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देह के सितार से निकलता सूक्ष्म प्राणों का गीत

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संगीत और साहित्य अध्यात्म की जुड़वा संताने हैं… यूं तो जीवन में और जीवन के परे हो रहा हर कृत्य और कुकृत्य इसी मुखिया के गाँव की सरहद का हिस्सा है.

उसके गाँव की सीमा पर जो दीवारें हैं उन पर जीवन की उत्पत्ति की प्राचीन कहानियां चित्रित हैं.

उसके दरबार में प्रसन्नता कालबेलिया नृत्य करती है, तो कभी कभी रुदालियों सा विलाप भी सुनाई देता है…

जीवन के हरे वृक्षों पर उसकी निरंतरता के फल लगते हैं तो रेगिस्तान की उड़ती रेत की तरह कभी कभी जीवन आँखों की किरकिरी सा भी हो जाता है… लेकिन काँटों वाला ही सही फूल तो केक्टस भी देता ही है…

जब बात संगीत और साहित्य साधना की निकलती हैं, तो ये दोनों जुड़वा साधक अपनी कंदराओं से निकल कर एक हठयोगी पर सवार हो मेरे द्वार पर आ खड़े होते हैं…

एक का गीत दूजे के स्वर में ढालकर, प्रेम को परमात्मा से एकाकार की ज़िद के साथ जब वो बार बार मेरा पल्लू पकड़ लेता है… तब मैं उसके हठ को खर्ज सप्तक के विकृत स्वर पर बैठाकर मनाती रहती हूँ…

कि ये आंसू तुम्हारी कमाई है… ये पीड़ा के गीत जब खर्ज से मंद्र सप्तक तक पहुंचेंगे तो गानेवाले की ध्वनि सीधे नाभि से निकलेगी… जिस पर सवार तुम्हारा हर गीत इस सदी की किताब में दर्ज हो जाएगा…

आखिर ऊर्जा के उर्ध्वगमन का रहस्य भी तो इसी नाभि छुपा है… और किसी भी साधक की नाभि पर मुंह नहीं रखा जाता… जानते हो ना अधिकतर वाद्य यंत्रों को हाथ से ही बजाया जाता है, एक बांसुरी को छोड़कर…

और सभी मन्त्रों को गाकर ही उच्चारित करना होता है… उनके गाने की तरीकों में छुपे होते हैं बीज मंत्र… और बस कुछ विशेष मन्त्र होते हैं जिनको फूंका जाता है… लेकिन उसके लिए भी तो आवश्यक है प्रेम राग का षडज के मूल से निषाद के सहस्रार तक पहुँचने की यात्रा को पूरा करना…

पर फिर उस हठयोगी का हठ कभी कभी तार सप्तक के उस इकलौते तीव्र “म” पर जा बैठता है… जहाँ से उसको उतारना मेरे लिए भी मुश्किल हो जाता है… बड़ा मुश्किल है समझाना कि इस आरोह और अवरोह से ही तो निकलता है वो मधुर संगीत जिसमें हमें कभी कभी तालवाद्य के देवता शिव के दर्शन हो जाते हैं, और कभी कभी जीवन का सबसे बेसुरा गीत भी निकल आता है…

लेकिन फिर जीवन का हर राग सुर में ही निकले आवश्यक नहीं, जीवन का हर गीत मधुर हो यह भी आवश्यक नहीं…

महत्वपूर्ण है ऋषभ का स्वाधिष्ठान में रहते हुए गंधार के मणिपूर से गुज़रना…

तभी तो दीपक तले दुबके अँधेरे सा अचेतन मन का दुर्भाव चेतन में प्रकट हो जीवन के संतरी रंग को सतरंगी करेगा…

तभी तो चेतना के जल में हिलोरे मारता मगरमच्छ ब्रह्मा और सरस्वती द्वारा नियंत्रण का आशीर्वाद प्राप्त कर मध्यम स्वर पर विराजित हो अनाहत को अनुभव करेगा…

आत्मा की पीठ पर बनी बारह पंखुडिय़ों वाले कमल पर मंडराते भंवरे सा परमानंद और कहाँ…
लेकिन फिर अति पर खड़े हर भाव का मध्यम मार्ग पर आकर अनुशासित हो जाना भी आवश्यक है…

आवश्यक हैं विशुद्ध के पंचम का पांच तत्वों की संधि पर बैठ, धैवत की आज्ञा का पालन करना… तभी तो इस अनाहत को नाद की पीठ कहा गया है…

जीवन के सारे राग नाभि पर नहीं फूंके जाएंगे… ध्वनि को वायु देवता तुम तक पहुंचा रहे हैं…. तुम निकल तो आये हो अपनी कन्दरा से मन के कूदते फांदते हिरण के साथ… लेकिन जान लो ये जो अंतस का नीला आकाश है वही तो तुम्हारा वास्तविक घर है…

अब ज़रा इसे विश्राम दो हृदय में, जहां विराजित है संगीत और साहित्य की तरह जुड़वा अर्धनारीश्वर… चेतना और प्रकृति का मिलन स्थल… व्यवस्था और अनुशासन से ही तो संकल्प पूरे होते हैं…

