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#AskAmma : प्रेम में देह की भूमिका और SEX की कामना

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मुझसे जुड़ें मित्रगण अलग अलग अवसरों पर अलग अलग लेख पर या इनबॉक्स में कुछ व्यक्तिगत तो कुछ सामान्य प्रश्न मुझसे पूछा करते हैं. जैसा कि मैं हमेशा कहती हूँ मैं कोई बहुत बड़ी ज्ञानी नहीं हूँ जो सबके प्रश्नों का उत्तर जानती हूँ या मुझे सब पता है, और सबसे बड़ी बात मैं जो जवाब देती हूँ उसके सार्वभौमिक सत्य होने का कोई दावा भी नहीं करती…

जो कुछ भी मैं कहती हूँ वह मेरे अपने अनुभवों के साथ मेरे मन की मौज है, मेरी अपनी जीवन शैली है… जो आपकी धारणाओं से बिलकुल विपरीत भी हो सकती है…

इसलिए मेरे कहे और लिखे से पूर्ण सहमत होने के बजाय कई लोग उसमें से ऐसी कोई बात खोज निकालते हैं जो उनके प्रश्नों का जवाब देती हुई सी प्रतीत होती हैं…

जिन लोगों को मैं तुरंत जवाब नहीं दे पाती उसके दो कारण होते हैं, पहला व्यस्तता, दूसरा मुझे उसका जवाब नहीं पता होता… लेकिन प्रश्न आया है तो जवाब देना मेरा धर्म है ऐसा मुझे लगता है, कम से कम उन लोगों के प्रति जो मुझसे ह्रदय से जुड़े हैं…

तो उत्तर आने की मैं प्रतीक्षा करती हूँ… मुझे स्वयं भी प्रतीक्षा और उत्सुकता होती है कि उत्तर कहाँ से आएगा…

और जैसी मेरी आस्था है, मुझे यदि प्रतीक्षा है तो उसका प्रकटीकरण अवश्य होता है… तो किसी न किसी माध्यम से उत्तर भी प्रकट होता है… चूंकि आजकल सद्गुरू से तार अधिक जुड़े अनुभव होते हैं, तो जवाब भी उनकी ओर से ही आया…

तो इस बार प्रश्न प्रेम में देह की भूमिका और भोग की कामना के जागने से सम्बंधित था… सद्गुरु ने जो कुछ कहा उसे मैं अपने शब्दों में समझाने का प्रयास कर रही हूँ…

कि हर वस्तु के उपभोग का एक तरीका होता है, जिसे विशेष तरीके और डिग्निटी के साथ संपन्न करना होता है क्योंकि हम मनुष्य हैं, हम पशुओं की तरह कहीं भी खाना पीना और यौन क्रिया नहीं कर सकते… आप दस लोगों के बीच दो हाथों से खाने लग जाए, या ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगे तो आप असभ्य और पशु स्तर के कहलाएंगे… इसलिए बात जब sex की आती है तब भी हमें वह सभ्यता और डिग्निटी बनाए रखना होती है…

और जहाँ तक प्रेम में sex की कामना का प्रश्न है तो इसे आपको अलग रूप में देखना होगा… जैसे शरीर को भूख लगती है तो उसे भोजन की आवश्यकता होती है, वैसे ही sex भी एक तरह से देह की आवश्यकता से अधिक कुछ नहीं…

जैसे आप भोजन हमेशा अपनी पसंद का करना चाहते हैं, वही बात यहाँ sex पर भी लागू होती है… जैसे भूख से अधिक भोजन कर लेने से स्वास्थ्य को खतरा होता है वही बात sex पर भी लागू होती है…

अपना मनपसन्द भोजन देखकर आपकी भूख प्रबल होती है, वैसे ही यदि आप किसी के प्रेम में हैं तो उसके लिए एक विशेष तरह के हारमोंस रिलीज़ होते हैं… जिसे हम प्रेम का नाम देकर अपनी शारीरिक कामनाओं की पूर्ति करना चाहते हैं… ऐसा कहते हुए सद्गुरु हमेशा यह कहते हैं कि -I don’t want to destroy all the romance”…

यदि आप प्रेम में हैं तो एक मीठा सा अनुभव आपको घेरे रहता है और आपके चारों तरफ दुनिया आपको प्रेम से भरी लगने लगती है… लेकिन यह दुनिया तो पहले भी वैसे ही थी… बस आपका देखने का तरीका बदला है… तो यह जो प्रेम है वह बाहर से नहीं आया, वह आपके अन्दर पहले से मौजूद था, बाहर से किसी व्यक्ति ने बस उसे stimulate किया है… वह एक stimulant से अधिक कुछ नहीं… और यह कहने के बाद जब वह कहते हैं कि I don’t want to destroy all the romance”…

तब मैं उनको सुनते हुए उनसे बस यही कहती हूँ… अब और भी कुछ नष्ट होने को बचा है??

