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मितवा : राग भूपाली का चुपके से आना राग पहाड़ी से मिलने

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संगीत के रागों में मुझे संपूर्ण प्रकृति परिलक्षित होती दिखाई देती है. जैसे कोई थिरकती नदी हवाओं से संगत करे, जैसे कोई जलप्रपात कहरवा ताल में निबद्ध होकर घाटी में उतर जाए, जैसे गोपियों की लजाई पायल बज उठे. राग उतने ही प्राकृतिक हैं, जितनी कोई जंगली बूटी होती है. रागों का लेप अवसाद दूर करता है, मलिन मन स्वच्छ करता है.

एक राग जो आरंभ से ही आम जन-मानस का प्रिय बना रहा है. ये राग लोक संगीत से ही जन्मा है. रजवाड़ों की रईस महफ़िलों में नहीं ठहरता लेकिन एक चरवाहे की बांसुरी में प्रसन्नता से उतर जाता है. उसे ‘पहाड़ी राग’ कहते हैं. कहते हैं सदियों पहले हिमालय के किसी सुरीले कोने में ये राग जन्मा था.

ये राग धरती से जुड़ा हुआ है, इसमें अहंकार लेशमात्र नहीं है. इसमें तीव्र स्वर नहीं होते. ये चित्त में ऐसे घुल जाता है जैसे दूध में शक्कर. यही कारण है कि इस भोलेभाले पहाड़ी राग पर कई लोकप्रिय गीत बनाए गए. राजस्थान का मांड और मध्यभारत का पीलू भी इस राग से संबंधित माने जाते हैं.

चांदनी का ‘तेरे मेरे होठों पे मीठे-मीठे गीत मितवा’ भी पहाड़ी राग पर रचा गया था. चांदनी का सबसे लोकप्रिय गीत, जिसके फिल्मांकन में यश चोपड़ा अपनी ही एक फ़िल्म के गीत को ‘ट्रिब्यूट’ देते हैं. ये बारीकी वही जान सकते हैं जो फिल्मी संगीत की गहरी समझ रखते हैं.

ये जानने के लिए हमें पुनः 1981 में लौटना होगा. सिलसिला फ़िल्म के लिए संगीतकार शिव-हरि ने एक गाना बनाया था, देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए. ये गीत ‘राग भूपाली’ पर बना और आज तलक सुना जा रहा है. एक बार उस गीत को स्मरण करें. खूबसूरत वादियां, रेखा, शिफॉन की मनमोहक साड़ियां, अमिताभ के क़ातिलाना स्वेटर. फिर चांदनी के इस गीत को याद करें. आपको दोनों गीतों में एक साम्य दिखाई देगा.

चांदनी के इस गीत में ‘सिलसिला’ के उसी गीत के मुखड़े का टुकड़ा डाला गया है. कितनी सुंदर कल्पना थी शिव-हरि की. राग पहाड़ी से मिलने के लिए राग भूपाली गाने में चुपके से प्रवेश कर जाता है. एक बार फिर देखेंगे तो वो टुकड़ा आपको मिल जाएगा. इसे हरिप्रसाद जी ने बांसुरी पर बजाया था.

कोशिश करता हूं कि नए गीतों को भी इसी तरह ‘पढ़ सकूं’ लेकिन न शायरी मिलती है, न मौसिकी. और पहाड़ी राग तो शर्माकर उन्हीं पहाड़ों में जा छुपा है, जहां से वो आया था.

