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बंदिनी : मन की किताब से तुम मेरा नाम ही मिटा देना…

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चारुचंद्र चक्रवर्ती की बांग्ला कहानी ‘तामसी’, पर आधारित बिमल रॉय की 1963 निर्मित फ़िल्म “बन्दिनी” हर बार मन में एक गहरा असर डालती है.

हत्या के अपराध में सज़ा काट रही कल्याणी (नूतन) का विप्लवी, क्राँतिकारी बिकाश घोष(अशोक कुमार) के साथ प्रेम, डाह, बदले और समर्पण की अद्भुत कहानी है बन्दिनी.

प्रेम में छल की पीड़ा बंदिनी की आंखों से छलकती है. पूरी फ़िल्म में नूतन जी की आंखों ने ही संवाद किया. इस फ़िल्म में बिकाश की भूमिका को मैं एक कायर प्रेमी के रूप में देखती हूँ.

बर्मन दादा का यादगार संगीत, गुलज़ार और शैलेंद्र के गीत, तथा नबेंदु की पटकथा ने फ़िल्म को कल्ट क्लासिक का दर्ज़ा दिया. इस फिल्म का पहला गीत आशा जी की खनकती आवाज़ में जिसे मै अक्सर गुनगुनाती हूँ…..

“ओ पँछी प्यारे, साँझ सकारे बोले ये कौन सी बोली बता रे”. जेल में कैद महिला कैदियों की आँखों के दर्द और आक्रोश को कैमरामैन ने बख़ूबी कैद किया.

जेल के डॉक्टर देवेंद्र (धर्मेंद्र) समाज की समस्त बंदिशों को तोड़कर कल्याणी को अपनी जीवन संगिनी बनाना चाहता है. “कल्याणी, मैं तुमसे ब्याह करना चाहता हूँ”. देवेंद्र के इस सवाल पर पैर के अँगूठे से ज़मीन पर लकीरें खींचती कल्याणी कहती है “डाक्टर बाबू मैं हत्या के जुर्म की सजा काटती अपराधी हूँ. समाज कभी स्वीकार नही करेगा”.

देवेंद्र ने जवाब दिया, “ऐसे समाज पे थूकता हूँ मै”. दोनों का यह पहला क्लोज़ अप शॉट था.

देवेंद्र के आक्रोश और कल्याणी की मजबूरी को डायरेक्टर ने बख़ूबी कैमरे में क़ैद किया. रोचक बात ये थी कि बिमल रॉय ने नूतन जी के समक्ष ये शर्त रखी थी कि उनको बिना मेकअप के अभिनय करना होगा. नूतन जी जैसी उत्कृष्ट कलाकार ने सहर्ष स्वीकार किया उनकी इस शर्त को. और दर्शकों ने उन्हें इस रूप में बेहद सराहा.

लॉन्ग शॉट पे खुले आसमान से होते हुए जेल की ऊँची दीवारों पे टिकी कल्याणी की सूनी उदास निगाहों का बिमल रॉय ने उत्कृष्ट इस्तेमाल किया इस गीत के माध्यम से

“अब के बरस भेजे भैय्या को बाबुल”!

कहानी आज़ादी के पहले की है, जब देशभक्त क्रांतिकारी हंसते हंसते फांसी के फंदे पे झूल जाया करते थे. यहाँ फिर से डायरेक्टर ने क्लोज़ अप का इस्तेमाल किया ऐसी ही एक शहीद होने जा रहे विप्लवी की माँ के चेहरे का. माँ का छोटा सा रोल दुलारी ने अभिनीत किया इस गीत के द्वारा

“मत रो माता लाल तेरे बहुतेरे…

पोस्टमास्टर की बेटी कल्याणी विप्लवी बिकाश से प्रेम कर बैठती है…

“जोगी जब से तू आया मेरे द्वारे, मेरे रंग गए साँझ सकारे”

बिकाश और कल्याणी का प्रेम परवान चढ़ता है और कल्याणी चाँद को कोसते हुए गुनगुना उठती है….

बदली हटा के चन्दा, चुपके से झाँके चन्दा
तोहे राहू लागे बैरी, मुस्काए जी जलाई के
कुछ खो दिया है पायके, कुछ पा लिया गवाई के
कहाँ ले चला है मनवा, मोहे बावरी बनाई के…

मोरा गोरा अंग लई ले मोहे शाम रंग दई दे…..

विप्लवी प्रेमी पुलिस को चकमा दे भाग जाता है. गांव भर में कल्याणी और उसके पोस्टमास्टर पिता की बदनामी होती है. कल्याणी से सहन नहीं होता और वो एक रात चुपचाप गाँव छोड़ चली जाती है. यहाँ इस गीत के साथ नदी किनारे रेत पर कल्याणी के पांव के निशान पर फोकस किया गया कैमरा….

“ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना”…..

फ़िल्म का क्लाइमैक्स उसका आखिरी सीन है. मणिहारी घाट पर बीमार बिकाश से अचानक भेंट होना. कल्याणी अपने सुनहरे भविष्य की तिलांजलि दे, बीमार प्रेमी के साथ उसकी सेवा हेतु चल देती है…

“मेरे साजन है उस पार, मैं मन मार हूँ इस मार, ओ मेरे माझी अबकी बार ले चल पार”

मित्रों, आँखें अभी तक नम हैं. आज बह जाने दिया आँसुओं को.

जाते जाते,
“मै बन्दिनी पिया की, मै संगिनी हूँ साजन की
मुझे आज की विदा का मर के भी रहता इंतज़ार”….

– रिंकू चटर्जी

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1 thought on “बंदिनी : मन की किताब से तुम मेरा नाम ही मिटा देना…”

  1. Uday Kumar Pandey says:

    फ़िल्म के गीतकार को भी श्रेय जाता है न दी, जिन्होंने इतने सुंदर और अर्थपूर्ण गीत लिखें।
    मैंने पूरी फिल्म तो नहीं देखी है , हाँ गाने अक्सर सुनता रहता हूँ,
    ” मुझे आज की विदा का, मर कर भी रहता इंतज़ार…..”

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