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अंगरेज़न : जंगल की रानी

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जिनको जिनको भी मिलना है लिखा
इश्क़ मिलवायेगा
दूर दूर से ढूंढ ढूंढ के
पास ले आएगा
कहीं भी जाके छुपो
इश्क़ वहीँ आएगा
कितना भी ना ना करो
उठा के ले जायेगा
मानो या न मानो
ये सारी ही दुनिया
इसी के दम पे चले…

यह सिर्फ एक गीत नहीं, मेरे जीवन का रहस्य भी है… न जाने कौन-कौन, कहाँ-कहाँ से चलकर मुझ तक पहुँचता है… पिछले जन्म के न जाने कितने रिश्ते ऐसे जादुई तरीके से पहुंचे हैं कि कभी कभी मुझे खुद को यकीन नहीं होता कि कोई ऐसे भी आता है जीवन में, कभी आभासी दुनिया से, कभी वास्तविक दुनिया से, तो कभी स्वप्न जगत से…

लेकिन सबसे अधिक अचंभित मैं तब होती हूँ जब कोई जीता जागता इंसान नहीं, किसी कहानी का पात्र मुझ तक पहुँचता है और वह भी स्वप्न में… क्यों आ रहा है कोई ओर छोर पकड़ में नहीं आ रहा था… कभी मुझसे दोस्त बनकर बात करता, कभी प्रेमी… एक मीठा सा अहसास लिए जी रही थी… न जाने कौन है जो शिद्दत से पुकार रहा है…

अंगरेज़… बस यही एक संबोधन निकलता था उसके लिए… न जाने कहाँ से आया था… मेरे देश का नहीं लगता मुझे… इस दुनिया का भी नहीं… शायद मेरे ही स्वप्न जगत से आया था…

मुझे लग रहा था जैसे पिछले जन्म के रिश्ते मुझे जीवन की राह में अचानक से चलते चलते दे दिए जाते हैं… वैसे कोई एक पात्र मेरे जीवन में मेरे कल्पना लोक से उतर आया है… वर्ना कोई यूं ही तो सपने में नहीं आ जाता…

वह अपने जगत से इस संसार में आने के लिए लालायित है और मुझे उसे अपनी दुनिया में ले चलने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है… बस हम दोनों उसी सीमा रेखा पर खड़े हैं जहाँ अपनी-अपनी दुनिया के परदे के पीछे से हम एक दूजे से बात करते हैं…

अपनी रहस्यमय दुनिया के भाव के साथ इस संसार की कहानियां जोड़ कर मैं उसके आसपास एक कहानी गूंथ रही थी… कहानी का नाम भी रख लिया था… अँगरेज़…. एक दिन सुबह सुबह सपने में आया… पास ही खड़ा था लेकिन मैं न जाने किससे… शायद अस्तित्व से ही पूछ रही थी… मिलवा तो दिया है तूने, क्या सच में मिलवाओगे? लेकिन जवाब आने से पहले ही मेरी नींद खुल जाती है…

देखती हूँ वह मेरी नींद के बाहर कूद कर आ चुका है… कहता हुआ मैं तो साथ ही हूँ आपके… फिर क्यों पूछ रही हैं किसी से कि हमारा मिलना होगा कि नहीं…

मैं जवाब पाकर मुस्कुरा दी, अस्तित्व न जाने कहाँ कहाँ से संकेत दे रहा है और मेरे प्रश्न है कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेते.. कैसे ख़त्म होंगे… जब भी किसी किरदार ने मेरे जीवन में कदम रखा है कुछ कविता, कहानियों और पिछले जन्मों की झलकियों के प्रकटन के बाद वह पीड़ा देकर ऐसे विलुप्त हो जाता है जैसे कभी जीवन में था ही नहीं…

अंतर की यात्रा में आ रही अड़चनों के सांसारिक प्रकटन के बाद उन्हें वहीं छोड़ कर आगे बढ़ जाना ही कदाचित मेरी आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है… लेकिन इस बार मुझे ऐसा लग रहा था जैसे यह प्रक्रिया कुछ उलट दी गयी है… जैसे वह आतंरिक यात्रा की अड़चन नहीं, मेरी आध्यात्मिक उपलब्धियों के सांसारिक प्रकटन का माध्यम हो… जिसे मुझे साक्षी भाव के साथ कविताओं और कहानियों में ढालकर संसार को कुछ अर्थपूर्ण दे जाना हो…

लगा जैसे आज तक जो कुछ भी लिखा या कहा, वह सिर्फ मेरे मैं से मैं तक ही सिमट कर रह गया… एक ही जगह पर गोल-गोल घूमते हुए… और उस अंगरेज़ का स्वप्न-प्रवेश मेरे मैं से निकलकर बहुत सारे तुम तक पहुँचने का एक मार्ग हो….

