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#AskAmma : कैसे होती है पुस्तक यात्रा?

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इस बार पुस्तक यात्रा शुरू हुई थी तब जब सोशल मीडिया की एकरसता से तंग आकर मैंने एक हफ्ते का अवकाश लिया। और उस एक हफ्ते में कुछ नई किताबें पढ़ीं, कुछ नई किताबों का ज़िक्र सुना और कुछ नए विषयों के बारे में जाना, यू ट्यूब पर Dr BM Hegde का ढाई घंटे का वीडियो ध्यान बाबा ने जबरन हाथ पकड़कर बिठाकर दिखाया।

ढाई घंटे का वीडियो!!! कहाँ से लाऊँ इतना टाइम, इतना टाइम होता तो मेरे किसी फेवरेट हीरो की फिल्म ही न देख डालती… हाय मेरे देखे देखे बेचारा अक्षय कित्ता बूढ़ा होता जा रहा है…

दुनिया तो बूढ़ी हो ही जाएगी एक दिन माँ, आपको चिर यौवना बने रहना है या नहीं?? – ध्यान बाबा हमेशा की तरह अपनी ध्यानस्थ मुद्रा से डिगे बिना बोले।

हाँ वो तो है, कौन लड़की चाहेगी कि उसकी त्वचा से उसकी उम्र का पता चल जाए…

तो चुपचाप से वीडियो देखिये…

जो आदेश…. फिर तो जो वीडियो देखने बैठी तो पूरा ख़त्म करके ही उठी।

जैसा कि होता है, कुछ भी नया सीखने के बाद मुझे उस पर लिखने की जल्दी पड़ी रहती है, तो इस बात पर ध्यान बाबा से हो गयी लड़ाई… हम उस पर कुछ लिखने बैठे और उधर से विघ्नकर्ता का विघ्न आया…. और लड़ाई का अंत उनके इस सूत्र से हुआ कि चीज़ें हमेशा लिखी जाने के लिए नहीं होती उसे जज़्ब करिए और जो कुछ भी पढ़ा या सुना है उसे अपने लेखन में स्वत: प्रकट होने दीजिये… जो पढ़ा है उसका पालन कीजिये, ये नहीं कि बस उस पर प्रवचन झाड़ने बैठ गए।

बात तो सही थी डॉ हेगड़े ने जो जीवन शैली बताई उसमें से मैं जो कुछ भी पालन करती थी और आगे पालन करने का विचार रखती थी उसमें से निकल कर आए चार लेख –

The Quantum Doctors
Fritjof Capra The Tao Of Physics,
Zombie Boy की आत्महत्या
#AskAmma : इतने भयंकर वायरल इन्फेक्शन में भी Antibiotic नहीं ली, क्यों?

और उसके पहले जो प्रस्तावना लिखी वो थी –

माया से अवकाश के लिए रची अवकाश की माया… जो कुछ यूं थी –

Swami Ram Book

स्वामी राम की पुस्तक का अंश है यह… दो कारण हैं – पहला यह बताना कि यह है “मेरा” विज्ञान… लेकिन चूंकि मेरे विज्ञान की भाषा “आपके” विज्ञान से अलग है, आप लोगों की तरह डॉक्टरी नहीं पढ़ी, फिर भी डॉ आलोक भारती, डॉ बी एम हेगड़े और डॉ अमित गोस्वामी जैसे डॉक्टरी पढ़े लोग भी मेरे विज्ञान की पुष्टि करते हैं और चूंकि सब लोग इस विज्ञान की भाषा नहीं समझ सकते या Fritjof Capra की The Tao Of Physics (भौतिकी का सतपथ) नहीं समझ सकते, इसलिए जो भाषा आम जनों को समझ आती है उस भाषा में समझाना होता है, इसलिए मैं प्रेम को भी परमात्मा कहती हूँ और इस विज्ञान को भी परमात्मीय शक्ति कहती हूँ और मैं खुद को भी उसी परमात्मा का अंश कहती हूँ इसलिए अहम् ब्रह्मास्मि की तर्ज़ पर मैं एलान करती फिरती हूँ कि मैं इश्क हूँ दुनिया मुझसे चलती है…

और दूसरा कारण मुझे मेरे गुरु श्री एम की तरह फ्रॉड कहने वालों के लिए भी है यह जिन्होंने यह इलज़ाम लगाया था कि यह अपने उस गुरू की तरह ही फ्रॉड है जिन्होंने स्वामी राम की पुस्तक “हिमालय के संतों के संग निवास” में लिखे की चोरी कर “हिमालयवासी गुरु के साए में” पुस्तक लिखी है…