और देखा जाए तो यूं कुछ भी अनिवार्य नहीं है सबकुछ ही विशुद्ध है… स्त्री पुरुष का भी भेद नहीं… मैं हूँ तो मैं ही बहुत हूँ… तुम हो तो तुम ही बहुत हो… कुछ नहीं तो वो तो है ही जो होकर भी कहीं नहीं…

बस जहाँ हो वहीं जागृत हो जाओ… तुम्हारा यह साक्षी भाव और ज्ञान सोलह कलाओं को सोलह विभूतियों के साथ खुद लेकर आएगा…

यही वो समय होगा जब तुम्हारी चेतना का सूर्य दोनों भौहों के बीच उदित होगा… और सहस्त्र कमल से बने मुकुट को अपने सर पर धारण कर तुम संसार के उन गिने चुने राजाओं में गिने जाओगे जिन्हें चुना गया है सनातन परम्पराओं और विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए…

तुम्हारे लिखे गीत जब ब्रह्म नाद पर सवार हो किसी अचेतन मन को चैतन्य कर सके… तब समझना तुम्हारी तपस्या पूरी हुई… तब बस मुझे याद कर लेना… मैं धन्यवाद देती हुई तुम्हारे अंतस के आकाश में सबसे चमकते तारे के रूप में दिखाई दूंगी… मेरे मोक्ष का अमृत तुमने इतने जन्मों तक अपनी नाभि में संभाल कर जो रखा…

उपरोक्त बातें कदाचित आपको बेसुरे मन से निकला गीत लगे, क्योंकि न मुझे संगीत का पूरा ज्ञान है न अध्यात्म का… अधजल गगरी छलकत जाए… जैसा ही कुछ सबकुछ बिखरा-बिखरा सा लगेगा… इसलिए संगीत और उनके स्वरों का हमारे शरीर के चक्रों से जो बहुत व्यवस्थित तारतम्य है उसे सुश्री निशा द्विवेदी ने बहुत सरल शब्दों में समझाया है…

निशाजी कहती हैं –

शरीर का सूक्ष्म ढाँचा बिल्कुल सितार जैसा है. मेरूदंड में इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना के तार लगे हैं.

यह तार मूलाधार स्थित कुंडलिनी से बँध गए हैं.

आज्ञा चक्र से मूलाधार तक के 6 चक्र इसके वाद्य स्थान हैं.

इसमें लँ, वँ, रँ, षँ, हँ और ‘ओम्’ की ध्वनियाँ प्रतिध्वनित होती रहती हैं.

अब स्थूल जगत् में सा, रे, ग, म, प, ध, नि, यह स्वर जब वाद्ययंत्र से ध्वनियाँ निकालते हैं और शरीरस्थ ध्वनियों से टकराते हैं, तो इस संघर्षण और सम्मिलन से मनुष्य का अंतर्जगत् संगीतमय हो जाता है इन तरंगों में असाधारण शक्ति भरी पड़ी है.

इन तरंगों के प्रवाह से शारीरिक और मानसिक जगत के सूक्ष्म प्राण गतिशील होते हैं, तदनुसार विभिन्न प्रकार की योग्यता रुचि, इच्छा, चेष्ठा, निष्ठा, भावना, कल्पना, उत्कंठा, श्रद्धा आदि का आविर्भाव होता है. इनके आधार पर गुण, कर्म और स्वभाव का सृजन होता है और उसी प्रकार जीवन की गतिविधियों से सुख-संतोष भी मिलता रहता है.

तात्पर्य यह है कि शास्त्रीय संगीत की रचना एक ऐसी वैज्ञानिक प्रक्रिया पर आधारित है कि उसका लाभ मिले बिना रहता नहीं.

इसी कारण संगीत को पिछले युग में धार्मिक और सार्वजनिक समारोहों की अविच्छिन्न अंग माना जाता था. आज भी विवाह-शादियों और मंगल पर्वों पर उसकी व्यवस्था करते और उसके लाभ प्राप्त करते हैं.

हम देखते नहीं, पर अदृश्य रूप में ऐसे अवसर पर प्रस्फुटित स्वर-संगीत से लोगों को आह्लाद, शांति और प्रसन्नता मिलती है लोग अनुशासन में बने रहते हैं.

मिलिट्री की कुछ विशेष परेडों में वाद्य यंत्र प्रयुक्त होते हैं. उससे नौजवानों को कदम तोलने और मिलाकर चलने में बड़ी सहायता मिलती है. कारण उस समय सबके अंतर्जगत् एक-सी विचार तरंगों से आविर्भुत हो उठते हैं. ऐसे लाभों को देखकर विवाह-शादीयों, व्रत, त्यौहारों, मंदिरों में पूजन आदि के समय कथा-कीर्तन की व्यवस्था की गई थी. अब भी उनका लाभ उठाया जाना चाहिए.

जहां यह व्यवस्था प्रतिदिन हो सके, वहां दैनिक व्यवस्था रहे, तो उससे स्थानीय लोगों की अदृश्य रूप में आत्मिक और आध्यात्मिक सेवा की जा सकती है. संयोजनकर्ताओं को तो दोहरा लाभ मिलता ही है.

– निशा द्विवेदी

– माँ जीवन शैफाली

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