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सामाजिक से प्राकृतिक होने की प्रक्रिया का नाम है अध्यात्म

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आध्यात्मिक लोग भी दो तरह के होते हैं. एक जो आधुनिक से ग्रामीण हो जाते हैं, मेरे जैसे आदिम, ठेठ… सदैव के अज्ञानी जिन्हें वास्तव में कुछ नहीं आता लेकिन जिससे जो सीखने को मिल जाए सीखता चला जाता है… जितना सीखता जाता है उतना ही ग्राम भी छूट जाता है… छंटाक भर आध्यात्मिकता में खुश, अपने ही जादू में सराबोर…

दूसरे होते हैं जो जितने ज्ञानी होते जाते हैं, उतने ही आध्यात्मिक और उतने ही आधुनिक… पूजा-पाठ, तंत्र-मंत्र से उनका कोई वास्ता नहीं होता… गलत वो भी नहीं, सबके अपने-अपने रास्ते हैं, जिसको अपने स्वभाव के अनुसार जो सुविधाजनक लगे… बस अपने इस “स्व” भाव को पहचानना आना चाहिए…

ऐसा न हो कि आपका स्वभाव मेरी तरह ग्रामीण और अज्ञानी हो जाने के अनुसार बना हो और आप अपने ज्ञान के कारण आधुनिकता को रास्ता बना रहे हो, ऐसे में आप कितना भी चलते जाएं कहीं पहुँच नहीं पाएंगे और ज्ञान के बोझ के साथ थक जाएंगे…

अब आप इस आधुनिक और ग्रामीण शब्द में न अटक जाइयेगा, ये बस दो रास्तों को समझाने के लिए शब्दों का चुनाव भर है…

इसे भोजन व्यवस्था के उदाहरण के साथ समझते हैं…

अब जैसे मैं जब तक ज़रूरी न हो मिक्सी या किसी भी ऐसी आधुनिक मशीन का उपयोग नहीं करती जो बहुत तेज़ी से चलकर खाद्य पदार्थ को पीस देती है… आप इसके पीछे के वैज्ञानिक कारण लगाते रहिये, मेरे अपने अनुभव है… जिसका मैं कोई प्रमाण नहीं दे सकती…

हम लोग कहते ज़रूर हैं सिल बट्टे पर पीसी चटनी-मसाले में जो स्वाद है वो मिक्सी में पीसी चटनी में नहीं. क्यों? कुछ लोग माँ के हाथ का प्यार कहेंगे, कुछ लोग पारंपरिक तरीके की प्रशंसा करेंगे…

मेरे कारण कुछ भिन्न है. मेरे लिए खाद्य पदार्थ में भी चेतना है… जितना हम उसे प्यार से, सहलाकर, उसकी ऊर्जा को कम से कम नष्ट किये बिना उसे उपयोग में लाएंगे उतनी ही सेहत के लिए कारगर होगी…

मिक्सी में एक झटके में पीस लेने का ‘मेरे लिए’ मतलब है, मैंने उसकी हत्या कर दी… ऊर्जा पूरी तरह से ख़त्म… और मृत पदार्थ को खाने का क्या फायदा… शरीर को शायद लग भी जाए… आपकी चेतना तक ना पहुंचेगी उसकी ऊर्जा…

उपरोक्त कारण पर विश्वास करने के लिए आप बिलकुल बाध्य नहीं है, ये मेरे व्यक्तिगत कारण है, जिसको मैंने अपने अनुभव से जाना है. आप इसका ठीक उल्टा उदाहरण प्रस्तुत करेंगे हलाल और झटका का उदाहरण देकर. लेकिन उसके लिए भी आगे बात और विस्तार से कही गयी है.

तो वज़न कम करने और थाइरॉइड के नियंत्रण के लिए जब कहा था अलसी को खाने के साथ साथ उसे आते जाते प्यार से निहारते रहिये… तब भी कदाचित आपको मेरी इस बात पर हंसी आई होगी…

लेकिन क्या करूं मेरे अनुभव इतने पुख्ता है कि मुझे इन पर पूरी आस्था है… या ये कहूं कि मेरी आस्था इतनी दृढ़ है कि अनुभव भी उसी अनुसार होते रहते हैं.

