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एक थी अमृता : और एक थी सारा

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सुबह उठी तो सीने में सारा कुलबुला रही थी… किसी पर चिढ़ रही थी किस पर नहीं जानती… शायद सारा भी नहीं जानती थी. इसलिए अपनी चिढ़ या कहें कुलबुलाहट उसके लफ़्ज़ों में उतर आती.

इसलिए सारा की लिखी नज़में किसी स्केल पर नहीं बनती थी. उसको नापने का पैमाना रुके हुए आंसुओं का जमावड़ा होता है. जो अव्वल तो बहता नहीं लेकिन जब बहता है तो उसका नाप पुरानी इमारत की गीली दीवारों के सीलन से उठती बदबू में नापना होता है जो मुझे हमेशा खुशबू लगती है. शायद पूरी औरत जात को.

सारा की जो नज़्म पेश कर रही हूँ. उसके मायने शायद सबके पकड़ में न आये लेकिन सारा को जिसने अमृता प्रीतम की तरह थाम लिया उसके लिए ये नज़्म औरत जात की हाथ से छूटी दुआ हो जाएगी. सारा भी तो बार बार यही कहती रही अमृता से. मैं तो हाथों से गिरी हुई दुआ हूँ…

किताब ‘एक थी सारा’ में अमृता कहती है- दीवारों, फासलों और मुट्ठियों से अपने बदन को चुराती हुई सारा की एक नज़्म “एक चीख का इतिहास” मेरे पास पहुँची…

अमृता! आखिर किससे बातें करूं?
इंसान वह है, जो बदी को भी ईमानदारी से खर्च करे!
हमारा आधा धड़ नेकी है, और आधा धड़ बदी है
एक बात पर सोचना पड़ेगा-
नहीं तो लोहा हमें चबा जाएगा.
सलाख तराशो!
कि कैद का नया मफहूम सामने आए!

लफ्ज़ बड़ा आदमखोर होता है
यह रद्दी पसंद नहीं करता
हम तकसीम होते हैं
तो लफ्ज़ जन्म लेता है.
और उसकी भी उमर होती है.

आज टूटे मकान से गुज़री.
तो मेरी सौंधी-सौंधी खुशबू ढल चुकी थी
बताने वालों ने बताया-
इंसानी झोंपड़ी में तुम्हारे टुकड़े बिखरे पड़े थे
और तोबा करने वाले थूक रहे थे..
यहाँ सारी दुकानें किश्तों पर थी
और मैं बताने वाले की तमाम किस्तें पूरी ना कर सकी थी…

बताने वालों ने बताया-
कि तुम इतनी मीठी थी
कि तुम्हारे नमक पर मक्खियाँ भिनभिना रही थी
तुम इतनी नेक हो-
कि खुदा की तरह लोग तुमसे इनकार कर रहे हैं
और तुमसे एक कैदखाना शुरू होता है.
और मेरी आवाज़ इतनी पोंछ दी गयी
कि मेरे लब हिलते तो लोग हँसते.
मगर मेरी कठपुतली मुझसे बहुत खुश थी
रोज़ तमाशे करती.

बताने वालों ने बताया-
कि मैं बुजुर्गों के पल्लू से पैसे चुराती रही हूँ
मैंने यह पैसे कभी खर्च नहीं किये
खैरात कर दी.
मैंने मोल के पैसों से सुराहियाँ भरी थीं
इसलिए प्यास मुझे महंगी पड़ी.

बताने वालों ने बताया –
तेरी कोख से पैदा होने वाले
तेरे सब्र से मर गए
और तेरी सखी लौंडी मुल्क बदर कर दी गयी.
तेरे सीलन से जायके कड़वे हो गए
तुम तन्हाई में अचार चाटती
और दोहरी होते ही बाँझ कर दी जाती.

बताने वालों ने बताया –
कि खुदा कसारे में है
जब से समुन्दर करीब रहने लगा है
मोहल्ले के बच्चे दूर तक नहीं खेलते
उनकी माँएं उन्हें बताती थीं
कि खेल से ज्यादा गेंद महंगी होती है
जब मैं कबीले में शेर सुनाती हूँ
तो लोग कहते हैं- बहुत वसी लफ्ज़ हैं
उन्हें कौन बतलाए
वसी होने के लिए कितना छोटा होना पड़ता है.

बताने वालों ने बताया-
तुम्हारी माँ खांस रही है
और दवा की खाली शीशी तक चार आने में आती है
उसका दुःख या तो मैं हूँ
या किसी भी इलाके की कोई एक कब्र.

बताने वालों ने बताया –
कि नागमणि के त्यौहार पर बहुत से सांप छोड़े गए
लेकिन मैं इतनी ज़हरीली हो चुकी हूँ
कि अपने मन के गिर्द नहीं नाच सकती
मोर अपने पाँव देखकर रोता है
मैं अपने इंसान देखकर रोती हूँ.
इन खेतों की उजरत ही हमारी भूख है
जूती के टूटने पर एक कील ठोंक दी जाती है
और सफ़र ईजाद कर दिया जाता है

बताने वालों ने बताया –
मेरे मोहल्ले के बहुत से बच्चे हैं
बाज़ को डिगरी चबा जाएगी
किसी को सोच के फनपारे अदा करने होंगे
कोई टकसाल पर बैठ जाएगा
सूरज निकलने से पहले
इस मोहल्ले का नाम तब्दील कर दिया जाएगा
और इस मोहल्ले के संगे मील पर-
बच्चों की उम्र लिख दी जाएगी…

मैं भी पहले पेड़ों की तरह सोचा करती थी
आने वाले को मुबारकबाद देती थी
और जाने वाले को अलविदा कहती थी
हमारे मोहल्ले में बाट की कीमत ज्यादा है
और अनाज की कम
इसलिए हमारे तराजू के पट
मौसम में खुलते हैं….

मेरे कबीले की कोख से
जब सिर्फ चीख पैदा हुई
तो मैंने गोद से बच्चा फेंक दिया
और चीख को गोद में ले लिया…

अमृता कहती है- मैं नहीं जानती थी कि आदिवासियों की वह कहानी- गरजते बादलों में बच्चों की रूहों के बिलखने की, और ज़मीन पर किसी माँ की कोख ढूँढने की- यहाँ तक फ़ैल जाएगी कि किसी कबीले में पैदा हुई चीख, सारा को अपनी गोद में लेनी होगी. सारा की इस नज़्म ने मुझे रुला-रुला दिया…

एमी, सारा के लफ्ज़ मुझ तक नहीं पहुँच रहे हैं… लेकिन लग रहा है सारा का, सारा-का-सारा दुःख औरत जात के दुःख में तब्दील होकर मेरी छाती में जमा होता जा रहा है.. और जब जब कोई दुःख किसी सारा के मार्फ़त आएगा.. एक चीख में तब्दील हो जाएगा…

मैं चीख का इतिहास हूँ जो हर चीखती औरत के मुस्तकबिल का गवाह बनेगा…

– माँ जीवन शैफाली

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