Menu

Author: Making India Desk

यह सुरेंद्र मोहन पाठक के लिए खतरे की घंटी है…

मैं किशोरावस्था में तथाकथित लुगदी साहित्य का बड़ा प्रेमी था। हां, हमलोग उसे जासूसी नॉवेल कहते थे। सुरेंद्र मोहन पाठक, वेदप्रकाश शर्मा के साथ मैं तो जेम्स हेडली चेइज और रीमा भारती, केशव पंडित जैसों को भी खूब पढ़ता था। हालांकि, इनमें पाठकजी को पढ़कर हमेशा ही लगता रहा जैसे वह व्यक्ति अपनी वर्तमान स्थिति […]

Read More

#AskAmma : प्रेम में देह की भूमिका और SEX की कामना

मुझसे जुड़ें मित्रगण अलग अलग अवसरों पर अलग अलग लेख पर या इनबॉक्स में कुछ व्यक्तिगत तो कुछ सामान्य प्रश्न मुझसे पूछा करते हैं. जैसा कि मैं हमेशा कहती हूँ मैं कोई बहुत बड़ी ज्ञानी नहीं हूँ जो सबके प्रश्नों का उत्तर जानती हूँ या मुझे सब पता है, और सबसे बड़ी बात मैं जो […]

Read More

कान्हा के अंतिम दर्शन

अश्वत्थ वृक्ष के नीचे तने के साथ अपनी भुजा को सिर के पीछे लगाये पीठ के सहारे अर्धशयन मुद्रा में वे बैठे हुए थे, दाँया पैर बाँये घुटने पर रखे हुए अर्धनिमीलित नेत्रों से शून्य में देखते हुए से। बांया चरण घुटने पर होने के कारण हवा में था जिसका तलवा प्रातःकाल के उदित होते […]

Read More

अँगरेज़ की कहानी : जादूगरनी

You are my dream girl यही तो कहा था मैंने उसे… और जब उसने कहानियाँ लिखना शुरू की तो मुझे ही अपने स्वप्न लोक में उतार लाई… अब उसे जादूगरनी ना कहूं तो क्या कहूं… कौन किसके सपनों का पात्र है यही तय नहीं हो पा रहा…. कभी किताबों में पढ़ी थीं ऐसी कहानियाँ… रहस्यलोक […]

Read More

नायिका – 6 : न आया माना हमें cheques पर हस्ताक्षर करना, बड़ी कारीगरी से हम दिलों पर नाम लिखते हैं

पिछले भाग में आपने पढ़ा कि एक महीने के अंतराल के बाद नायिका नायक के ईमेल का जवाब भेजती है, जिसके जवाब में जनाब लिखते हैं – बेग़म अख्तर गा रही हैं, शायद सुदर्शन फ़ाकिर का क़लाम है – ज़िंदगी कुछ भी नहीं फिर भी जिये जाते हैं! तुझपे ए वक़्त हम एहसान किये जाते […]

Read More

तुलसी कल्याणं : देव जागो कि मुझे ब्याह रचाना है…

कथाएँ चाहे काल्पनिक हो, उसके पीछे के सन्देश काल्पनिक नहीं होते. धर्म पथ पर चलने के लिए देवताओं तक को श्राप और कलंक माथे पर लिए घूमना पड़ता है… लेकिन ये धर्म पथ पर चलने का ही पुरस्कार है कि श्राप भी आशीर्वाद में बदल जाता है… असुर जलंधर की आसुरी शक्ति से हारे शिव […]

Read More

मैं और मेरी किताबें अक्सर ये बातें करते हैं : हस्या ई कंजर

नामचीन उपन्यासकार और पॉकेट बुक्स के शहंशाह सुरेन्द्र मोहन पाठक की जब मैं नई-नई पाठिका बनी थी तब उन्हें एक लंबा सा पत्र लिखा था. वो पत्र उन तक पहुँच पाया या नहीं ये मुझे नहीं पता…. उस समय ज्योतिर्मय मेरे गर्भ में थे… 2009 में लिखे उस पत्र को मैं ज्यों का त्यों आपके […]

Read More

ME TOO अभियान और यौनेच्छा समर्थक त्रिअंकीय धाराएँ

समय महाभारत काल स्थान – कुरुक्षेत्र के आस पास बलराम से द्रौपदी ने पूछा – देव, मनुष्य की सबसे बड़ी कमज़ोरी क्या है। बलराम ने उत्तर दिया – उसके खुद के किए गये पाप। और यह खबर पहुँची कुरुक्षेत्र में जहाँ दुर्योधन और भीम का निर्णायक युद्ध चरम पर था। भीम जय की कोई भी […]

Read More

बोले रे पपीहरा…

पपीहा जब बोलता है तो बोलता ही चला जाता है, जैसे मस्तिष्क ज्वर से पीड़ित व्यक्ति कराहता है तो कराहता हीं चला जाता है। इसकी आवाज़ में दर्द होता है। इसीलिए इसे मस्तिष्क ज्वर की चिड़िया भी कहते हैं। वैसे ध्यान से सुनने में इसकी आवाज़ “पी कहां, पी कहां” जैसी लगती है। इसी से […]

Read More

ओ हंसनी… कहाँ उड़ चली… – 2

सरधो दीदी नाम तो उनका शारदा था पर लोग उन्हें सरधो पुकारते थे। उसमें प्रेम का अपभ्रंश कितना हुआ था, कहना मुश्किल है। मेरे लिए वे सरधो दीदी थीं। जबसे मैंने सरधो दीदी की संज्ञा को समझना शुरू किया तब से उन्हें एकनिष्ठ देखा। वही सफेद धोती, वही धवल हास और शंभु भैया के लिए […]

Read More
error: Content is protected !!