घर में अलसी बहुत दिनों से ख़त्म हो गयी है, आसपास कहीं मिलती नहीं, उसे लेने ज़रा दूर तक जाना पड़ता है… उस तरफ जाना नहीं हो रहा, मैं उसे ऐसे याद करती हूँ जैसे कोई प्रेमिका अपने बिछड़े प्रेमी को याद करती है… दिन में दो चार बार तो मुंह से निकल ही जाता है… अरे यार अलसी को लेने जाना है… मेरी प्यारी अलसी मैं बिलकुल आलसी नहीं, मैं जानती हूँ जितना तुम्हारे लिए तड़पूंगी, मिलने पर तुम मुझे दोगुना प्यार दोगी…

मैं ऐसी ही हूँ… मेरे संवाद चेतना स्तर पर होते हैं… चाहे निर्जीव हो या सजीव… इस सन्दर्भ में मुझे अभिषेक सचान का एक लेख याद आता है, इसे कदाचित आप और अधिक स्वीकार्य कारण के साथ समझ सके.

अभिषेक कहते हैं – कौन कैसे जान छोड़ता है, इसी से तय होता है वो हमारी सभ्यता में खाद्य है या नहीं

एक मुर्गी की जान कितनी होती है, कुछ नहीं होती है…. ये गर्दन पकड़ी, दो बार घुमाई और काम ख़त्म…..

एक बकरे की जान कितनी होती है… मार के देख लेते हैं… बकरे के पैर बाँध दीजिये… एक बड़ा चाकू लेकर बकरे की गर्दन में चीरा मार दो.. दिल सारा खून पंप करके बाहर फेंक देगा… तब तक बकरा चीखने की कोशिश करता रहेगा…. लेकिन श्वांस नली फट जाने से उसकी चीख नहीं बस हवा की आवाज सुनाई देगी…..ये तो हुआ हलाल…

अन्यथा, यदि आपने हिन्दू होने का पाप किया है तो आप झटका भी ट्राय कर सकते हैं….. एक भारी चाकू बकरे की गर्दन पर दो-चार बार मारिये और सर अलग… बकरा बिना सर के भी दौड़ लगा सकता है…..आपको यहाँ भी पैर बाँधने पड़ेंगे. यहाँ बकरे की वेदना आपको सुनाई नहीं पड़ेगी…..और शायद उसको महसूस भी नहीं होती होगी क्योंकि दिमाग की सप्लाई आपने एक झटके में काट दी.

एक गाय/भैंसे की जान कितनी होती है? जिनको ऊपर का दृश्य कल्पना करके मितली आ गयी हो वो ये समझ लें कि भैंसे और गाय की कटाई देखते ही आपको हृदयाघात भी आ सकता है. झटका पद्धति से उनकी जान लेने में भारी भरकम चाक़ू से कई कई वार करने पड़ते हैं. और हलाल प्रक्रिया में मेरा चैलेंज है कि कोई सांड/भैसे को बिना बांधे काट मार कर दिखाये. यही घायल सांड यदि जान न लेले तो बोलना.

ये तो आँखों से दिखता है कि कौन कैसे जान छोड़ता है, तो इसी इमोशन से हम तय करते हैं कि वो हमारी सभ्यता में खाद्य है या नहीं. ये कोई रॉकेट साइंस नहीं है….. दाल-चावल और अन्य अनाज के भ्रूण/बीज बिलकुल शांति से मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं तो उनको वेजिटेरियन मान लिया गया.

अनाज से भी अच्छे फल हैं जिनमें आप पेट भी भर लेते हैं और जीवन (बीज) को भी बचा लेते हैं. इसीलिए व्रत आदि में फलों को विशेष स्थान है. जड़ों को भी आप इसी दृष्टि से देख सकते हैं, बशर्ते जड़ बीज न हो.

ऐसे में जब मैं कहती हूँ शाकाहार और मांसाहार दो भाव के नाम है तो ‘मेरे लिए’ ये भाव ही है… आप उसे स्वीकारने के लिए बिलकुल बाध्य नहीं… जैसे आप एक बच्चे को बिना ये बताए खाना खिलाइए कि वो शाकाहारी भोजन कर रहा है या मांसाहारी तो वो दोनों तरह के भोजन को समभाव से ग्रहण करेगा…

मेरे खुद के जीवन में ऐसी कई घटनाएं हैं जब मुझे मांसाहार प्रसाद के रूप में मिला और मैंने उसे वैसे ही ग्रहण किया जैसे मैं माता के भंडारे का प्रसाद ग्रहण करती हूँ.

इसे कई लोग आध्यात्मिकता से जोड़ लेते हैं, कि मांसाहार करने वाला कैसे परमात्मा तक पहुँच सकता है, आप यदि शाकाहारी हैं, और औरत के गुलाबी मांस पर आपकी लार टपकती है तो आप उस मांसाहारी से अधिक मांसाहारी हुए जिन्होंने मांसाहारी होते हुए भी निर्वाण प्राप्त किया है.

