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साफ फ़र्क है आह से उपजे गान और बाज़ार की कला में : प्रसून जोशी

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हमारा अतीत इस बात का गवाह है कि चाहे वह कल्पना की ऊंची उड़ान हो या नए-नए विचारों की गहरी पैठ, हमने नए विचारों का सदा ही स्वागत किया है. हमारे पास अनेक उदाहरण हैं निर्बाध चिंतन के. फिर भी आज कुछ लोगों में एक असंतोष क्यों दिखाई देता है? क्यों कला का समाज और व्यवस्थाओं के प्रति और समाज का कला के प्रति एक अविश्वास सा-नज़र आता है?

एक सच्चा कलाकार कभी किसी को दुख पहुंचाने के लिए कोई रचना नहीं करता. वह तो अपनी अनुभूतियों को दूसरों से बांटना चाहता है. उसे सुख मिलता है जब वह स्वयं में होने वाले छोटे से छोटे कंपन को भी दूसरे तक पहुंचा पाता है. यहां कोई दूसरी भावना नहीं होती, लेकिन यदि यही सच है तो फिर संदेह कहां से जन्म लेता है?

दरअसल, भावनात्मक रूप से गहराई तक जुड़े समाज में ऐसी समस्याएं नहीं आतीं. जब कहीं यह रिश्ता टूट जाता है तभी अविश्वास की स्थिति पैदा होती है. अविश्वास जन्म लेता है स्वार्थ की धरती पर जब मानवीय संवेदनाओं को दूर रख कर मनुष्य अन्य किसी भावना के वशीभूत हो जाता है, तब ऐसी स्थिति में विचार मात्र विचार नहीं रह जाते, कला मात्र कला नहीं रह जाती!

ऐसे में एक ओर तो कुछ लोग कला की नीयत पर ही सवाल उठने लगते हैं, दूसरी ओर एक कलाकार से यह प्रश्न किया जाता है कि क्या आपको अपनी अभिव्यक्ति के बाद आपको उस व्यक्ति विशेष की परवाह होनी चाहिए जिस तक आप अपनी बात पहुंचाना चाह रहे हैं?

ऐसे में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई दी जाने लगती है और संवेदनहीनता को तर्क का जामा पहना दिया जाता है. कई बार तो यहां तक सुनने को मिलता है कि दूसरों की परवाह करना हमारा काम नहीं. हमें बस अपनी अभिव्यक्ति चाहिए. दूसरों की चिंता कानून करे.

इतनी हृदयहीन कैसे हो सकती है कला

प्रश्न सीधा और साफ है. क्या उस कला को समाज के प्रति संवेदनशील नहीं होना चाहिए जो समाज के लिए ही अपना होने का दावा करती है? यह प्रश्न विशेष रूप से तब अहम हो जाता है जब हम उस कला की बात करते हैं जो बदले में बहुत कुछ चाहती है. आपका समय, आपका ध्यान और आपका धन भी. ऐसे में उस कला से एक जिम्मेदारी की उम्मीद रखना कितना गलत है?

यह प्रश्न करते ही स्वयं को उदार विचारों का संरक्षक मानने वाला एक वर्ग आप पर टूट पड़ता है कि इस प्रश्न को उठाना मात्र ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है. मैं इन सबकी परवाह किए बिना एक पल के लिए इस पर बात करना चाहता हूं.

इस दुनिया में न जाने कितने जीवन हैं. कितने प्राणी, कितनी योनियां और जन्म से हर जीवन एक स्वतंत्रता लेकर पैदा होता है. प्रकृति में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर युद्ध नहीं होता. एक कुलांचे भरते हिरण की स्वतंत्रता प्रकृति के साथ एक ऐसा सुखद तारतम्य लिए होती है कि इस छलांग के साथ अनेकों छलांगें जुड़ जाती हैं.

प्राकृतिक स्वतंत्रता में एक निश्छलता है, स्वाभाविकता है, सहजता है. यह स्वाभाविकता मानव सभ्यता में कहीं खो-सी गई है और एक व्यवस्था ने जन्म लिया है जहां हमारे स्वयं के बनाए नियम और कानून हैं. हमारी स्वयं की तय की गई आचारसंहिता है.

इस व्यवस्था को मानव ने ही जन्म दिया है और कई बार असहज होने के बावजूद इसे स्वीकारा भी है. इस मानव संचालित दुनिया में एक सहमति रही है कि इस व्यवस्था के हित में ही हम आचार संहिताएं बना रहे हैं और इसके साथ एक-दूसरे से जुड़ी कुछ अपेक्षाएं भी आएंगी जिन्हें हम पूरा करेंगे. यहां प्रश्न स्वयं की बनाई सभ्यता के अस्तित्व का था न कि स्वयं को प्राकृतिक रूप से स्वतंत्र सिद्ध करने का. यहीं अभिव्यक्ति का प्रश्न भी आता है और स्वतंत्रता के साथ एक संवेदनशील सोच का भी.

