Menu

ममता : चोरनी

0 Comments


बात 2014 अक्टूबर की है जब अजित सिंह का उदयन स्कूल बस शुरू ही हुआ था, बच्चों के लिए कपड़ों का बड़ा सा पुलिंदा बना रही थी और फेसबुक पर अपने अनुभव लिखती जा रही थी कि कैसे कैसे मैंने इन बच्चों के लिए कपड़े जुटाए.

उन दिनों लिखा था – मैं और मेरा Udayan School अक्सर ये बातें करते हैं
****************************************************
जीवन में एक हसरत कभी पूरी नहीं हुई…. कभी दुल्हन की तरह सजी नहीं, न शादी की तैयारियों में कपड़े-गहने जुटाए. इसलिए शादी की तैयारियों या खरीददारी और पैकिंग-शैकिंग का रोमांच क्या होता है कभी जान नहीं सकी…

लेकिन जीवन में जो रोमांच उदयन के बच्चों के लिए कपड़ों की पैकिंग के लिए हो रहा है वो अनुभव शादी की तैयारी के रोमांच से कहीं अधिक है… एक एक कपड़े को छाँट कर अपने हाथों से धोकर सुखाकर प्रेस करना… जहां कहीं एक छेद भी दिख रहा हो वहां सुन्दर सा कोई पैच लगाकर करीने से सजाना कि पता ही न चले यहाँ कोई छेद भी रहा होगा…..

ये तो हुई अपने पास रखे कपड़ों की पैकिंग…. अब मेरे कपड़े तो इतने बड़े हैं कि उदयन की बेटियों को नहीं आ सकेंगे… फिर खोज शुरू हुई छोटे बच्चों के कपड़ों की… तो सबसे पहला योगदान और आभार सबसे छोटी ननंद को जिसने हमारे शहर की अपनी विजिट के दौरान भी वापस लौटने की ट्रेन पकड़ने के दिन अपने बच्चों के कपड़ों का पूरा पुलंदा मुझे भिजवाया…. कपड़े ऐसे कि जैसे कि मैं 12-13 साल की लड़का होती तो मैं खुद भी पहनने में नहीं झिझकती… उसके लिए व्यर्थ इसलिए थे क्योंकि उसके दोनों बच्चों को वो छोटे पड़ गए… दिल से दुआ निकली ऐसे ही तुम्हारे बच्चे जल्दी जल्दी बड़े होते रहे तो मेरे उदयन के बच्चों को वो छोटे पड़ चुके कपड़े जल्दी जल्दी मिलते रहे….

अब ये तो हो गए लड़कों के … अब बारी आती है उदयन की बेटियों की….. एक बड़ा सा और दिल से आभार बड़ी ननंद की बिटिया का …. उसने वादा किया कि मैं कल ही अपने छोटे पड़ चुके कपडे भिजवाती हूँ ….. 5-6 दिन ऊपर हो गए वो कल नहीं आया… अब क्या करूँ , तो उदयन की अजित भाई द्वारा लिखी पोस्ट शेयर की…. इनबॉक्स में पर्सनली मेसेज भेजा…. अपने लिए नहीं इन बच्चों के लिए मांग रही हूँ…. वहा ठण्ड पड़ना शुरू हो गयी है और उनके पास गरम कपड़े तो दूर पहनने के लिए कपड़े नहीं है.

दूसरे दिन कॉलेज जाने से पहले सुबह-सुबह कपड़ों का पोटला लेकर आई और भागते हुए चली गयी सिर्फ इतना कहती रही मैं तो कब से भिजवा देती लेकिन पापा को ट्रंक खोलने का समय ही नहीं मिल रहा था, कल आपके मैसेज के बाद उनको आधी रात को ट्रंक खुलवाया और आज मैं बिना कोई छाँटा बीनी किए सब ले आई हूँ अब आप देख लेना क्या भेजना है क्या नहीं…

