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टेलिफ़ोन धुन में हँसने वाली मनीषा : ‘सौदागर’ से ‘डियर माया’ का सफ़र कैंसर की राह से गुज़रकर

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मनीषा, मुझे पसंद है सिर्फ उसकी सुन्दरता के कारण नहीं, उसकी प्यारी मुस्कान के कारण नहीं, उसके सहज अभिनय के कारण नहीं, बल्कि उसकी जिजीविषा के कारण जिसकी वजह से वो खुद को मौत के मुंह से खींचकर ले आई…

अपनी आधुनिक जीवन शैली के लिए हमेशा चर्चा में रही मनीषा ने उन दिनों सबसे अधिक आकर्षित किया जब कैंसर से जूझते हुए कीमो थैरपी के लिए उसने अपना सर मुंडवा लिया था…

पर्सिस खम्बाटा से लेकर मनीषा कोईराला तक.. जिस किसी स्त्री को जब मैं सर मुंडवाया देखती हूँ तो मेरे अन्दर एक अजीब सी हूक उठती है, काश मैं भी यूं ही कभी किसी रोज़ अपना सर मुंडवा लूं…

इसलिए नहीं कि कुछ अलग दिखने की चाह है बल्कि इसलिए क्योंकि मुंडे सर वाला इंसान मुझे बहुत रहस्यमयी लगता है, शायद बुद्धत्व की झलक मिलती है मुझे इसलिए. औरत कभी इस मार्ग पर जाकर सर मुंडवा ले ऐसा कभी देखा सुना नहीं, हो तो शायद मुझे पता नहीं.

बहरहाल, मनीषा एक अभिनेत्री के रूप में मुझे सदा प्रिय रही है. लेकिन जब भी मैं उसकी कैंसर-यात्रा के बारे में पढ़ती हूँ तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं. क्यों व्यक्ति मृत्यु के मुहाने पर खड़े होकर ही ध्यान और अस्तित्व की शक्ति का साक्षात्कार कर पाता है. मेरा खुद का भी यही अनुभव रहा है.

हम एक खुशहाल जीवन जी रहे होते हैं और अचानक मृत्यु (चाहे जिस रूप में हो) आये तो हमें जीवन का वास्तविक अर्थ समझ में आता है. मनीषा के जीवन में भी ध्यान उन्हीं दिनों उतरा जब वो कैंसर के साथ जी रही थी. कैंसर से लड़ रही थी नहीं कहूंगी, क्योंकि उसने वास्तव में असहनीय पीड़ा के बावजूद कैंसर को कभी दुश्मन नहीं माना.

शुरुआत में उसने उसे एक आम बीमारी की तरह ही लिया, उससे डरी नहीं. पेट में भारीपन बढ़ रहा था तब भी वो जिम जाती रही और पेट और शरीर के अतिरिक्त भार को कम करने का प्रयास करती रही. बाद में उसे पता चला था उसे ओवरी का कैंसर है.

मनीषा कहती हैं –

I remember a bizarre incident. A friend’s friend had hosted a session with a Maori healer in June/July in Mumbai. She didn’t touch my body but just felt the energy.

I remember her words precisely: “You are very angry with your ovaries so you should send loving energies to it.”

It just bombarded my rational mind and I thought, ‘Why should I be angry with the ovaries, Man?”

When I was married I wanted to have a child so I went for IVF treatment. I thought when I gave up, I must have been angry. But the healer had suspected that there was something wrong. When I reached out to her after the diagnosis of cancer, she was scared because she was not suspecting it to be cancerous.

मनीषा का कहना है वो हमेशा अतिरिक्त दवाइयां लेने से बचती रही. उबकाई और मतली के लिए डॉक्टर ने जो दवाई लेने को कहा था, उस दवाई का उपयोग वो तब करती जब सारे दूसरे उपाय असफल हो जाते.

उसके भाई ने उसे हाथ में बाँधने के लिए एक्यूप्रेशर बेल्ट दिया था, माँ उसे अदरक का अचार खिलाती, और फिर वो अधिक से अधिक ध्यान करने की कोशिश करती. दवाइयां उसके लिए अंतिम विकल्प था.

मनीषा ने अपना इलाज विदेश में करवाया, मनीषा के अनुसार भारत में कैंसर को कुछ अधिक भयानक माना जाता है. लेकिन यदि आप सकारात्मक लोगों से घिरे रहो, जो आपको अपनी जीवनी शक्ति से ऊर्जा देते रहें, तो ये भी एक आम बीमारी है.