तो मैं उन सभी महानुभावों को आमंत्रित करती हूँ कि दोनों पुस्तक में लिखे किसी एक अनुभव को भी एक जैसा साबित करके दिखाएं। दोनों पुस्तक मेरे सामने हैं। हाँ यदि इनमें कुछ समानता है तो यह कि हमारे यहाँ जितने भी सिद्ध पुरुष हुए हैं उन्हें हिमालय तक जाना ही होता है, गुरु का संग या उनके साए में रहना ही पड़ता है। हर कोई मेरी तरह सुनहरे अक्षरों में किस्मत लिखवाकर नहीं आता जिसे घर बैठे गुरु का आशीर्वाद, प्रेम और लाड़ भी मिल जाता है।

और हाँ सिद्धाश्रम जैसा शब्द यदि आपने नहीं सुना तो गूगल कर लीजियेगा, जानकारी मिल जाएगी लेकिन गूगल मैप के ज़रिये सात जन्मों तक खोजते रहोगे तब भी वह नहीं मिलेगा और स्वामी राम, श्री एम और सद्गुरु की तरह सिद्धि प्राप्त कर लोगे तो आँख बंद करते से ही कुछ सेकंड्स में वहां पहुँच जाओगे, और थोड़ी सी मेहनत और की तो सीमेंट की दीवार भी किसी कपड़े के परदे की तरह हटा के उसके पार जा सकोगे… जैसा कि श्री एम की पुस्तक में उन्होंने अपना अनुभव लिखा है… हालांकि शायद आपका श्रोडिंजर इसे कभी साबित नहीं कर पाया, उसकी बिल्ली आज भी दो दुनिया के बीच भटकती फिर रही है।

बाकी माँ के नवरूपों की तरह इस ‘जीवन’ के हर रूप में यह नौ रस दिखते रहेंगे फिर चाहे वो काव्य के हो, अभिनय के हो या माया के…. श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भय, वीभत्स, अद्भुत और शांत ये सारे रंग मैं अलग अलग या एक साथ दिखाती रहूँगी।

पिछले हफ्ते के अवकाश के दौरान ध्यान के कुछ नए आयाम और नए चरण छुए हैं… जिसे आप ध्यान विनय के नए चरण छूना भी कह सकते हैं, मेरी तरह वो भी रोज़ नए हैं… बाकी महत्वपूर्ण बात यह कि माया ने अवकाश के अंतिम दिन खूब हंसाया… बच्चों जैसे खेल में अपना जादू दिखाकर समझा गयी कि या तो बच्चों की तरह इसी जादू के खेल में उलझी रहो या दूसरों को भी इस खेल के चक्कर से बाहर निकालने की योजना में अपना योगदान दो…

उसकी करुणा है मुझ पर तो मैं भी कम करुणामयी नहीं हूँ… ऊपर जो क्रोध दिखाया ना वह उसी नौ रूपों में से एक है… जिसका अंश इत्तू सा ही है… बाकी जो मैं हूँ वो कभी आपसे छुपाया ही नहीं कि…. मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की….

इस बीच #AskAmma का विचार प्रस्तावित कर चुकी थी, तो कुछ प्रत्यक्ष और कुछ अप्रत्यक्ष प्रश्न आते रहे…

प्रश्न : माँ, मैंने दोनों पुस्तकें पढ़ी हैं, श्री एम की भी और स्वामी राम की भी लेकिन मुझमें कोई परिवर्तन नहीं आ रहा.. हाँ कुछ समय से वासना और प्रेम में फर्क कर पा रहा हूँ।

जवाब : सिर्फ पढ़ी होगी मेरी तरह पुस्तकों की यात्रा शुरू कीजिये…

प्रश्न : माँ, मैने श्री एम को कई पत्र लिखे। उन्होंने उत्तर नहीं दिया। मैं इसे ऐसा भी समझ सकता हूँ कि मैं इस लायक नहीं था कि वे उत्तर दें, वैसे आपने भी इस लायक मुझे नहीं समझा।
तो वह महानता वह महात्मा तत्व इसी हेतु ही तो है कि जो लायक नहीं है उसे लायक बना दे।
खैर साधना में धैर्य ही धुरी है, अभ्यास ही रीढ़ है, कभी कभी …मौन हो जाना कोई प्रतिक्रिया न देना भी साधना का अभिन्न अंग होता है.. जो मेरे कई विपरीत परिस्थिति में काम आया।

आपके मामले में भी आपने एक बार यह कहा था कि जब तुम बहुत बेचैन हो जाओ… मैंने भी उसी दिन कह दिया था इतना बेचैन कभी नही होउंगा…. और यह सत्य भी है, आपको ही अपने सन्तान को स्नेह से अभिसिंचित करना होगा.. मुझमें शक्ति नहीं है, बेचैनी भी शक्ति का संवेग है.. शक्ति नहीं तो वेग और संवेग कहाँ।

और कैसे?? कैसे होती है पुस्तक यात्रा शुरू?

