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जो तुरंत संतुष्ट हो जाये वही ‘आशुतोष’ है

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सेन्स/ न्युसेंस

सेन्स और न्युसेंस में अंतर होता है.

जिज्ञासा वश पूछे गए प्रश्न सेन्स की श्रेणी में आते हैं और ध्यानाकर्षण के लिए उछाला गया प्रश्न न्युसेंस की श्रेणी में आता है. जिज्ञासा हमें सेन्सिबल व्यक्ति की श्रेणी में रखती है. तो ध्यानाकर्षण हमें नॉन्सेन्सिकल व्यक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है.

स्मरण रखिए- सेन्सिबल व्यक्ति संवाद का पक्षधर होता है, और नॉन्सेन्सिकल व्यक्ति विवाद का पक्षधर होता है.

संवाद जहाँ विषम परिस्थितियों को भी सम बना देता है वहीं विवाद सम को भी विषम बनाने में विश्वास रखता है. प्रतिकूल को अनुकूल कर लेना हमारे शिक्षित और मित्र हृदय का सूचक होता है और अनुकूल को प्रतिकूल में रूपांतरित करना हमारे अशिक्षित और अमित्र चित्त का प्रमाण है.

हमें ये ध्यान रखना चाहिए कि संवाद से विवाद को तो समाप्त किया जा सकता है किंतु विवादी को संतुष्ट नहीं किया जा सकता.

इसलिए हमारा प्रयास विवादी को संतुष्ट करने का नहीं अपितु विवाद के शमन के लिए होना चाहिए.

फ़ॉर्वर्ड भेजने वाले और अख़बार देने वाले हॉकर बहुधा एक सी मानसिकता के होते हैं

एक हमारे घर के दरवाज़े पर अख़बार फेंक के चला जाता है, तो दूसरा फ़ॉर्वर्ड मैसेज फ़ॉर्वर्ड करके ग़ायब हो जाता है.

जैसे रोज़ सुबह हमारे घर अख़बार पहुँचाने के बाद भी अधिकतर हॉकर ख़ुद अख़बार नहीं पढ़ते, वैसे ही ये फ़ॉर्वर्ड मैसेज पास करने वाली अधिकांश आत्माएँ भी उन मैसेजेस को नहीं पढ़तीं.

अमूमन इन दोनों को ही नहीं पता होता कि उन्होंने क्या मैसेज, किसको फ़ॉर्वर्ड किया है.

एक दिन मैंने अपने हॉकर को अपने घर के दरवाज़े पर अख़बार फेंकते हुए पकड़ लिया, वे प्रसन्न चित्त थे मैंने उनसे उनकी प्रसन्नता का राज़ जानने के लिए पूछा- भाई आप सबके घर ताज़ा ख़बरें पहुँचते हैं, ख़बरें पढ़कर भी आप प्रसन्न हैं?

वे सपाट स्वर में बोले- मुझमें और आपमें एक अंतर है. मैं ख़बर फेंकता है, आप ख़बर उठाता है. अपुन के लिए ये फेंकने की चीज़ है पढ़ने की नहीं.

मैंने पूछा- आप कहाँ तक पढ़े हैं?
वे बोले- आपसे कम. मैं जानता है कि आपको ख़बर पढ़के, सुनके कंटाल आता है,

अबि आपको समझना चाहिए कि जब आपसे कम पढ़ा लिखा आदमी जिस चीज़ को फेंक रहा है यदि आप उसको उठाईंगा तो आपको कंटाल पक्का होगा.

मैं फेंकता है, आप भी फेंको.. फिर देखो आप भी एकदम मेरे जैसा रापचिक मस्त रहेंगा. अभी Whatsapp भी नहीं खोलने का साब, उधर पे अपुन से भी बड़ा वाला है.

उनके जाने के बाद मैंने विचार किया कि मुझे अपने परिचितों, अपरिचितों, मित्रों, शुभचिंतकों, रिश्तेदारों से निवेदन करना चाहिए कि –

Please do not send me political forwards. क्योंकि इससे देश बदले ना बदले, लेकिन मेरे और आपके और रिश्ते ज़रूर बदल जाएँगे.

नमस्कार

 

जो व्यक्ति, परिस्थिति, या विचार हमें सुप्त अवस्था से निकालकर जागृत अवस्था में खड़ा कर दे, हमारे संघर्ष को घनीभूत कर दे, हमारे सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा कर दे, जो हमारा परिचय शंकाओं से करा दे, उन्हें हम अपना अमित्र या शत्रु मानते हैं.

किंतु ध्यान से देखें तो हमारे शत्रु हमारे परिष्कार में सहायक होते हैं. वे शत्रु ही होते हैं जो हमें सदैव सजग, सतर्क चौकन्ना रखते हैं. इसलिए ये तिरस्कार के नहीं नमस्कार के योग्य होते हैं.

कभी अपने शत्रु को नमस्कार करके देखिए वह तुरंत हमारे परिष्कार में सनद्ध हो जाएगा.

यदि संसार चमत्कार को नमस्कार करता है, तो विश्वास कीजिए नमस्कार में एक अनोखा चमत्कार होता है.

 

 

 

प्रेम

प्रेम जो सभी भावों का जन्मदाता है, इसके शुद्ध शाश्वत स्वरूप की हम सदैव ही चर्चा करते रहे हैं, किंतु इतनी चर्चा के बाद भी प्रेम का वह आधारभूत भाव हमारी चर्या नहीं बन पाया. यह हमारे चिंतन में तो वर्तमान रहा किंतु हमारे आचरण में नहीं उतर पाया.

चाहे व्यक्ति के लिए प्रेम हो या प्रकृति के लिए प्रेम हो? परिवार के लिए प्रेम हो या राष्ट्र के लिए प्रेम हो? नीतियों के प्रति प्रेम हो या मूल्यों के प्रति प्रेम हो? जिस प्रदर्शन को हम प्रेम के नाम से जानते, मानते, और सराहते हैं, क्या ये वही प्रेम है? जिसके दर्शन की शिक्षा, दीक्षा हमें दी जाती रही है?

प्रेम व्यवहार, प्रेम से किया गया व्यवहार और ‘प्रेम के नाम’ पर किए गए व्यवहार में भारी अंतर होता है. हम प्रेम के नाम पर किए गए व्यवहार के प्रतिफल को ही प्रेम के प्रतिफल के रूप में जानने लगे हैं. परिणामस्वरूप प्रेम का विशुद्ध रूप हमें संदिग्ध लगने लगा और प्रेम के विद्रुप रूप को ही हम प्रेम मानने लगे, जिससे हमारा विश्वास प्रेम पर से उठ गया.

अब चूँकि हमारे अस्तित्व को बचाये रखने के लिए प्रेम अवश्यम्भावी है इसलिए प्रेम नहीं तो प्रेम के नाम पर ही सही, के भाव से प्रेरित होकर हम प्रेम की तलाश में प्रेम के पथ को छोड़ कर उससे विपरीत दिशा की ओर कूच कर गए.

सृजन और विध्वंस में हम सामान्य रूप से सृजन को कल्याणकारी मानते हैं किंतु हमें स्मरण रखना चाहिए कि ‘प्रेम की भूमि पर होने वाला विध्वंस भी द्वेष, ईर्ष्या और नफ़रत की भूमि पर पैदा होने वाले सृजन से कहीं अधिक कल्याणकारी होता है.

– आशुतोष राणा

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