आप यकीन नहीं मानेंगे… सुबह नौ बजे वो कपड़े दे गयी…. मेरी कपडे धोने वाली बाई दोपहर 2 बजे से पहले नहीं आती मैंने 10 बजे तक सारे कपड़े धोकर सुखाए…. सूर्य देवता को भी धन्यवाद कि वो उस दिन ऐसे चमके कि 1 बजे तक सारे कपड़े सूख चुके थे और दो बजे तक मैंने सारे कपड़ों पर इस्त्री फेर दी… आप लोगों को अतिशयोक्ति लग सकती है लेकिन मुझे वो कपड़े देखकर उतनी ही खुशी हो रही थी जितनी बचपन में किसी त्यौहार पर नई ड्रेस मिलने पर होती थी… उनमें से कुछ तो मैंने ननंद की बिटिया को अपने हाथ से सिलकर दिए थे …. आज वो उदयन की बेटियाँ पहनेंगी ये सोचकर ही मैं बहुत उत्साहित थी…….

शाम को फिर कुछ कपड़ों की रिपेयरिंग का काम लेकर बैठी ही थी कि दो पड़ोसनें मिलने आई…. मैंने उनके पूछने से पहले ही बताना शुरू कर दिया कि कपड़े क्यों और किसके लिए सिले जा रहे है… वो झट से बोली अरे मेरे पास तो कपड़ों का बड़ा सा पोटला बंधा है सोचा था बर्तन वाली को देकर कोई बर्तन खरीद लूंगी… चाहो तो वो ले लो… मन ही मन इठलाई कि पांसा सही जगह फेंका…. मैने भी उनको जल्दी से चाय पिलाई, और उनके पीछे पीछे हो ली क्योंकि मैं जानती थी उनकी दो छोटी लड़कियां है… और मुझे उदयन की बेटियों के लिए यहाँ से अच्छे कपड़े मिल सकते हैं ….

उनके घर जाकर कपड़ों का पोटला खुलवाकर एक एक कपड़ा छांट कर लेकर आई… बहुत से ऐसे थे उनका देने का मन नहीं था…. बदले में बर्तन खरीदने के लिए बचाकर रखना चाहती थी… मैं उम्मीद भरी निगाहों से देखती रही… जैसे मैं ठण्ड में काँप रही हूँ और सामने वाला गरम कपड़ों की जगह स्टील का डिब्बा पहनकर बैठा हो…. उन्होंने नहीं दिए, अजित भाई की वो पोस्ट याद आ गयी जब किसी बच्ची को थोड़ा सा उधड़ा हुआ यूनिफार्म मिला था और उसके दिल पर जो गुज़र रही थी… उसकी पीड़ा मैं आज समझ सकी… फिर भी उन्होंने जितने दिए उतनों के लिए धन्यवाद देकर चली आई…

घर आकर देखा तो उनकी बेटी जो साथ आई थी अपना स्वेटर मेरे घर भूल गयी है…. और मुझे याद आई उदयन की ममता से भरी वो ‘ममता’ जो अपनी नानी के लिए लड्डू चुराती पकड़ी गयी थी…. आज जीवन में पहली बार मुझे भी चोरी का ख़याल आया… सोचा उन कपड़ों के साथ रख लेती हूँ जो उन्होंने दी… खैर ज़मीर ने इजाज़त नहीं दी… उनके घर जाकर स्वेटर लौटा आई….

….फिर जीवन में चोरी की और खूब की लेकिन ऐसे किसी भौतिक वस्तु की नहीं, किसी का दिल चुराया, किसी के आंसू, किसी की बातों से कड़वाहट तो किसी की आत्मा से ग्लानि….