मेरे आध्यात्मिक गुरु श्री एम की पुस्तक “हिमालयीन गुरु के साए में” में दो जगह इस तरह की घटना का ज़िक्र है, जब उनके आध्यात्मिक गुरू जिनको वो बाबाजी कहते थे वो सूफी साधुओं के साथ बैठकर बिरयानी खाते हैं और किसी महिला को शराब के नशे से मुक्त करवाने के लिए शुरू में उनके साथ बैठकर शराब पीते हैं…

उनकी पुस्तक में माई माँ का ज़िक्र है, जिनको जब कहीं से भोजन नहीं मिलता था तो वो समुद्र से खाली हाथों से मछलियाँ पकड़ लाती थीं और बिना किसी ज्वलनशील वस्तु की मदद के मात्र फूंक मारकर आग जलाकर मछलियाँ उन पर भूनकर खाती थी… माई माँ वह है जिनके बारे में कहा जाता है कि वो कई सौ वर्ष तक जीवित रहीं और कई लोगों ने उन्हें पानी पर चलते हुए या बैठे हुए देखा है…

कहते हैं रामकृष्ण परमहंस खाने के बहुत शौक़ीन थे, उन्हें माँ शारदा के हाथ से बनी मछली बहुत प्रिय थी. अब यदि एक परमहंस मांसाहारी हो सकता है तो हम क्यों नहीं. लेकिन फर्क है, फर्क ये है कि आप किस भाव से भोजन ग्रहण कर रहे हैं.

यदि आप शाकाहारी भोजन करते समय भी क्रोध में है तो वो भी आपके लिए विष हो जाता है और यदि आप मांसाहार करते हुए भी भक्ति में हैं तो वो आपके लिए प्रसाद हो जाता है.

बाकी मैं मांसाहार के पक्ष में बिलकुल नहीं हूँ… बस एक नज़रिया यह भी होता है यह बताना था… क्योंकि जब जीवन बचाने के लिए कुछ न मिले तो अच्छा भला शाकाहारी भी कैसे मांसाहारी हो जाता है उसके लिए आप फिल्म Life Of Pi देखिये…

बात जीवन में परिस्थतियों की है, ज़ुबान के स्वाद के लिए खाने वालों को इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं यहाँ उन लोगों के समक्ष बात रख रही हूँ जो जानना चाहते हैं कि सामाजिक से प्राकृतिक होने की प्रक्रिया का नाम अध्यात्म कैसे हुआ.

वो ऐसे हुआ कि मुझ जैसा व्यक्ति जो शाकाहारी खाद्य पदार्थ को भी मिक्सी के बजाय कम से कम चोट पहुंचाए बिना सिल बट्टे के उपयोग से ग्रहण करता है वो किसी मज़ार पर मिल रहे मांसाहार को भी प्रसाद रूप में ग्रहण कर सकता है. वो व्यक्ति सामाजिक हुआ या प्राकृतिक?

अब इसका ठीक उल्टा सोचिये… प्राकृतिक से सामाजिक हो जाने का मतलब आप भौतिकवादी हो गए नहीं होता. एक बार आप प्राकृतिक हो जाते हैं तो आपके सामाजिक रिश्ते और अधिक मजबूत हो जाते हैं… जो व्यक्ति प्रकृति से इतना एकाकार हो जाए वो समाज से जुड़े लोगों से भी उतना ही प्रेमपूर्ण हो जाता है. आखिर वो भी प्रकृति का ही तो हिस्सा है ना. जो व्यक्ति निर्जीव वस्तु से चेतना स्तर पर संवाद स्थापित करता है वह प्राणियों और मनुष्यों के प्रति भी कितना संवेदनशील हो जाएगा.

लेकिन फिर भी हम कुछ सामाजिक लोगों से चेतना स्तर पर नहीं जुड़ पाते हैं क्योंकि वहां सामने वाले की चेतना भी तो काम कर रही है, जो आपके भाव के विपरीत भाव रखती हुई हो सकती है. ये तभी संभव है जब व्यक्ति एक फूल की तरह निर्दोष भाव से प्रतिक्रिया दे, बिना व्यक्तिगत भावना बीच में लाए. इसलिए जितना आप सरल होंगे उतने ही प्राकृतिक उतने ही आध्यात्मिक…

– माँ जीवन शैफाली

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