ऐसा नहीं है कि वो बिलकुल ही ना डरी हो लेकिन जब भी मृत्यु का भय सताता वो अपने गुरु से बात करती…

There are two ways to recover: healthy diet and exercise. You have to revive yourself physically and mentally. I have been doing meditation courses with Oneness University for seven years now.

In hindsight, it was preparing me to deal with what I endured in a calmer way. During the period, my mother, brother and dad, helped me as they too believe in meditation and deep breathing.

Namannji, my guru from Oneness, was always available on Skype. He told me to detach myself from fear.
He’d ask, ‘What are you scared about?’
I said, ‘Dying’.
He asked, ‘What is it like dying?’
I replied, ‘I don’t know.’
‘Then why are you scared of something that you don’t know?’
That made sense to me. He asked me to observe my mind and thoughts.

अभिनेता फ़िरोज़ खान की मृत्यु भी कैंसर से हुई थी, तो उनके पुत्र फरदीन और पुत्री लैला भी मनीषा से मिले और सलाह दी कि जितना हो सके पैदल चलो. शरीर जितना क्रियाशील रहेगा उतना ही बीमारी दूर भागेगी.

और यह बात सिर्फ बीमार को ही नहीं, हर स्वस्थ व्यक्ति को याद रखना चाहिए कि शरीर को स्वस्थ रखना है तो श्रम आवश्यक है. मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी के पिछले अंक में भी हमने वज़न घटाने के उपायों में इसका ज़िक्र किया है. जिसकी लिंक लेख के अंत में दे रही हूँ.

मनीषा ने उन सारी बातों का पालन किया, इसके बावजूद कि उन्हें शुरुआती दिनों में घर से निकलने में झिझक होती थी, क्योंकि सर मुंडवाने के साथ चेहरे पर उनकी आईब्रोज़ भी नहीं थीं. एक अभिनेत्री जो हमेशा मेक-अप की परतों के पीछे अपना वास्तविक चेहरा छुपाये रखती हो, अचानक एक दिन उसे इस अवस्था में बाहर निकलना पड़े तो झिझक स्वाभाविक है.

लेकिन शुरुआती झिझक के बाद उसने बिंदास घूमना फिरना शुरू किया क्योंकि जान है तो जहान है. जब जान ही नहीं होगी तो इस जहान में आपका क्या अस्तित्व होगा.

तब से लेकर आज तक मनीषा मेडिटेशन करती आ रही है, फिल्मों में लौट आई है. सौदागर से लेकर डियर माया तक का सफ़र कैंसर की राह से होते हुए गुज़रा है. लेकिन जीवन इतना सहज, सरल, सामान्य कहाँ होता है, उसे वैसा बनाना पड़ता है. पीड़ा से गुज़रा हुआ इंसान ही वास्तविक सुख का अर्थ समझ सकता है.

तो डियर माया, तुम मेरे लिए आज भी उतनी ही प्यारी और हसीन हो, जीवन से भरपूर हो, तुम्हारे लिए बहुत से गाने लिखे गए… जिनमें से दो मुझे हमेशा प्रिय रहे.. “एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा जैसे मंदिर में हो एक जलता दिया”… तुमने अपने जीवन का दिया हमेशा जलाए रखा उसके लिए सलाम…

और दूसरा “टेलिफोन धुन में हंसने वाली”…. तुम्हारी ये हंसी हमेशा यूं ही हमारे कानों में घुलती रहे… तुम एक मिसाल हो मृत्यु से जूझ रहे लोगों के लिए… तुम ऐसे ही टेलिफ़ोन धुन में हंसती रहना… और हम फोन उठाये बिना भी तुम्हारा संदेश सुनते रहेंगे….

– माँ जीवन शैफाली

Everything is new to me. I value everything more including human beings. I feel like giving hugs to people chalte chalte. You just feel blessed that you are alive. – Manisha

Courtesy India Today for English Content

जब तक श्रम नहीं करेंगे, पाप नहीं धुलेंगे, जब तक पाप नहीं धुलेंगे, फैट नहीं घुलेंगे

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1 thought on “टेलिफ़ोन धुन में हँसने वाली मनीषा : ‘सौदागर’ से ‘डियर माया’ का सफ़र कैंसर की राह से गुज़रकर”

  1. बहुत अच्छा प्रेरणादायक लेख है | ये सच है कि कैंसर का नाम ही भयभीत कर देता है , पर सकारात्मक सोच और ध्यान इस बीमारी से लड़ने में मददगार है | काश हम सब शुरू से ही स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं |

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