लेकिन जब अजित सिंह ने ममता का और उसकी चोरी का किस्सा सुनाया तो मुझे अपनी सारी चोरियां बड़ी तुच्छ लगी, लगा यह तो मुझसे भी बड़ी वाली चोरनी है…

हमारे शहर में ठण्ड बढ़ गयी है…. सुबह 6 बजे उठती हूँ तो इतनी ठण्ड रहती है कि आपको गरम कपड़े पहनने की ज़रुरत पड़ जाए, लेकिन मैंने भी सोच लिया… जब तक उदयन के बच्चों तक पार्सल पहुँच नहीं जाता बदन पर कोई गरम कपड़ा नहीं डालूँगी…

फिर उदयन पहुंचकर जब ममता से मिली थी तो मैं तो क्या उस पर अपनी ममता लुटाती, उसे देखते से ही लगा था अरे यह लड़की तो साक्षात अग्नि स्वरूपा है, ये जहाँ जाएगी इसके आभा मंडल से अंधरों में रोशनी का दिया अपने आप जल उठेगा…

अजित सिंह ने उन दिनों भी बताया था, आज चार साल बाद फिर बता रहे हैं लेकिन अब ममता की पूरी कहानी बदल चुकी है… हंसती खिलखिलाती, पढ़ने में सबसे आगे रहने वाली ममता की तेरह वर्ष में ब्याह की खबर आई और वो भी ऐसी विषम परिस्थितियों के साथ…

अजित सिंह के शब्दों में –

ये लड़की याद है आपको?
जी हां ये ममता है, उदयन की ममता….
सिर्फ चार साल पहले की तो बात है, जब उदयन शुरू हुआ था, तब ये मुश्किल से 9 साल की थी… नन्हीं नाज़ुक सी ममता….

इसकी कुछ pics उन दिनों इतनी popular हुई थीं कि ये हमारी Brand Ambassador बन गयी थी।

सैकड़ों किस्से हैं ममता के उदयन में… इनमें एक वो है जब कि उदयन अभी शुरू ही हुआ था… जब कभी उदयन में कुछ स्पेशल मिलता, जैसे कि कुछ बिस्किट, फल फ्रूट या मिठाई… तो ये नन्हीं ममता खुद खाती नहीं थी, उसे छिपा के रख देती। एक दिन पता लगा…. पूछा खाती क्यों नहीं हो?

बहुत कुरेदने पर इसने बताया कि अपनी बूढ़ी नानी के लिए ले जाती हूँ…. उस दिन ये तय हुआ कि उदयन में आज के बाद कुछ भी बंटेगा तो नानी का हिस्सा अलग लगेगा… फिर ममता एक लौंगलता खा लेती और एक घर ले जाती…. नानी के लिए….

पिछले साल इसकी माँ ने इसे स्कूल से हटा लिया….
पता लगाया, क्यों हटा लिया ( उन दिनों ये Rainbow में जाने लगी थी )
पता चला कि ममता का बियाह खोजा रहा है….
अरे अभी तो सिर्फ 12 साल की है….
बहुत समझाया…. 18 की हो जाए तब करना….. शादी का सब खर्च मैं वहन करूंगा…. दहेज में हीरो होंडा मोटर सईकील मिलेगी…… पर इसकी माँ को समझ न आयी……

पिछले हफ्ते ममता का बियाह हो गया…..
बच्चों ने बताया कि आज ममता की शादी है, मार्कण्डेय जी पे…..
फिर बताया कि ममता की माँ तो शादी से 4 दिन पहले ही जो कुछ रुपया पैसा था, ले के भाग गयी….
अपने बच्चे सब छोड़ गयी…..

क्यों भागी?
बच्चों ने बताया कि इसके मम्मी पापा दोनों रोज़ाना दारू पी के लड़ते थे…. फिर वो ममता की शादी से पहले ही भाग गयी…

पहले ये तय था कि सिर्फ फेरे होंगे, बिदाई नहीं होगी…. पर जब इसकी माँ भाग गयी तो फिर लड़के वाले लड़की को बिदा करा ले गए….

जाते हुए ममता बहुत रो रही थी कि पीछे से मेरे भाई बहनों को कौन बना के खिलायेगा….
फिलहाल report ये है कि इसका एक दुधमुंहा भाई तो बस्ती की एक अन्य महिला ने सम्हाल लिया है…. बाकी 4 भाई बहन अब सुबह शाम उदयन में ही खाते हैं….

अब इसके आगे क्या लिखूँ…… कई बार लगता है कि रेत में पानी डाल रहे हैं हम लोग????

फिर जब बच्चों का मुंह देखते हैं तो लगता है, चलने दो…. शायद इसी में से कुछ निकल आये…..

