हम 21वीं सदी के युवाओं के भीतर गहरे तक पैठता ज़रुर है.

बहुत दिनों बाद हिन्दी को ऐसी युवा लेखिका मिली है, आप रिस्क@इश्क की कहानियों को पढ़ के अपने मन के भीतर के द्वंद्व, अकेलेपन के भावों और प्राइवेट खालीपन में जन्मे एहसासों को किसी नदी के किनारे पहुंचा सकते हैं.

– शरद प्रताप सिंह

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