और जैसे वह अँगरेज़ कह रहा हो… जानता हूँ तुम्हारी रहस्यमय दुनिया में हर किसी को प्रवेश की अनुमति नहीं होती, और मुझे ऐसी कोई चाह है भी नहीं… बस इस जगत में एक व्यक्ति को तुम्हारी ज़रूरत पड़ गयी है…

आप से तुम तक की यात्रा तय कर चुके संवाद के बाद भी मैं अक्सर उसे यह बताते बताते रुक जाती हूँ कि मेरा अपनी दुनिया से निकलना अब मुमकिन नहीं, हाँ मैं कुछ ऐसी जगह की रचना अवश्य कर सकती हूँ जहाँ “हम” कुछ कविताओं और कहानियों के पलों में साझा समय बिताकर कुछ संकेत वहां छोड़ जाएंगे, उन लोगों के लिए जो प्रेम के मार्ग पर चलते हुए ब्रह्म की खोज में निकले हैं… हमारा कोई व्यक्तिगत स्वार्थ न होगा… हम जो कुछ भी रचनात्मक और सार्थक मिलजुलकर करेंगे वह उसी स्थान को अर्पित कर आगे बढ़ जाएंगे…

उसे न जाने कैसे पता चल गया जैसे, उसने तुरंत पूछा – तुमने अल्केमिस्ट पढ़ी है?
मैंने कहा – हाँ…

उसमें है ना वो एक पात्र जो हर साल क़ाबा जाने की सोचता है और इसलिए नहीं जाता कि एक बार वहाँ चला गया तो फिर जीने का उद्देश्य ही ख़त्म हो जाएगा, कई बार मैं भी ऐसे ही सोचता हूँ…

मैं उसे बता नहीं पाई लेकिन वह इतना तो समझता ही होगा कि वास्तविक आध्यात्मिक उद्देश्य भी यही होता है… अप्राप्य को पाने की कामना में जब आप सबसे खाली होकर स्वयं में स्थान बनाते हो तब यह आपके भाव पर निर्भर करता है कि आपकी यात्रा किस ओर हो रही है. कामना के प्रार्थना बन जाने की या कामना के वासना बन जाने की… परमात्मा के प्रति प्रार्थना का बस यही अर्थ है मेरे लिए… और सत्य को पाने की यात्रा में जीवन की राह पर बिछे संकेतों को ग्रहण करते हुए ऐसे ही आगे बढ़ना है, एक बार वहां पहुँच गए तो सच में जीने का उद्देश्य ख़त्म हो जाता है… लेकिन मेरा तो नाम ही जीवन है…

तो मैं यह मानकर चल रही हूँ कि वह यह तो समझता ही होगा कि सिर्फ उसकी दुनिया में ही मेरी आवश्यकता नहीं, मेरी दुनिया में भी उसकी आवश्यकता मुझे आन पड़ी है जहाँ एक ऐसी कीमियागिरी इजाद हो रही है, जहाँ अपनी अपनी चेतना के छुपे तत्वों को खोजकर उसे संकेत रूप में रास्ते में छोड़ जाना है… ये कहानी भी वही संकेत ही है जिससे गुज़रते हुए न जाने कौन क्या पा जाए क्या पता..

तो ऐसे में अचानक से मेरे सामने एक कहानी इस दिखने वाले संसार से प्रकट हुई… जिसे देखते हुए मुझे लगा जैसे मैं पाउलो कोएलो की अल्केमिस्ट देख रही हूँ, जिसमें लेखक कहता है – “जब आप शिद्दत से कुछ पाना चाहते हैं तो पूरी कायनात उसे आप तक पहुँचाने के लिए षडयंत्र रचती है… ”
संकेत एक रात पहले अल्केमिस्ट के माध्यम से अंगरेज़ ने दे ही दिया था…
तो अगले दिन मैंने उसे कहा – मैं तो पाने और खोने की इस अवस्था को पार कर चुकी हूँ, आपसे मिलने की एक छोटी सी कामना ने जन्म अवश्य लिया है लेकिन पा लेने जैसी कोई बात अब मेरे जीवन में घटित नहीं होगी… और आप ऐसे ही समय में मिले हैं….