कई बार बड़ी निराशा होती है ………

जानते हैं?
हम सबके साथ एक समस्या है।
हम सब लोग अपने स्तर पे सोचते हैं। और दूसरों से ये अपेक्षा करते हैं कि वो भी हमारे स्तर तक उठ कर या गिर कर सोचें…. बस यही समस्या का मूल है….. स्कूल में मैं हमेशा अपने Teachers से कहता हूँ….. बच्चों के Level पे जा के सोचो…. वो अभी बहुत छोटा है…. बमुश्किल 4- 6 या 8 – 10 साल का…. वो आपके स्तर तक, आपकी ऊंचाई तक नहीं आ सकता अभी….. आप ही नीचे जाइये, उससे खड़े हो के नहीं बल्कि बैठ के बात कीजिये जिससे कि वो आपके बराबर, आपकी आंखों में आंखें डाल के बात कर सके….

13 साल की ममता की शादी कर दी गयी…. कई मित्रों ने पूछा है कि आपने हस्तक्षेप क्यों नही किया…. पुलिस क्यों न बुला ली… ऐसा कहते हुए आप अपने स्तर से सोच रहे हैं, आप मुसहर समाज से ये आशा करते हैं कि वो आपके स्तर तक उठ जाए…. आपकी तरह सोचने लगे…. Sorry Gentlemen…… वो आपके स्तर तक न उठ पाएंगे…. आपको उनके स्तर तक थोड़ा नीचे जा के सोचना पड़ेगा….

आइए, मैं आपको उनके स्तर पे नीचे लिए चलता हूँ…. आइए, उनके स्तर पे चल के सोचते हैं।

13 साल की बेटी सयानी हो जाती है…. शरीर विकसित हो जाता है….. समय के साथ Hormonal Changes भी आते हैं…. Periods आने शुरू हो जाते हैं….. हमारी आपकी बेटियां दिन रात हमारे आपके समाज के संरक्षण में हैं….. गांव देहात में, जहां माँ बाप ज़िंदगी की जद्दोजहद में लगे हैं, खेत खलिहान सीवान में, कभी पंजाब, कभी दिल्ली, कभी इस ईंट भट्ठे पे, तो कभी उस खेत खरिहान में…. कभी जंगल में लकड़ी ईंधन बीनने तो कभी सुअर गाय चराने ………. ऐसे में जवान होती बेटी को कौन अगोरे दिन रात ……… और कहां तक अगोरे??

ऊपर से किशोरावस्था में कदम रखती बच्ची…. Opposit Sex के प्रति बढ़ता आकर्षण और उझसे ज़्यादा कौतूहल… ग्रामीण समाज में जैसे ही बेटी के वक्ष विकसित हुए, परिवार खास कर माँ दहशत में आ जाती है….. कैसे छिपाए अपनी फूल सी बच्ची को इस ज़ालिम दुनिया की निगाहों से???

ऐसे में जानते हैं क्या करती हैं माँएं…. अपनी बेटी के वक्ष पे एक कपड़े की पट्टी बांध देती हैं…… कस के…. इतना कस के सांस तक न आये…. और उसकी छाती सपाट समतल दिखे…… और न आये वो दुनिया की नज़रों में…. वक्ष पे पट्टी बांध के तो छिपा लोगे कुछ दिन… पर उसके किशोर मन को भला कौन बांध सकता है?

ऊपर से बेटी रजस्वला हो गयी…. भारी मुसीबत…. कल को कुछ हो गया, कोई ऊक चूक हो गयी तो किसको मुंह दिखाएंगे? कैसे सामना करेंगे इस जालिम दुनिया का…

ऐसे में सबसे सस्ता सरल उपाय होता है शादी…. जहां 12 – 14 साल की हुई, ब्याह दो…. झंझट ही खत्म…. अब नयन मटक्का करेगी तो अपने पति से न करेगी…. Pregnant होगी तो अपने पति से न होगी???

