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बोले रे पपीहरा…

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पपीहा जब बोलता है तो बोलता ही चला जाता है, जैसे मस्तिष्क ज्वर से पीड़ित व्यक्ति कराहता है तो कराहता हीं चला जाता है। इसकी आवाज़ में दर्द होता है। इसीलिए इसे मस्तिष्क ज्वर की चिड़िया भी कहते हैं।

वैसे ध्यान से सुनने में इसकी आवाज़ “पी कहां, पी कहां” जैसी लगती है। इसी से इसका नाम पपीहा पड़ा है। फिल्मों में इस पर बहुत से गीत लिखे गये हैं। महेन्द्र कपूर की आवाज़ में गाया गीत “पपीहा देखो देख रहा था, पपीहा जाके सबसे कहेगा, पपीहा भला चुप क्यों रहेगा” या वाणी जयराम का गाया “बोले रे पपीहरा…” हो या सुरैया का गाया गीत “दूर पपीहा बोले, रात आधी रह गई। मेरी तुम्हारी मुलाकात बाकी रह गयी” सब के सब सुंदर बन पड़े हैं।

पपीहा की आवाज़ कोयल से भी मधुर मानी जाती है। बांगला में ऐसा माना जाता है कि यह चिड़िया “आमार चोख गेलो” (मेरी आंख चली गई) कह रही है। वहीं गुजाराती में इसकी आवाज़ से “पायोस आला” (वर्षा ऋतु आ गई) का भान होता है। बुंदेलखण्डी में “प्यासो हों, प्यासो हों” और उत्तराखण्ड में “काफल पाको, मिन नी चाखो” का एहसास लोग पपीहे की आवाज से करते हैं।

भोजपुर क्षेत्र में इसकी आवाज़ से “काका हो, पी कहां” समझा जाता है। इसके पीछे एक दंत कथा है। काका भतीजा जंगल में लकड़ी काटने गये थे। कटाई के दौरान असावधानी हुई। पेड़ भतीजे पर गिरा, जिससे उसकी उसी समय मौत हो गई। काका जंगल से अकेले लौटे।

यह देख भतीजे की पत्नी पूछ बैठी “काका हो! पी कहां?” काका क्या जवाब देते? रो रोकर उस औरत ने जान दे दी। कहते हैं कि मरने के बाद वह चिड़िया बनी और वह आज भी दर्द भरे स्वर में पूछ रही है – काका हो! पी कहां?

राजस्थान में इसकी अलग कहानी है। ऋषि भिक्षाटन कर लौटे थे। उन्होंने दरवाजा खटखटाया। ऋषि पत्नी आंगन में अनाज कूट रही थीं, पीस रही थीं। वे खटखटाहट नहीं सुन पाईं। बाद में ऋषि पत्नी ने जब दरवाजा खोला तो उसे ऋषि के कोप भाजन का सामना करना पड़ा। ऋषि ने उसे चिड़िया बन जाने का श्राप दिया। ऋषि पत्नी को कैफियत देने का मौका नहीं मिला। नियति नारी होती है। नियति की भी ईर्ष्या नारी के प्रति ही काम कर गई। मोहे न नारि नारि के रुपा। आज भी वह ऋषि पत्नी दर्द भरे स्वर में पपीहा बन अपनी कैफियत दे रही है -” कुटु थी, पीसू थी” (कूट रही थी, पीस रही थी)।

पपीहा पक्षी पूरे दक्षिण एशिया में पाया जाता है। यह बसंत और पावस ऋतु का पक्षी है। इससे ठंड सहन बिल्कुल भी नहीं होती। सर्दी के महीनों में इसका ठिकाना सुदूर दक्षिण में होता है, जहां अपेक्षाकृत कम ठंड पड़ती है।

यह कोयल की तरह ही शर्मिला पक्षी होता है। यह पत्तों के झुरमुटों में छिपकर दर्द भरे गीत गाता है। ज़मीन पर उतरते हुए कम लोगों ने इसे देखा होगा। यह भी कोयल की तरह अपना घोंसला स्वंय नहीं बनाता। यह अपने अण्डे चरखी पक्षी के घोंसलों में देता है। चरखी पक्षी ही इन अण्डों को सेता है। अण्डों से चूजे निकलते हैं। यही चूजे बड़े सयाने निकलते हैं। बड़े होकर ये चरखी के बच्चों को हीं घोंसलों से गिरा देते हैं। कुछ अपने भाग्य से बच जाते हैं। वे चरखी बनते हैं।

पपीहा के बच्चे पपीहा बन उड़ जाते हैं। चरखी ठगा सा रह जाता है। इन पपीहों का आकार, रूप और रंग देश, काल, परिस्थिति के अनुसार अलग अलग होता है। ये कई तरह के होते हैं। पपीहा लगभग बाज पक्षी जैसा होता है। इसकी दैहिक भाषा भी बाज की तरह ही होती है।

पपीहा को चातक भी कहते हैं। चातक वह पक्षी होता है जो पूरे साल भर पानी न पीने का व्रत रखता है। केवल स्वाति नक्षत्र का ही पानी पीता है। कुछ चातक को अलग पक्षी बताते हैं। अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध ने तो पपीहा को ही चातक कहा है। वे एक जगह लिखते हैं -पपीहा है स्वाति अनुरक्त। संस्कृत काव्य ग्रंथों में इसे अत्यूह कहा गया है। महाकवि नीरज ने भी इस पर कविता लिखी है – जला पपीहा आज न प्रिय की याद में।

विमल राजस्थानी चातक को अलग पक्षी मानते हैं। वे लिखते हैं – मिलती नहीं बूंद चातक को , यद्यपि मेघ घनेरे छाए।

तुलसीदास ने भी चातक के बारे में लिखा है –

एक भरोसा एक बल, एक आस विश्वास।
एक राम घनश्याम हित, चातक तुलसीदास।

लोक गीतों में भी पपीहे का वर्णन मिलता है। भोजपुरी गीतों में “पिऊ पिऊ पपीहरा मचावेला शोर”, हरियाणवीं रागिनी में “पपीहा बोल्या बाग में”, राजस्थानी में “मोर, पपीहा कोयल बोले ” , अवधी में ” पापी पपीहरा पी पी ना बोल” में भी पपीहा का जिक्र आया है, पर चातक का पपीहे के साथ कहीं भी जिक्र नहीं है।

कुछ पक्षी विशेषज्ञ चातक को पपीहे की ही एक प्रजाति बताते हैं। यह भी पपीहे जैसा होता है, पर इसके सिर पर एक कलगी होती है। चातक के पूरे साल भर पानी न पीने की बात किंवदंति लगती है। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि इसे साफ पानी के झील में भी डूबा दिया जाय तो भी यह वह पानी नहीं पीता। यह अपने चोंच बंद कर लेता है। स्वाति की बूंद का इंतज़ार करता रहता है। बिना पानी के यह कैसे जी लेता है? राम जाने!

– Er S D Ojha

दुनिया रंग रंगीली

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