हाँ बचा है वह है आपके अन्दर का प्रेम जो किसी भी परिस्थिति में नष्ट नहीं होता… चाहे आप किसी के प्रेम में हैं या नहीं अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि आप उस कभी न नष्ट होने वाले प्रेम को जान कर स्वयं प्रेम हो गए हैं…

चलिए एक बार फिर हम प्रेम में देह की भूमिका और भोग की कामना की बात करते हैं…

जहाँ तक मै जानती हूँ सड़क पर खड़े होकर खाना हमारी सभ्यता में नहीं था, यह विदेश से आई परंपरा है… हमारे यहाँ भोजन के लिए सर पर छत होना आवश्यक है…

होटल-मोटेल जैसी व्यवस्था हमारे यहाँ नहीं थी, हमारे यहाँ सामूहिक भोजन भी पांडाल के नीचे या, मंदिरों में भंडारे के प्रसाद में होता आया है… सामूहिक रूप से कहीं ठहरने के स्थान को भी “धर्मशाला” कहा जाता है… क्यों?? ऐसी किसी शाला में धर्म शब्द की क्या उपयोगिता?

अर्थात जब आप एक समूह में रहते हैं तो कुछ विशेष जीवन शैली को धारण करते हैं जो सबके लिए उपयुक्त हो… अर्थात वह धार्मिक होती है… धर्म जो धारण किया जा सके… (यहाँ बात मात्र सामाजिक स्तर की हो रही है क्योंकि प्रश्न भी समाज के सभ्य लोगों के बीच से आये हैं)

जब भी ऐसी कोई परंपरा हमने विदेशों से अपनाई है हमारे सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास हुआ है…
यही बात यौन क्रियाओं पर भी लागू होती है…

मेरा इस विषय पर अधिक अध्ययन नहीं है, यदि किसी को जानकारी हो तो बताएं क्या हमारी पुस्तकों में राम और कृष्ण के काल में गणिकाओं या देवदासियों का कोई ज़िक्र है?
हाँ तवायफों और वेश्याओं का आगमन मुग़लों के आक्रमण के बाद हुआ…

हमारे यहाँ सनातन काल से यौन, प्रेम के प्रकटन, परिवार की निरंतरता और किसी विशेष परिस्थिति में तंत्र का अंग रही है… (हालांकि जीवन की सारी प्रक्रियाएं ही तंत्र का एक अंग है परन्तु इस पर विस्तार से फिर कभी)..

सद्गुरु कहते हैं… यह संसार हमेशा से दो में विभक्त रहा है… स्त्री और पुरुष… और इसलिए दो का हमेशा आकर्षण होता है एक हो जाने को आतुर… जिसे योग कहा जाता है… जहाँ आनंद है, भावनाएं हैं… फिर भी Sex और Sexuality में आपको फर्क समझना होगा..

sex हमेशा से है आपके अन्दर लेकिन sexuality आपने मानसिक रूप से बनाई है… इसलिए Sex जब तक देह में है वह ठीक है लेकिन जब वह मस्तिष्क में घर कर लेता है तब आप उसके गुलाम हो जाते हैं…

सद्गुरु कहते हैं – हम 90% ऊर्जा सिर्फ sex के करने या उसके विरोध में ख़त्म कर देते हैं… एक छोटी सी शारीरिक आवश्यकता को हमने इतना बड़ा कर दिया है कि उसके बारे में खुल कर बात करने में भी हमें झिझक होती है…

कारण… हमने स्त्री और पुरुष को इतना अलग कर दिया है जैसे वे दो अलग प्रजाति के हो… इतना अंतर तो पशु भी नहीं रखते जितना हमने स्त्री और पुरुष को अलग कर दिया है, सिर्फ और सिर्फ दैहिक अंतर के करण…