एक दूसरा पहलू भी है…… मान लें कि ममता की माँ 5 साल रुक ही जाती। और ममता हाइस्कूल या इंटर कर ही लेती… तो तब उसके लिए BA पास 22 वर्षीय दामाद कहाँ से लाते मुसहर समाज में?

आज तो जिसके साथ भी बांध दिया, चली गयी एक गाय या बकरी की माफ़िक़।
शेरनी बना तो देते, फिर शेर कहां से लाते?

बाल विवाह एक समाजशास्त्रीय समस्या है…. इसे पुलिसिया डंडे से या सिर्फ कानून बना के हल नहीं किया जा सकता।

लेकिन मैं ममता के बारे में सलाह देने वालों से बस एक सवाल पूछना चाहूंगी, चलो एक किशोरी के मन में उठने वाली सारी प्राकृतिक और नैसर्गिक प्रक्रियाओं को एक बार एक तरफ रखकर हम उसके भले के लिए कोई सकारात्मक कदम उठा भी लेते हैं और उसकी आगे की पढ़ाई के लिए उसे प्रोत्साहित भी कर लेते हैं तो इनमें से कितने लोग उसकी ज़िम्मेदारी लिखित तौर पर लेने को तैयार हैं? उदयन शुरू करते समय साथ देने के किये गए बड़े बड़े वादों के बाद कितने लोगों ने न सिर्फ हाथ पीछे खींच लिए बल्कि उस पर राजनीतिक हमले करने से भी बाज नहीं आये, क्या हम जानते नहीं?

ऐसे में एक लड़की की ज़िम्मेदारी लेने के बाद लोगों के कितने मुंह हो जाएंगे यह सर्वविदित है,…

चलिए इन सब आरोपों से हम कभी घबराते भी नहीं, लेकिन कल को सच में उसे किसी से प्रेम हो जाता है, मान लो किसी अन्य मज़हब के व्यक्ति से प्रेम हो जाता है, फिर?

कहना बहुत आसान होता है, कुछ मासूम बच्चों की ज़िम्मेदारी उठाने वाले को, जिनका दर्द और खुशी दोनों मैं अपनी आँखों से देखकर आई हूँ, उसके बाद बदलते माहौल के बीच उन्हें राजनीतिक दलदल में धंसता देखा है, मैं यकीन से कह सकती हूँ ऐसे बच्चों को पालना केवल अजित सिंह जैसे पत्थर के कलेजे वाले इंसान के बस की बात है जो इतना संवेदनशील है कि सबके आरोप सहने के बाद भी उनका दुःख दूर करने के लिए खुद को खपा रखा है…

और जहाँ तक मैं ममता को अपनी आँखों से देखकर मिलकर जान पाई हूँ, लिखकर रख लो… कुछ सालों बाद मैं उस लडकी की सक्सेस स्टोरी अपने वेबसाइट में छापूँगी… उसके अंदर इतनी ऊर्जा है और उसकी किस्मत इतनी अच्छी है कि वह जहाँ जाएगी उस की खुशकिस्मती उसके पीछे पीछे जाएगी.. उसका उद्धार करने के लिए हमें आपको उसे कहीं बांधकर रोक कर नहीं रखना पड़ेगा…

– माँ जीवन शैफाली

संस्थापक अजित सिंह के उदयन स्कूल में बच्चों से मिलने के बाद लिखे मेरे अनुभव को पढ़ने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें – उदयन : एक प्रयास

जो लोग उदयन स्कूल के बच्चों की आर्थिक मदद करना कहते हाँ वे कृपया वे निम्नलिखित नंबर पर भेजें

Account details
Name Shri Ram govind singh udayan foundation
IFSC Code UBIN0570702
Account Number 707001010050000
Bank Name UNION BANK OF INDIA
Malikpur branch
Distt Ghazipur
paytm 7889258317
Mobikwik 7889258317
BHIM App no 7889258317

आप इस पुस्तक को खरीदकर भी बच्चों की मदद कर सकते हैं, क्योंकि पुस्तक से प्राप्त पूरी राशि उदयन स्कूल के बच्चों के लिए उपयोग की जाएगी…

Facebook Comments
Tags: , , ,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *