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धड़क-धड़क, जिया धड़क-धड़क जाए…

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बादल और बारिश की आंख मिचौली में बनारस की सड़कें गीली हो चुकी हैं। भुट्टे के ठेले पर उठ चुके धुंए में और चाय के दड़बे में बैठ चुकी अंतहीन बहस में अचानक सावन उतर आया है।

शाम सात बजने को है। काशी के अति व्यस्त गोदौलिया चौराहे से लक्सा रोड की तरफ बढ़ने पर पीडीआर मॉल। टिकट खिड़की पर भीड़ के बावजूद किसिम-किसिम के लोग पधारे हैं।

काम-धाम निपटा चुके कुछ अंकल-आँटी, कुछ काम-धाम करके रिटायर्ड हो चुके सीनियर सिटीजन और कुछ काम-धाम के अभाव में गुटखा चबाकर डेढ़ जीबी का सदुपयोग कर रहे लौंडे-लफाड़ी शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के साथ जमे हैं।

लेकिन इन तीनों से ज़्यादा हाई-स्कूल, इंटर, बीए, एमए में पढ़ने वाले वो लोग आए हैं, जिन्हें प्रेम शास्त्र में लैला-मजनू, हीर-रांझा सोना, बाबू, हनी, बनी स्वीटी डार्लिंग और करेजा तक कहा जाता है।

खिड़की पर एक षोडश वर्षीया कन्या और सत्तरह वर्षीया बालक का प्रवेश होता है। दोनों को देखने के बाद लग जाता है कि ये उनका पहला प्यार ही नहीं साथ में पहली फिल्म भी है।

लड़की ने आज अपना सबसे महंगा फ्राक सूट पहना है.. हाथ में एक-एक चूड़ियां भी.. खुद से आइब्रो भी बना लिया है बेचारी ने, लेकिन मुंह को खींच-खींच कर इस कदर बांध लिया है, मानों फिल्म देखने नहीं, आज प्यार से फांसी चढ़ने आई हो।

लड़का भी अपने सबसे महंगे और फटे जीन्स में है। एक चमकउवा शर्ट की कॉलर में रुमाल फंसाए नब्बे के दशक वाले मिथुन चक्रवर्ती जैसी मुद्रा में आते-आते रुक जाता है और आलोक नाथ का ध्यान करते हुए एक किलो रिक्वेस्ट में एक क्विंटल लाचारी को मिलाकर जो भाव उत्पन्न होता है उस भाव से बोलता है..

“भैया साइड वाली सीट दे दिजीये न प्लीज.. भइया न? भइया प्लीज भइया..”

बाप रे! तीन बार भइया… इस बंधुत्व भाव की चरम अवस्था से आक्रांत टिकट काटने वाले की सांस रुक जाती है।

बेचारा दो मिनट सोच में पड़ जाता है कि “यार ये मेरे मामा का लड़का दिलीप है कि मौसी का लड़का दिनेश ?

लेकिन भीड़ देखकर उसके गले से एकदम प्रोफेशनल आवाज़ आती है।

“अरे! भाई साइड वाली सीट नहीं है। सब पहले से ऑनलाइन बुक हो जाता है। आप लोग समझते नहीं। अभी दस लोग लौट गए… साला समझ नहीं आ रहा कि सबको साइड वाली सीट कहाँ से लाकर दें।”?

इतने में लड़की बेचारी उदास हो जाती है मानो मन ही मन कह रही हो कि “हम प्लास्टिक की बोरी बिछाकर बैठ जाएंगे भइया…बस साइड में कहीं भी जगह दे दीजिए।

तब तक एक बुद्धिजीवी दादा ज्ञान देने के मूड में आ जाते हैं।

“बताइये तिवारी जी.. ये सब फ़िल्म देखने आते हैं कि फिल्म बनाने आते हैं?…”

अरे! आप क्या समझेंगे.. ई प्रेम कहानी है… फिलिम में कोई ऐसा-वैसा सीन आ गया.. उम्र जवान है समझ नादान है.. तो साइड में रहेंगे तो ठीक रहेगा न?”

इधर भाई साहब भीतर का माहौल तो एकदम अलग है.. सामने वाली सीट पर एक भाई साहब अभी परसों से संसद भवन में ही हैं और कुर्सी से बैठकर ही कांग्रेस को उठाकर फेंक रहे हैं..

” देखे की नहीं देखे तुम.. मोदिया फाड़ के रख दिया कि नहीं.. ? अबे पप्पू-सप्पू के बस की राजनीति नहीं है यार.. बेटा एक किराना की दुकान सम्भालने के लिए भी नौ मन बुद्धि की जरूरत होती है, ये तो 130 करोड़ का देश है”…

बगल से झल्लाहट की आवाज़ आती है, जिसका भावार्थ ये होता है कि “अरे!अमित शाह के फूफा जी.. शांत हो जाईये हम फिल्म देखने आए हैं भाषण सुनने नहीं।’

लो जी कोल्ड्रिंक-कोल्ड्रिंक, ऑर्डर कोई ऑर्डर, पेटिजस चाहिए क्या.. पेटिस ?

इधर मेरे जैसा अकेला आदमी जो बस फिल्म देखने आता है उसकी जान सांसत में पड़ जाती है.. और समझ नहीं आता कि सामने परदे वाली फिल्म देखे या बगल वाली फिल्म।

तब तक शुरू होता है स्वच्छ भारत अभियान, मुथूट फाइनेंस, घड़ी डिटर्जेंट, फेना ही लेना, बनारसी साड़ी के असली ठग विक्रेता।

पांच मिनट बाद मैं सोचता हूँ कि यार ये मुकेश कैंसर से मर गया क्या? परमाणु के समय भी नहीं दिखा था।

ओह! तब तक मुकेश हाजिर.. “ये है मुकेश की कहानी.. बस इतना सा टार आपको बीमार करने के लिए काफी है।”

दिल से आवाज आती है, हे भगवान इस मुकेश की जान ले लो या हमारी ले लो।

सहसा सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट दिखता है.. और धड़क की स्पेलिंग भी। तब जाकर मन को आराम और दिल को सुकून मिलता है..धड़क को देखते ही धड़कन बढ़ जाती है… और ऐसी बढ़ती है ऐसी कि उदयपुर से पहली नज़र में ही प्यार हो जाता है।

पांच मिनट फिल्म बीतती है तभी मन करता है अभी रुको यार उदयपुर घूमकर आते हैं तब फिल्म देखेंगे।

देखते हैं बनारस जैसी घुमावदार गलियां.. वैसे ही घाट.. बड़े-बड़े राजसी महल, मन्दिर, पहाड़, झील और बड़े-बड़े कुंड तालाब.. उनके बीच हंसते-खिलखिलाते भागते-दौड़ते मधुकर और पार्थवी।

मधुकर एक नीची जाति का लड़का है..जिसके पिता उदयपुर में एक रेस्टुरेंट चलातें हैं..वो दुनिया के सभी बापों की तरह सख्त हैं..और मधुकर दुनिया के सभी बेटों की तरह लापरवाह,मासूम,आवारा,और आशिक है। मधुकर को इंग्लिश बोलने आती है और प्यार करना भी।

पार्थवी राजस्थान लोकतांत्रिक सेना के नेता उस रतन सिंह की बेटी है.. जो बड़े ही शानो शौकत में जीती है। रतन सिंह बने आशुतोष राणा के खून में राजतंत्र है और विरासत में महल सरीखा होटल लेकिन सामने है चुनाव जीतने का सपना..

समाज के इन्हीं दो वर्गों की उठापटक के बीच पार्थवी और मधुकर की प्रेम कहानी स्कूल के उसी बेंच से शुरू होती है जिस पर हज़ारों बार लड़के-लड़कियों ने आई लव यू लिखा और मिटाया होता है।

स्कूल से निकलकर ये प्रेम कथा जब उदयपुर की गलियों, महलों और कुंडों, तालाबों में दौड़ती है तो हम सहसा राजस्थान के वैभव में खो से जाते हैं.. और पार्थवी के प्रेम में दौड़ते ईशान को देखकर अपना वो पहला प्यार याद आने लगता है।

वो दसवीं वाला प्यार जिसमें महबूबा की एक झलक देखने, बात करने और नोटिस किये जाने की इतनी बेकरारी होती है कि उस तूफान में कुछ दिखाई नहीं देता है।

फोन का घण्टों इंतज़ार करने, सजने-संवरने, बाल झाड़ने और परफ्यूम लगाकर हीरो बन जाने की इतनी जल्दी होती है कि उस धुन में कुछ सुनाई नहीं देता है।

इसी धुन में मतवाला होकर मधु एक दिन पप्पी लेने पार्थवी के घर चला जाता है। और दुर्योग से दोनों पकड़ लिए जाते हैं।

फिर तो यहीं से मोहब्बत की ये मासूम दास्तां एक क्रूर कथा में बदलने लगती है।

अपने दैत्य सरीखे-बाप भाई और उनके गुर्गों से बच-बचाकर पार्थवी और मधुकर ट्रेन से भाग जाते हैं… भूख-प्यास जान निकल रही होती है लेकिन लाड़-प्यार दुलार और राजसी ठाठ में पली पार्थवी नगरपालिका का पानी नहीं पी पाती है तो उसे अपनी ईयर रिंग बेचनी पड़ती है और अपना डर भी।

दोनों पानी पीते हैं, खाना खातें हैं। मधुकर अपने मामा के यहाँ नागपुर फोन करता है। मामा उसे नागपुर बुलाते हैं और कुछ दिन बाद समझाते हैं कि “रतन सिंह के लोग तुमको कुत्ते की तरह खोज रहें हैं… इसी में तुम्हारी मामी की डिलीवरी भी है। यहाँ से चले जाओ।”

पार्थवी और मधुकर का चेहरा और दुःखी हो जाता है। मामा इस समस्या का समाधान भी बताते हैं… वो कहते हैं.. कलकत्ते में मेरा दोस्त है सचिन भौमिक, वहां चले जाओ कोई समस्या नहीं होगी।

फिर उदयपुर, नागपुर से होकर कहानी कलकत्ता आ जाती है.. और यहीं से प्रेम का संघर्षमय सफर शुरू होता है, जो कभी हावड़ा स्टेशन, विक्टोरिया, गंगा घाट तो कभी हावड़ा ब्रिज और कभी हाथ वाले रिक्शे से लेकर ट्राम तक में भागता है.. और भागकर कहाँ पहुँचता है इसके लिए आपको जाकर फिल्म देख लेनी चाहिए।

मधुकर की सफल भूमिका में ईशान खट्टर हैं… ईशान राजेश खट्टर और नीलिमा अजीम के बेटे और लोकप्रिय अभिनेता शाहिद कपूर के भाई हैं। धड़क से पहले ईशान ने ईरान के प्रसिद्ध निर्देशक माजिद मजीदी की फिल्म “बियांड द क्लाउड” में काम किया है।

वहीं जाह्नवी श्री देवी और बोनी कपूर की बेटी हैं ये बताना इतना जरुरी नहीं है जितना ये बताना कि जाह्नवी की मासूमियत उनके अभिनय पक्ष की कमियों को बार-बार ढंकती रहती है।

पार्थवी जब कहती हैं.. “पप्पी. यानी कुत्ते का बच्चाsss”

ये बच्चा के बाद जो पॉज़ आता है न तब लगता है कि ये जाह्नवी कपूर सच में श्री देवी की बेटी है यार..!

राजस्थानी और बंगला को कल्चर एक मिलाती इस फिल्म में अजय-अतुल ने बीच-बीच में कुछ इंस्ट्रूमेंट का इतनी खूबसूरती से प्रयोग किया है कि फिल्म खिल जाती है।

तीस पर अमिताभ भट्टाचार्य की टाइटल ट्रैक में वो लाइन.. “मरहमी सा चांद है तू, दिलजला सा मैं अंधेरा” जब कान में पड़ती है तब लगता है कि बॉलीवुड के इस शोर भरे गीतों में थोड़ा सी पोएट्री ज़िंदा है भाई, ज़िंदा है।

हाँ, लेकिन अगर आप बहुत बुद्धिजीवी हैं और गॉडफादर को तेरह बार देख चुके हैं, विश्व सिनेमा की गहरी समझ रखते हैं तो ये फिल्म आपके लिए नहीं है.. आपको मोमोज़ खाते हुए नेटफ्लिक्स पर सेक्रेड गेम्स ही देखना चाहिए।

लेकिन आपके दिल में अभी भी एक बच्चा है, जिसमें दसवीं-बारहवीं वाला प्यार अभी भी कुलांचे मारता है, याद आता है अभी भी वो पिंकिया वाला प्यार तो बस देर करने की ज़रूरत नहीं है.. आपको ये फिल्म देख लेनी चाहिए।

अंत में ये कि आपने मेरी तरह सैराट देखी है, तो आप कई जगह ये फिल्म देखकर उदास हो जाएंगे और लास्ट तक आपको एहसास होगा कि नागराज मंजुले सैराट में जो कहना चाहते थे वो शशांक खेतान धड़क में कह नहीं पाए हैं। और शायद आगे धड़क पार्ट टू बनेगी जिसे एकता कपूर डाइरेक्ट करेंगी और जाह्नवी कपूर नागिन बनकर अपने प्रेम का बदला लेगी।

लेकिन इन सब चीजों के अलावा आपको ये फिल्म देखनी चाहिए हमारे मित्र Aditya Kumar उर्फ परपेंडीकुलर के लिए..

पटना के आदित्य गैंग्स ऑफ़ वासेपुर रूपी उसी कालेज से आते हैं.. जहाँ से नवाज़ और पंकज त्रिपाठी जैसे अभिनेताओं को एक नई पहचान मिली है।

धड़क में आदित्य देवी सिंह की भूमिका में है.. धड़क से पहले कैरी ऑन कुत्तों, और बैंजों जैसी फिल्में करने वाले आदित्य जब कलकत्ता पहुंचकर जाह्नवी कपूर से पूछते है.. “मधु कैसा है’ ?

तब लगता है कि यार इस अभिनेता को और डायलॉग मिलना चहिए था न? आदित्य भाई से उम्मीदें बढ़ रहीं हैं, उम्मीद है इस पर सौ फीसदी खरा उतरेंगे.. उन्हें आपकी शुभकामनाओं की ज़रूरत है।

– अतुल कुमार राय

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