– विपुल रेगे

अंखियों में तू बस जा, अंखियाँ मैं बंद कर लूं

आजकल बहुत नज़र आने लगे हो
इतना दिखना भी ठीक नहीं
आदतें बदलते देर नहीं लगती

ये जो आँखों की मछलियाँ हैं
उन्हें तैरने दो अभी अजनबियत के समंदर में
परिचय के कांटे में
दोस्ती का आटा भी मत लगाओ

प्रेम चौंकना बंद कर दे
तो विचार चौकन्ने होने लगते हैं

कभी मेरी पीठ पर
अचम्भे का धप्प लगाने आना
और मैं पलटते से ही कहूं
अंखियों में तू बस जा, अँखियाँ मैं बंद कर लूं
पहले इन अंखियों से, बाते मैं चंद कर लूं

और तुम मेरी सारी वाहियात कविताओं को पढ़कर कहना…
तेरी इन्हीं ही बातों ने, लिया मुझे जीत मितवा
आगे आगे चले हम पीछे पीछे प्रीत मितवा

बस याद रखना इस बात को
ये प्रीत हमेशा हमारे पीछे चलेगी
और ‘हम’ हमेशा आगे चलेंगे…

यात्रा सिर्फ तथाकथित प्रीत, प्रेम, प्यार, इश्क की नहीं होती
प्रेम में मुए अध्यात्म को घुसाने के लिए गाली दे देना
साहित्यकार इस तरह की कविताओं
के बलात्कार के लिए मुझे कोसेंगे
फिर भी मैं ज़िद्दी हमेशा यही कहूंगी

हम इन सारे प्रपंचों से ऊपर हैं…
‘हम’ हैं ही नहीं इस दुनिया के…

– माँ जीवन शैफाली

श्री का विदा होना, देवी का बचा रह जाना : किसी के हाथ ना आएगी ये लड़की

आपके नाम के पीछे भी आपकी नियति के बहुत सारे रहस्य छुपे होते हैं. इसलिए हमारे यहाँ राशि अनुसार नाम रखने को कहा गया है. मैं नहीं जानती श्रीदेवी का वास्तविक नाम क्या था, लेकिन वो जिस नाम से प्रसिद्धि के शिखर को छू पाई वो है श्रीदेवी.

श्री का अर्थ होता है समृद्धि, लक्ष्मी, शुभता को भी एक अर्थ में श्री कहा जाता है. तो सिनेमा जगत में उस देवी को लक्ष्मी के साथ समृद्धि भी मिली.

हर समय का अपना फ़िल्मी दौर होता है. जो जिस समय के लिए बनाया गया है उस समय के अनुसार ही उसकी किस्मत और बहुत हद तक देह की बनावट होती है.

श्रीदेवी को यदि उन दिनों पसंद किया गया तो उनकी देह की बनावट की वजह से ही किया गया था. एक भरेपूरे शरीरवाली नारी जब मटकती कमर के साथ चांदी के परदे पर उतरी तो लोगों की आँखें चमचमा गयी. बाद में ज़रूर उन्होंने सदमा, चालबाज़, आर्मी, खुदा गवाह, लम्हे, इंग्लिश विंग्लिश जैसी फिल्मों से अपने अभिनय का लोहा मनवाया.

उम्र और करियर के डूबते सूर्य की लालिमा को बचाए रखना हर किसी के बस की बात नहीं. जिस उम्र में पुरानी तारिकाएँ माँ का रोल करने लगती थी, उस उम्र में भी मुख्य भूमिका की चाह शरीर के साथ खिलवाड़ के लिए मजबूर कर देती है.

श्रीदेवी के साथ भी वही हुआ, शरीर पर किए गए सर्जिकल प्रयोग ने उनकी उम्र को कम कर दिया. लेकिन अपने दर्शकों का प्रेम पाते रहने की चाह उनमें इस स्तर पर थी कि कदाचित मृत्यु शैया पर भी वो अपने दर्शकों को ही याद कर रही होगी क्योंकि जब उनकी मृत्यु की खबर सुबह सुबह सोशल मीडिया द्वारा फ़ैली तो कई लोगों ने कहा कि ये कैसा संयोग था हम कल रात श्रीदेवी को ही देख सुन रहे थे. कोई उनकी बायोग्राफी देख रहा था, कोई उनकी फिल्म तो कई उनके गीत.