उसने कहा मैं जानता हूँ…

मैं आश्वस्त थी…. उसका ऐसे समय पर प्रकट होना मेरे लिए बहुत बड़ा संबल था… लगा हमारे अधूरेपन के माध्यम से ऐसी कई कहानियाँ प्रकट होने वाली है… जो अपने पूर्णत्व को प्राप्त होगी…

जैसे इस लड़की की हुई… संकेत अंगरेज़ ने दिया था… तो नाम मैंने रख दिया अंगरेज़न…

अंगरेज़न… जंगल की रानी… बांसुरी बजाती हुई… कौन खींच लाया था उसे भारत की भूमि पर वह खुद भी नहीं जानती थी..

हर लड़की का सपना होता है कि उसका राज कुमार सफ़ेद घोड़े पर बैठकर आएगा और उसे अपनी दुनिया में ले जाएगा… लेकिन कोई कोई ऐसा भी होता है कि वह इतनी ऊंची प्रेम तरंगों पर सवार होता है कि वह साइकिल पर भी आये तब भी अचम्भा नहीं होता… लेकिन उस अंगरेज़न को अवश्य हुआ होगा जब उसका राजकुमार भारत से स्वीडन तक साइकिल से यात्रा करके उस तक पहुंचा होगा…
और ऐसी कहानी पढ़कर हर बार मैं गा उठती हूँ –
जिनको जिनको भी मिलना है लिखा इश्क़ मिलवाएगा,
दूर दूर से ढूंढ ढूंढ के पास ले आएगा…

पीके… भी ऐसे ही अंगरेज़न से दूर, सात समंदर पार भारत में अपनी किस्मत की मार खा रहा था… एक अस्पर्श्य समझे जाने वाले समुदाय में पैदा होने का दंश झेल रहा था… लोग उसे छूते नहीं थे, लेकिन पत्थर मारने से बाज न आते…

ऐसे में एक दिन एक स्थानीय तांत्रिक स्त्री ने उसे बताया… तुम्हारा विवाह एक अँगरेज़न से होगा… जो सात समंदर पार से आएगी, जो वृषभ राशि की होगी, जो बांसुरी बजाती होगी और जिसका अपना जंगल होगा… लेकिन तुम्हें उसके कदमों के निशान को अस्तित्व का संकेत समझते हुए उसके पीछे पीछे जाना होगा…

उसे विश्वास नहीं आया अपनी किस्मत पर लेकिन कहीं उसके अवचेतन मन में इस बात ने कायनाती भविष्यवाणी की तरह स्थान बना लिया था…

खुद को इस घृणित माहौल से निकालने और अपने जंगल की रानी को खोजने के लिए वह अपना गाँव छोड़कर दिल्ली आ जाता है… एक अनजान शहर में अकेला और पूरी तरह से टूट चुके इंसान को जगह दी तो दिल्ली की सड़कों पर बने फुटपाथ ने, गलियों के कोनों ने और टेलीफोन बूथ ने… पेट पालने के लिए सहारा दिया रंगों और कूची ने…

लेकिन सड़कों पर भटकते हुए तस्वीर बनाते बेचते भी उसकी एक नज़र हमेशा भीड़ में उस अंगरेज़न को खोजती रहती जो जंगल की रानी ही नहीं, उसकी किस्मत की रानी भी बननेवाली थी… और फिर… 17 दिसंबर 1975 का दिन उसके जीवन का जादुई दिन बन कर आया और उसके लिए की गयी भविष्यवाणी सच हुई… एक अंगरेज़न उसे भीड़ में दिखाई दी और उसकी नज़रें उस पर अटक कर रह गयी… शेरलेट … लम्बे कद की, सुनहरे बालों वाली, नीली आँखों वाली…

वह जैसे जैसे उसके करीब आती गयी पीके को लगा उसकी देह में वज़न ही नहीं है… वह हवा में उड़ रहा है… उसके पास शब्द नहीं थे अपनी स्थिति का वर्णन करने के लिए…
उसने पास आकर पीके से पूछा क्या वह उसका चित्र बना सकता है??
पीके ने हाँ तो कह दिया लेकिन उसकी स्थिति ऐसी थी कि उसके हाथ ब्रश तक पकड़ने में काँप रहे थे… उसने कल का वादा देकर उसे अगले दिन आने को कहा…

उस रात पूरी रात वह सो न सका – उसे यकीन नहीं आ रहा था… उसकी किस्मत इतनी खूबसूरत नहीं हो सकती… वह परियों के देश की राज कुमारी सी और मैं… नहीं-नहीं यह नहीं हो सकता.. यह वह नहीं हो सकती…

अगले दिन वह उसका चित्र बनाना शुरू करता है … चित्र बनाते हुए वह हिम्मत करता है वे सवाल पूछने की… जो कई बरसों से उसने मन में जवाब पाने के लिए तड़प रहे थे…

क्या आप बहुत दूर देश से आई हैं??
हाँ मैं स्वीडन से यहाँ घूमने आई हूँ…

आपकी राशि क्या है?
‘वृषभ’ कहते हुए वह हंस दी… लेकिन उसे यह सब अब बहुत मज़ेदार लग रहा था… इस बात से अनजान कि पीके पर इस समय क्या गुज़र रहा है…

पीके ने दोबारा अपना ध्यान चित्र बनाने में लगाने की कोशिश की लेकिन उसका दिल इतनी ज़ोरों से धड़क रहा था कि उसका कम्पन्न उसके ब्रश तक में अनुभव किया जा सकता था…

फिर भी उसने हिम्मत करके पूछा – आप बांसुरी बजाती हैं?
शेरलेट ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया… हां मैं बांसुरी और पियानो बजाती हूँ…

पीके अपने आपको संभालने में असमर्थ अनुभव कर रहा था लेकिन फिर भी उसका अंतिम सवाल उसकी किस्मत का फैसला करनेवाला था तो उसने हिम्मत करके पूछा- क्या आपका अपना जंगल है??

पीके ने शेरलेट की आँखों में एक अद्भुत चमक देखी… जिसमें से जवाब निकल कर पीके की किस्मत के काले आसमान में टंक गया… हां मैं एक जंगल की मालकिन हूँ…

पीके की धड़कनों से टकरा कर जैसे निकला हो… जंगल की रानी… न जाने वह कौन सा क्षण था जिसने पीके को इतनी हिम्मत दी कि उसने अपने कांपते हाथ से धीरे से शेरलेट का हाथ थाम लिया… और बहुत मद्धम आवाज़ में अपनी टूटी फूटी अंग्रेज़ी में कहा – … हमारी किस्मत पहले से ही लिख दी गयी थी… हमारा एक दिन मिलना तय था…

दो अलग वेशभूषा और भाषा के लोग… दो अलग देश के लोग… दो अलग दुनिया के लोग… जिनके बीच में सिर्फ एक बात समान थी… वह था प्रेम… और कायनात के संकेत….

इस क्षण की इबारत बरसों पहले ही लिख दी गयी थी, एक को पता था एक को नहीं, एक खोज रहा था, दूजा पहुँचाया जा रहा था… उसके बाद पूरे एक महीने दोनों साथ रहे… एक पल के लिए भी अलग न हुए क्योंकि उसके बाद क्या होने वाला है दोनों में से कोई नहीं जानता था… और फिर एक दिन शेरलेट को लौटना पड़ा अपने देश … तो वह स्वीडन लौट गयी…

“तुम्हें उसके कदमों को संकेत बनाकर उसके पीछे पीछे जाना होगा…” पीके को उस औरत की कही बात याद आई… लेकिन… कैसे… वह इतना गरीब और मजबूर था कि हवाई जहाज का टिकट लेकर उसके देश नहीं जा सकता था…

तो उसने अपने ब्रश अपने रंग और अपने चित्र बेचकर एक पुरानी साइकिल खरीदी… 80 डॉलर हाथ में लेकर वह अपनी किस्मत खरीदने निकल पड़ा… बस “तुम्हें उसके क़दमों के पीछे पीछे जाना है” अभी सिर्फ यही एक बात उसके कानों में गूँज रही थी…