जवाब : पहले तो आप किसी रहस्य की सत्यता जांचने के उद्देश्य से मत पढ़िए, रहस्य के साथ एकाकार हो जाइये, दूसरा इस तरह की पुस्तकें कभी भी अन्य पुस्तकों की तरह शुरू से अंत तक मत पढ़िए… जब भी मन में कोई सवाल जागे… पुस्तक उठाइये और आँख बंद करके कोई भी पेज खोल लीजिये, आपको जवाब अवश्य मिलेगा … मेरे साथ ये जादू हमेशा होता है…

और कोई पुस्तक कितनी भी बकवास लगे उसे कहिये गलती तुम्हारी नहीं मैं ही रत्न न ढूंढ सका इस खजाने से, वर्ना ऐसा हो ही नहीं सकता कि किसीने अपनी आध्यात्मिक यात्रा पर किताब लिखी हो और उसमें से कोई जादुई सन्देश पाठक तक न पहुंचे…

(और जो मैंने उन्हें नहीं बताया वह यह कि मैंने भी अपने गुरू श्री एम को अनगिनत पत्र लिखे, लेकिन उस समय जब मैं अत्यधिक पीड़ा में थी और मुझ पर जीवन पुनर्जन्म के प्रयोग हो रहे थे… जब तक प्रयोग चलते रहे, उनका जवाब नहीं आया… जब प्रक्रिया पूरी हुई, अपने आत्बल से मैं एक बार फिर जीवन को खींच लाई तो एक बहुत ही शुभ दिन उनका जवाब आया… आशीर्वाद देता हुआ….)

प्रश्न : अत्यंत सार्थक माँ, मेरा अभिप्राय मात्र वही है कि मैं उसे समझ, ग्रहण आदि न कर सका.. पुस्तक ने तो भीतर तक झकझोर दिया था… पर भगवान ने अर्जुन को अभ्यास कहा था…. समर्पण कहा था.. मैं तो उल्टी माला फेरने में 20 वर्षों से व्यस्त हूँ पर यह भी दृढ़ विश्वास है
कि केवल वाल्मीकि एक ही नहीं रहेंगे मरा से राम पुनः पुनः होगा ही।

जवाब : अपनी तरफ से प्रयास भी कभी कभी बाधा बन जाता है, किसी किताब को पढ़ लेने के बाद उसका जादू स्वत: प्रकट होने दीजिये… उससे कुछ मांगिये नहीं।
(और यह अंतत: ध्यान बाबा का सूत्र ही बोल रहा था जो मैंने रटा नहीं, अपने आप निकल कर आया था)

यहीं से मेरी स्वामी राम की पुस्तक “हिमालय के संतों के संग निवास” की यात्रा शुरू हुई थी जिसे मैंने पढ़ी नहीं, ध्यान बाबा को पढ़ते देखती रही और वो किस्से सुनाते रहते मुझे, साथ में यह भी बताते गए कि जिसने श्री एम की पुस्तक को पहले पढ़ा है, उसे स्वामी राम की पुस्तक में ज़रा भी रस न आएगा।

लेकिन जैसा कि ऊपर मैंने प्रश्नकर्ता को जवाब दिया था – कोई पुस्तक कितनी भी बकवास लगे उसे कहिये गलती तुम्हारी नहीं मैं ही रत्न न ढूंढ सका इस खजाने से, वर्ना ऐसा हो ही नहीं सकता कि किसीने अपनी आध्यात्मिक यात्रा पर किताब लिखी हो और उसमें से कोई जादुई सन्देश पाठक तक न पहुंचे।

और एक दिन ध्यान बाबा ने किताब बिस्तर पर सिरहाने छोड़ दी, और मैंने यूं ही उसका बीच से एक पेज खोल लिया… पेज नंबर 313 निकलकर आया… जिसपर सिर्फ चार पंक्ति का यह जादुई सन्देश लिखा था… जो मुझ तक पहुंचना था क्योंकि उसी के बाद मेरी शक्ति पर प्रयोग होना था।