मैं और स्वामी ध्यान विनय खुद उनकी फिल्म जस्टिस चौधरी का चलताऊ गाना “आइसक्रीम खाओगी” का आनंद ले रहे थे और सोच रहे थे कैसे कैसे गाने और नृत्य उन दिनों बनते थे और लोग पसंद भी करते थे. रात के समय शास्त्रीय संगीत, ब्लैक एंड व्हाईट ज़माने के मधुर गीत और ग़ज़ल सुनवाने वाले स्वामी ध्यान विनय मुझे रात श्रीदेवी का “आइस्क्रीन खाओगी” सुनवा रहे थे, तो मुझे लगा यूं ही मेरा मूड ठीक करने के लिए बजा रहे हैं. क्योंकि पिछले कुछ दिनों से उदासी का एक दौर चल रहा था.

सुबह उठी तो सूरज की रोशनी में एक अलग ही चमक थी. आँगन में पलाश का पेड़ है जिसे मैं रोज़ देखती थी कि उस पर अभी तक पलाश क्यों नहीं आए. जीवन की कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जिस पर जब हमारा बस नहीं होता तो हम अस्तित्व का मुंह तकने लगते हैं. पलाश के पेड़ पर फूलों के आने की मेरी प्रतीक्षा भी पिछली पीड़ा से मुक्त होने का संकेत सी है. आज की सुबह बड़ी शुभ थी मेरे लिए क्योंकि लम्बी प्रतीक्षा के बाद आज उस पेड़ पर मैंने पलाश के फूल दहकते देखे.

लौटकर कम्प्युटर पर आई तो सबसे पहली नज़र श्रीदेवी की मृत्यु पर पड़ी. कभी कभी हम प्रकृति के सामने अवाक से खड़े रह जाते हैं… श्री का चले जाना क्या मेरी शुभता के लिए संकेत हो सकता है? किसी की मृत्यु का समाचार कैसे आपके लिए शुभ हो सकता है. लेकिन शकुन शास्त्र के रहस्य मेरे लिए आज भी उतने ही रहस्यपूर्ण है.

क्योंकि श्री का चले जाना शुभता का जाना हो सकता है लेकिन उस देवत्व के बचे रहने का संकेत था जिस पर यह ब्रह्माण्ड टिका हुआ है. हमारे कर्म शुभता को तो वापस ला सकते हैं, सुख समृद्धि और लक्ष्मी को तो वापस ला सकते हैं लेकिन यदि जीवन से दैवीय शक्ति का लोप हो जाए और श्री बचा भी रहे तो उसका कोई मतलब नहीं रह जाता.

शुभ अशुभ समाचारों का मेरा अपना गणित है, हर किसी पर लागू हो आवश्यक नहीं. क्योंकि पिछले दो दिनों से मेरी कविताओं में उस देवी का ही ज़िक्र आ रहा था जिसको बचाए रखने के लिए देवता मेरे साथ षडयंत्र रच रहे थे. और मैंने लिखा था-

किसी और को यह संकेत समझ आये ना आये लेकिन इस सदी के महानायक कदाचित इन्हीं तरंगों पर सवार रहे होंगे क्योंकि श्रीदेवी की मृत्यु के ठीक एक घंटे पहले उनका मन भी विचलित हुआ था… कदाचित उन्हें भी किसी ऐसी घटना का पूर्वाभास हुआ हो. आखिर वो भी तो पिछले जन्म में अधूरी छूटी अपनी तपस्या का फल भोग रहे योग भ्रष्ट योगी हैं.

श्री ने तो हमसे विदा ले ली और देवी हमारे दिलों में बची रह जाएगी, लेकिन किसी के हाथ ना आएगी ये लड़की…

  • माँ जीवन शैफाली

कितनी फीकी थी मैं, सिन्दूरी हो जाऊं… ओ सैंया…

 

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