हमारे कुछ कलाकर्मी अक्सर अमेरिका और यूरोप से हमारी तुलना करते रहते हैं और बड़ी चतुराई से चुन-चुन कर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. यह सिद्ध करने के लिए कि हमारा समाज और व्यवस्थाएं पिछड़ी हुई हैं और हम पश्चिम की तरह खुले विचारों का स्वागत नहीं करते. यहां वे समझने में यह बड़ी भूल करते हैं कि हर समाज अलग-अलग तरह के वैचारिक धागों से बुना होता है. हर समाज की अपनी एक पहचान होती है, उनके गुण होते हैं जिनमें युगों-युगों के सामूहिक मानवीय अनुभवों की सुगंध होती है. सच तो यह है कि वर्तमान अधर में लटका हुआ त्रिशंकु क्षण नहीं, वह तो युगों से धड़कते अवचेतन की धारा से पैदा होता है.

मैं यह भी नहीं मानता कि कला और व्यापार का साथ-साथ चल पाना मुमकिन नहीं. हमारे पास दुनिया में ऐसे उदाहरण हैं जहां व्यापार के साथ कला गरिमा लिए खड़ी दिखाई देती है, फिर भी बाज़ार के लाभ-हानि से जुड़ी कला और आह से उपजे हुए गान का अंतर स्पष्ट होना चाहिए.

जब आंखों से कविता बहती है तब उसके आवेग को न कोई बॉक्स ऑफिस रोक पाता है न कोई बैलेंस शीट. वह तो निश्छल और निर्विकार होती है. जोड़-तोड़ के गणित से स्वतंत्र. सच तो यह है कि एक-दूसरे की परवाह करने वाले समाज में एक सहजता होती है. एक रिश्ता होता है मानव का मानव से, हृदय का हृदय से, वहां गुस्से से भरी आंखें नहीं, प्यार और स्नेह से भरी हुई आंखें होती हैं. एक-दूसरे पर संदेह नहीं, विश्वास होता है. एक बुनियादी विश्वास कि हमारी खुशी और हमारी पीड़ाएं साझा हैं. यह जीवन भी साझा है. यह विश्वास कलाकार और लोगों के बीच से कभी लुप्त नहीं होना चाहिए.

यह भी सच है कि कला मात्र आनंद के लिए नहीं होता, उसका क्षेत्र असीम है. विचार मंथन करते, प्रश्न उठाते और खुद को टटोलते हुए एक तरंगिणी-सा बह निकलना कला के मूल में है और कला ऐसा करती रही है. समाज को लगातार एक दिशा देती रही है, ऐसे में कभी-कभी असहजता का होना स्वाभाविक है. जब तक उसके उत्सर्ग में ईमानदारी है उसके बहाव में सर्जना होगी, विनाश नहीं.

पूरा विश्व आज परिवर्तन के एक बड़े दौर से गुज़र रहा है. हम आज जितना एक-दूसरे से तकनीकी रूप से जुड़े हैं, पहले कभी नहीं थे. आज हर किसी के पास एक मंच है. अपनी बात रख सकने की सुविधा है. कुछ समय पहले यह सब अकल्पनीय था. एक समय ऐसा भी था कि मानव को इसका ज्ञान भी नहीं था कि उसी की तरह के अन्य मानव भी इसी पृथ्वी में कहीं और भी हैं. पर इसका अर्थ यह नहीं लगाना चाहिए कि उस समय मानव के पास अलग-अलग तरह की सोच नहीं थी. अलग-अलग तरह के विचार नहीं थे.

विचार थे, सोच थी, भावनाएं थीं, पर मंच नहीं था. साधन नहीं थे. आज मंच है, साधन हैं और यही मूल कारण है कि हम इन आवाज़ों को सुन पा रहे हैं. परेशानी उनको है जो मंच पर अपना एकाधिकार समझते थे, जोड़-तोड़ और शक्ति प्रयोग से इन मंचों को, इन साधनों को अपने नियंत्रण में रखे हुए थे.

ये लोग इस सच को भुला चुके थे कि उनके अलावा भी इस धरती पर लोग हैं जिनकी सोच उनसे अलग भी हो सकती है और इस अलग सोच के अस्तित्व को नकारने की मंशा ही झलकती है जब आप अपने से अलग हर आवाज़ को फालतू करार देते हैं. अपनी आवाज़ को कुलीन और सभ्य, किसी और की आवाज़ को असभ्य घोषित कर देने से एक तरह की बौद्धिक दादागिरी के अतिरिक्त कुछ हासिल नहीं होगा. अविश्वास के अंधकार में ज्योति कलश लेकर उतरना है बस. अगर डगमगाए भी तो उजाले ही छलकेंगे.

मैं स्वयं आत्ममंथन के एक दौर से गुज़र रहा हूं. परिवर्तन के इस दौर को समझने का प्रयास कर रहा हूं. मुझे लगा कि जरूरी है कि मैं यह विचार साझा करूं. बहुत कुछ है जो इस विषय पर कहा जा सकता है और चर्चाओं से ही मार्ग प्रशस्त होगा, आखिर हम ही तो हैं जिनसे कला है, जिनके लिए कला है, सब कुछ यहीं सामने है, एक-दूसरे की आंखों में विश्वास देखना है बस.

– गीतकार प्रसून जोशी से राजेश मित्तल की बातचीत

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