“प्रत्येक मनुष्य के अन्दर वह महान शक्ति निहित है जिसके द्वारा वह अपना निदान स्वयं कर सकता है, दूसरों का निदान कर सकता है। आवश्यकता है इन रोगहारिणी शक्तियों का विकास करने की। इस शक्ति के दीक्षित करने के अनेक साधन है। अनेक मार्ग हैं (!!!)। सबसे पहला मार्ग तो यह है कि मनुष्य स्वार्थ से रहित हो जाए। ईश्वर में अनुराग रखे और ईश्वर के प्रति अर्पित होकर सच्चे हृदय से दूसरों का कल्याण करने की भावना करे।”

पुस्तक के उस अंश को पढ़ते से ही रोगहारिणी शक्ति ने अपनी शिष्या को खोज लिया था, और यह वाक्य बार- बार मेरे मस्तिष्क की दीवारों से टकराता रहा- “इस शक्ति के दीक्षित करने के अनेक साधन हैं, अनेक मार्ग हैं”, दीक्षा वही नहीं होती जो गुरु प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होकर शिष्य के माथे पर अपना अंगूठा रखके दीक्षित कर दे। दीक्षा वह भी होती है जब आपको यह आभास होने लगे कि इस पुस्तक के माध्यम से एक नयी दीक्षा यात्रा के लिए आपको चुन लिया गया है।

क्योंकि इस पुस्तक का मेरे अवकाश के दिनों में आना, उन्हीं दिनों Dr BM Hegde, जिन्हें मैं Quantum Doctor कहती हूँ, उनका वीडियो सुनना, उन्हीं दिनों Fritjof Capra की The Tao Of Physics का हाथ में आना, उन्हीं दिनों राग पर आधारित रोग का उपचार गन्धर्व आयुर्वेद, डॉ अमित गोस्वामी की पुस्तक The Quantum Doctor के बारे में जानना और उसके तुरंत बाद मुझे गंभीर वायरल इन्फेक्शन हो जाना, यह सब उस योजना के फलस्वरूप था जिससे मुझे गुज़रना था।

अपनी रोगहारिणी शक्ति का पूरे विस्तार से वर्णन मैंने अपने पिछले लेख में दिया है। आप सोच रहे होंगे एक मामूली सी बीमारी से कोई भी इस तरह से निकल आ सकता है कोई बड़ी बात नहीं। आपको मेरी बातें अतिशयोक्ति लगती होगी। लगना भी चाहिए, प्रश्न उठना ही चाहिए, किसी बात को यूं ही स्वीकार लेना, बिना प्रयोग के स्वीकार लेना, बिना जांचे स्वीकार लेना ठीक नहीं। और किसी पुस्तक में लिखी बात को केवल पढ़कर प्रसन्न हो जाना भी ठीक नहीं, जब तक आप उसे अपने जीवन में उतार न ले।

तो मैंने स्वामी राम के उस रोगहारिणी शक्ति का जादुई सन्देश ग्रहण किया, न सिर्फ़ उसे रोग मुक्ति के लिए उपयोग में लाई, बल्कि यह भी जाना कि जब भी आप किसी शक्ति का निश्छल मन और जगत कल्याण के उद्देश्य से आह्वान करते हैं तो वो आप पर अतिरिक्त कृपा भी बरसाती है।

तो उस शक्ति के आह्वान के बाद जो परिवर्तन मेरी देह और चेतना में आए हैं, उस पर अलग से विस्तार से लिखूँगी… बस इतना कहूंगी जब भी शक्ति का आह्वान करें तो यह मत कहिये कि फलाना रोग चला जाए, हमेशा प्रार्थना कीजिये कि वह आपको स्वास्थ्य प्रदान करे, उस जादुई शक्ति से परिचित करवाए ताकि वह शक्ति आप अन्य लोगों तक पहुँचाने के लिए माध्यम बन सके।

एक बार फिर कहूंगी आपको आध्यात्मिक शक्तियों पर आस्था नहीं तो इसे सकारात्मक सोच का जादू जैसे किसी मनोवैज्ञानिक अध्ययन से जोड़ लीजिये। शक्तियां श्रेय नहीं मांगती, वह तो सूर्य के समान सबको बराबर प्रकाश और ऊष्मा देती है, यह आप पर निर्भर करता है कि आप उसे सूर्य साधना कहकर उसे ध्यान से जोड़ते हैं, परमात्मा से जोड़ते हैं या सूर्य का विज्ञान कहकर या SUN BATH कहकर किसी समंदर किनारे प्रकृति का आनंद लेते हैं।

– माँ जीवन शैफाली (यात्रा जारी है)

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