इसे बहुत अधिक दर्शन मत बनाइये यह सिर्फ जीव विज्ञान है…. पहले आप इसे सही गलत में तौलते हैं फिर उस गलत के आकर्षण में फंसकर उसे सही साबित करने के लिए उस के आस पास दर्शन रचते हैं…. जो जैसा है वैसे ही स्वीकार कीजिये…

आप प्रेम में है, दो से एक हो जाने को आतुर है… उद्देश्य अच्छा है परन्तु तरीका गलत है… और जब तरीका गलत हो जाता है तो नतीजा जो निकलता है वह निराश करने वाला होता है… वहां आनंद नहीं होता तब हम रिश्ते को ठीक करने के बजाय उसे ऊपर से सजाने में लगे रहते हैं… हम इस सच को झुठलाना चाहते हैं कि गलत तरीके के कारण रिश्ता फलीभूत नहीं हो सका है…

इसकी अपनी सुन्दरता है… उसे ना बहुत अधिक बढ़ा चढ़कर प्रस्तुत करना है ना ही उसे बदसूरत बनाना है… हमें जीवन को चलायमान रखने के लिए उसकी आवश्यकता है… जब भी आप शारीरिक रूप से कमज़ोर हो जाते हैं तो पतन होना ही है… शरीर को उसका गुलाम मत हो जाने दीजिये…

आज के समय में रिश्ते दो तरह से बनने लगे हैं.. – sex based and emotion based…

और यह sex based relation भी विदेश से आई संस्कृति है… हमारा देश हमेशा से भावना प्रधान रहा है… जब भी आप सुन्दर भावनाओं के साथ इस प्रक्रिया में उतरते हैं तो शारीरिक रिश्ता भी सुन्दर बनता है…

लेकिन जब यह सिर्फ शारीरिक तल पर बनता है तो बहुत जल्दी ख़त्म हो जाता है… इसलिए शारीरिक प्रक्रिया में उतरने से पहले भावनाओं की सजावट भी बहुत आवश्यक है… जैसे दीपावली पर दीप प्रज्वलित करने से पहले हम घर को साफ़ करके उसे सजाते हैं… बस रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं… हृदय को साफ़ करके उसे भावनाओं से सजाइये तब प्रेम का दीप अवश्य प्रज्जवलित होगा…

तो यदि आप किसी से प्रेम करते हैं और उसका उपभोग करने की कामना रखते हैं तो आप वासनामय है… लेकिन जब आप प्रेम में अपना तन मन न्यौछावर कर देना चाहते हैं तो वह समर्पण है… स्वयं की भावनाओं के साथ पूरी निष्ठा रखकर इन दो भावों को समझते हुए जब आप प्रेम में देह को उसकी भूमिका में उतारते हैं तब आपकी उन्नति हुई है या पतन यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपने स्वयं की भावनाओं के साथ कितनी इमानदारी बरती… अरे यह तो मेरा समर्पण है कहकर लाभ उठाने से चेतना की उन्नति नहीं होती…

बाकी जैसा कि सद्गुरु कहते हैं… इसे अधिक स्पष्ट करके… I don’t want to destroy all the romance.. हाँ जब भी किसी के प्रेम में हैं तो खुद को पूरी तरह से उस में झोंक दीजिये (यहाँ भावनात्मक बात हो रही है, सामाजिक विद्रोह और दूसरों को कष्ट देकर प्रेम में गलत कदम उठा लेने की नहीं)… अंग्रेज़ी की कहावत Fall in love को सार्थक कीजिये… तभी आप प्रेम के उन उच्च स्तरों पर पहुँच सकेंगे जहाँ यह सारे प्रश्न स्वयं ही विलीन हो जाते हैं…

मेरे मन में भी ऐसे बहुत सारे प्रश्न उठते हैं… पर मेरी यात्रा ऐसी चल रही है कि लगता है… जब तक मुझे सद्गुरु के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होगा, तब तक मेरे ऐसे सारे प्रश्न उसके पहले ही विलुप्त हो चुके होंगे… मेरे पास उनको पूछने के लिए कुछ बचा ही नहीं होगा… बस उन्हें देखकर मैं ही कहीं विलीन हो जाऊंगी…

– माँ जीवन शैफाली

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