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मंटो…

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जब गुलाम थे तो आज़ादी का ख़्वाब देखते थे
और अब आजाद हैं तो कौन सा ख्वाब देखें??

फिल्म ‘मंटो’ का ट्रेलर रिलीज़ हुआ है कुछ दिन पहले, जिसमें मंटो के किरदार में ‘नवाजुद्दीन सिद्दीक़ी’ हैं, फिल्म का डायरेक्शन ‘नंदिता दास’ ने किया है। ट्रेलर में ये 2 लाइन सुनकर ही समझ आता है कि अंग्रेजों से आज़ादी के बाद मंटो के अंदर कोई और ख़्वाब भी था, वो था…….

विचारों की आज़ादी का! उन्हें पेश करने के क़ायदे को लेकर। जो जैसा है उसे वैसा कहने की आज़ादी। हर वो चीज़ जो समाज और माजरे का हिस्सा है, उन सब चीज़ों पर बात होनी चाहिए।

“सआदत हसन मंटो” उर्दू लिटरेचर का जाना – माना नाम है, जिनका लिखा गया अफ़साना खुद ही अपने आप में सत्यता का प्रमाण था। मंटो मतलब आईना; कोई लाग – लपेट नहीं। जो हम देख कर अनदेखा करते हैं उसी को लेकर वो बात करते थे।

उनका मानना था कि – ” मैं वही लिखता हूँ जो समाज में होता है, अब आपको मेरे अफ़साने पढ़ने- सुनने से ऐतराज़ है तो इसका मतलब यह है कि मुझे ऐसे समाज से ही ऐतराज़ है।”

मंटो का जन्म 11 मई 1912 को पंजाब के ‘समराला डिस्ट्रिक्ट’ के गाँव ‘पापरोड़ी’ में हुआ। उनके पिता एक बेरिस्टर थे। मंटो की पढ़ाई में शुरू से ही कोई ख़ास रूचि नहीं थी। उनका रुझान थिएटर की तरफ़ ज्यादा हो रहा था, कहानी सुनना, नाटकों का मंचन देखना इन सभी कामों में रूचि के चलते उन्होंने दोस्तों के साथ मिलकर खुद का ‘ड्रामा क्लब’ खोल लिया। वहाँ से उनका झुकाव नाटकों की रूपरेखा बनाने, उसका मंचन करने की तरफ हुआ। लेकिन उनका ड्रामा क्लब ज्यादा समय तक नहीं टिक सका; उनका ये सब करना उनके पिता को बिल्कुल भी नहीं भाता था।

उनका बचपन ‘भगत सिंह’ को देखकर बीत रहा था। मंटो भगत सिंह से काफी प्रभावित थे, उस समय चारों तरफ इंकलाब के नारे चल रहे थे । 13 मार्च 1919 के जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड ने उन पर बहुत गहरा प्रभाव डाला। बातों को समझने का नजरिया बदला और 19 वर्ष की उम्र में पहली कहानी “तमाशा” लिखी जो जलियांवाले बाग़ हत्याकांड को एक 7 साल के बच्चे की नज़र से बयान करती है।

लोग मंटो पर, उनकी कहानियों, अफसानों, निबंध, रेडियो आर्टिकल पर ऊँगली उठाते हैं, एक बार खुद अगर उनकी कहानी को मूल्यांकन करेंगे तो पायेंगे कि उन्होंने समाज के आईने को एक दूसरे आईने की आड़ लेकर दिखाया है, क्योंकि सच्चाई उससे भी भयानक थी, उसको सीधे नहीं देखा जा सकता था।

स्कूली पढ़ाई पूरी करके सत्र 1931 में ‘हिन्दू सभा कॉलेज’ में उन्होंने दाख़िला लिया। उस समय अमृतसर में क्रन्तिकारी माहौल चल रहा था। भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, आज़ाद उनके साथियों को जेल, इन्हीं घटनाओं से चारों तरफ हंगामा बरपा हुआ था। मंटो की सोच भी क्रांतिकारी होने लगी थी। मंटो के द्वारा लिखे गए ड्रामे “वीरा” को तो स्वयं ‘भगत सिंह’ भी स्टेज करना चाहते थे। एक साल के ही अंदर ही 1932 में भगत सिंह को फांसी दी गयी, और उसी समय मंटो के पिता का देहांत हो गया। जिससे मंटो वैचारिक और मानसिक रूप से टूट गए।

उनकी रूचि अब क्रांतिवादी सोच की तरफ बढ़ने लगी थी। पढ़ाई को जारी रखा और उन्हीं दिनों में उनकी मुलाक़ात ‘जर्नलिस्ट अब्दुल बारी’ से हुई जिन्होंने उनको रशियन और फ्रेंच लिटरेचर पढ़ने की सलाह दी। कई समय तक उन्होंने रशियन और फ्रेंच लिटरेचर पढ़ा। उन्होंने अपने लिट्रेचरी कैरियर की शुरुवात ही ‘विक्टर ह्यूगो’ के प्ले “the last day of condemn” को ट्रांसलेट करने से की ।

1934 में अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए मंटो ने ‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी’ में दाखिला लिया, उनका रुझान अब पूर्णतः लिखने में था इस दौरान उन्होंने कई जगह पत्र – पत्रिकाओं में लिखा। उन्हीं दिनों उनकी मुलाक़ात ‘अली सरदार ज़फ़री’ से हुई, जो कि एक उर्दू लेखक, कवि और कम्युनिस्ट थे। उनसे भी उन्होंने बहुत कुछ जाना; समाज के बारे में, समाज में व्याप्त रीतियों के बारे में जो कुरीतियों से 4 कदम आगे ही हैं। सच को सच कहने में कई इल्ज़ामात, जिल्लत का सामना करना पड़ा उन्हें। वो इसी तरह अपनी कहानियों से समाज में हो रही घटनाओं को दर्शाते थे।

उनकी कहानियों में औरत एक खिलौने की तरह होती थी , जो असल में उनकी दिमाग की उपज न होकर समाज में व्याप्त गंदगी और कुरीतियों के परिणामस्वरूप निकलती थी। औरत को मंटों की कहानी में किस तरह दर्शाया गया है इसे जानने के लिए ; मंटो की कहानी की उस औरत के किरदार के बारे में भी जानना जरुरी है न? बिना कहानी जाने आप सिर्फ औरत को ही टारगेट मानकर फैसला दें ये भी गलत होगा। मंटो की कहानी में दो औरतें कभी भी एक जैसी नजर नहीं आती थी, दोनों के किरदार उनका चाल – चलन अलग होता था। मंटो हमेशा एक मज़लूम का साथ देने वाले बेहतरीन इंसान रहे हैं, जो इंसान मज़लूम का साथ देने वाला हो वो भला कैसे औरत का निजी तौर पर अपमान कर सकता है।

सत्र 1936 में उनकी उर्दू कहानियों का पहला संग्रह “आतिशपारे” किताब के रूप में प्रकाशित हुआ । उसके बाद लिखने का सिलसिला चालू रहा । 1941 में “आल इंडिया रेडियो ” में कई लघु कहानी, निबंध लिखे जो बहुत ज्यादा सुने और पढ़े गए । मंटो का नाम अब लोगो की जुबाँ पर चढ़ रहा था । ये उनके लेखन का सबसे सुंदर पीरियड कहा जा सकता है । उनको हर जगह पढ़ा जा रहा था ।

लेकिन जहाँ तालियाँ पड़ रहीं थीं वहाँ गालियाँ भी खूब पढ़ने लगीं थी । मंटों अधिकांशतः उन बातों पर ही लिखते थे जिन पर समाज पर्दा डालता है। वो वैश्याओं, उनकी जीवनशैली के बारे लिखते थे । उनकी कहानी का हर एक किरदार चाहे वह पुरुष हो या स्त्री दोनों ही अभद्र भाषा और गाली का प्रयोग करते थे, जिस वजह से कई मुक़दमे उनके खिलाफ दर्ज किये गए। जब किसी के लिखने, बोलने से आप भड़क जाएँ तो उसका भी कोई कारण होता है।

उनका कहना था कि मैं तो आईना ही दिखा रहा हूँ समाज में गालियां नहीं दी जाती क्या, वैश्याएं नहीं हैं? क्यों हैं? क्या जीवनशैली है। उनके लिखे ‘काली सलवार, बू, धुआँ, ठंडा गोश्त, दरमियान’ ऐसी ही कई और कहानी हैं जिनको लेकर मुक़दमे चले। जिस बात को चार दीवारी में ठहाके लगाकर बात कर सकते हो, उस बात को अगर मैंने लिख दिया तो कौन सा गुनाह हो गया ? अब खुद का चेहरा ही इतना भयानक है कि आईने के संपर्क से भी नहीं देख पा रहे।

लेकिन 1947 की आज़ादी के बाद, विभाजन से मंटो और उनकी कहानियों के गड़े किरदारों पर बहुत असर पढ़ा। वो पूरी तरह से टूट गए थे और 1948 में अपनी बीवी और 3 बेटियों के साथ हमेशा के लिए पाकिस्तान चले गए और जीवन के आखिरी दिनों तक वहीँ लाहौर में ही रहे। ‘लिवर सिरोसिस’ नाम की गंभीर बीमारी और समाज से लड़ते- लड़ते सत्र 18 जनवरी 1955 को महज़ 43 वर्ष की उम्र में इस संसार से अपने देह को त्याग दिया। मुंबई में फिल्मों की कहानियाँ, पत्र -पत्रिकाओं में लिखते समय एक दौर ऐसा भी आया कि वो पूरी तरह से टूट चुके थे। उनके लिखे 3 खत मौजूद हैं जिसमें लिखा था –

“मुझे यहाँ से बुलवा लो, मेरा दम घुटता है यहाँ पर!”

– भास्कर सुहाने

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