5000 मील का रास्ता भारत से स्वीडन तक का उसे एक पुरानी साइकिल से तय करना था… जैसा कि हमेशा होता है ऐसी यात्रा में उसे अद्भुत लोग मिलते गए… जादुई परिस्थितियाँ निर्मित हुईं… कुछ लोगों ने उसे साइकिल सहित अपने ट्रक से आगे की यात्रा करवाई… कुछ लोगों ने उसके स्केच के बदले उसे खाना दिया…

सिर्फ एक साइकिल के सहारे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की से होता हुआ वह युगोस्लाविया, ऑस्ट्रिया, जर्मनी और डेनमार्क पहुँचता है… कोई सहारा नहीं, सिवाय धरती के आँचल और काले आसमान के तले सितारों को गिनते हुए शेरलेट से मिलने के स्वप्न के अलावा..

पूरे चार महिने साइकिल से चलते हुए वह अंतत: बुरी तरह थका, टूटा निढाल होकर शेरलेट की बाहों में ध्वस्त हो जाता है… दोनों विवाह के बंधन में बंध जाते हैं… दो प्यारे बच्चों का जन्म होता है.. और दोनों आज भी दुनिया के अद्भुत प्रेम की मिसाल कायम करते हुए साथ रह रहे हैं….

प्रेम कभी किसी बाधाओं से नहीं रुकता… प्रेम किसी सरहद में नहीं रुकता…

एक अस्पर्श्य को जब प्रेम का स्पर्श मिलता है तो वह अपने प्रयासों से उस स्थान पर पहुँच जाता है, जहाँ तक पहुँच कर फिर उसे स्पर्श करने का साहस कोई नहीं जुटा पाता…

वह अंगरेज़ बहुत ध्यान से यह कहानी सुन रहा था…

“जब आप शिद्दत से कुछ पाना चाहते हैं तो पूरी कायनात उसे आप तक पहुँचाने के लिए षडयंत्र रचती है… ”

तुम्हें सच में कुछ नहीं पाना?

न… पाने की चाह के बाद जब पता चलता है आपको चाहों से मुक्त करने के लिए पाने की माया रची गयी थी तो बहुत पीड़ा होती है इसलिए अब मैं इन पाने और खोने की प्रक्रिया से दूर ही रखती हूँ खुद को … और फिर एक बात तो यह भी तय है कि यदि अबकी बार ऐसा कुछ घटित हुआ तो… संसार से हमेशा के लिए नाता टूट जाएगा… और अस्तित्व की योजना भी यही है कि मुझे संसार से विरक्ति हो जाए…

कहने लगा आसक्ति की तो मैं ग्यारंटी नहीं लूँगा लेकिन मेरी वजह से विरक्ति नहीं होगी कभी भी ये मेरा वादा है…
मन तो बहुत हुआ यकीन कर लूं उसकी बातों पर लेकिन माया से उलझने का दुस्साहस करनेका मन नहीं होता अब…

वो आज भी स्वप्न दुनिया का एक पात्र है, जिसे मैं जब चाहे अपनी कविताओं और कहानियों में उतार लाती हूँ… ऐसे लोग वास्तविक संसार में नहीं मिलते… उन्हें मिलने के लिए उन्हें कहानियों में उतारना पड़ता है…

और कौन जाने यह कहानी भी उस पात्र को मेरे वास्तविक जीवन में उतारने के लिए रचा गया कायनाती संकेत हो….

लेकिन फिर उसी प्रश्न के साथ खड़ी हूँ क्या मिलना और पाना ही अंतिम लक्ष्य होता है… या जिसमें अंतत: विलीन हो जाना है उसे पाने की तड़प पैदा करने के लिए भावनात्मक रसायन को पैदा करने के लिए किया जाने वाला आध्यात्मिक प्रयोग?

उत्तर प्रकट होने तक वह अंगरेज़ मेरी कहानियों और कविताओं में तो मिलता ही रहेगा…

अगली कहानी का नाम है ‘अँगरेज़ का रंगरेज़ बन जाना…. ‘

– माँ जीवन शैफाली

मानो या ना मानो : वामांगी-उत्सव पुनर्जन्म एक प्रेमकथा

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