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आत्मा चाहे जितनी पुरानी हो, देह की चाहे जितनी उम्र हो, आप फिर भी बने रहें चिरयुवा

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चिरयुवा बने रहने के लिए मनुष्य को कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए. समय निरन्तर प्रवाहमान है. अतः आयु को बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता. आयु के हर पड़ाव में मनुष्य कुछ विशेष सावधानियाँ बरतकर स्वस्थ और प्रसन्न रह सकता है.

अपनी वृद्धावस्था में जब शरीर अशक्त होने लगता है, उस समय भी निम्न उपायों द्वारा स्वयं को प्रसन्न रखने का प्रयास किया जा सकता है. इससे जीवन में नवीन ऊर्जा का संचार होता है.

जहाँ तक हो सके सरल व साधारण चीजों का आनन्द लेना चाहिए. जीवन में कैसी भी परिस्थितियाँ आएँ, प्रयास सदा यही करना चाहिए कि प्रसन्न रहा जाए. खूब देर तक और ऊँची आवाज में हँसना चाहिए.

हँसना एक प्रकार का व्यायाम है. इससे मनुष्य तनावमुक्त हो जाता है. बहुत से पार्कों में लोग यह अभ्यास करते हुए दिखाई देते हैं. केवल हँसमुख लोगों से दोस्ती रखनी चाहिए. ऐसे लोगों के साथ अपना कुछ समय व्यतीत करना चाहिए जो सकारात्मक सोच रखते हों. पर क्रूर और चिड़चिड़े लोग सदा नकारात्मक सोच रखते हैं. इनसे मित्रता करने से बचा जा सके तो बहुत अच्छा रहेगा.

अपने आसपास उन सबको रखिए जो आपको प्रिय हों. आपका परिवार, पालतू जानवर, स्मृतिचिह्न-उपहार, संगीत, पेड़-पौधे, कोई हॉबी या अन्य कुछ भी. आपका घर ही आपकी आश्रयस्थली है.

प्रयास यही होना चाहिए कि कुछ नया सीखते रहा जाए. शिल्प, कम्प्यूटर, बागवानी आदि के विषय में कुछ और जानने की कोशिश कीजिए. इनमें मन रमा रहेगा तो दिमाग निष्क्रिय नहीं रहेगा. खाली बैठकर उधेड़बुन करने के स्थान पर सदा सकारात्मक कार्य कीजिए.

इस तरह समय भी व्यतीत हो जाएगा. मनीषी कहते हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है. अनावश्यक ही पिष्टपेषण करते रहने के कारण अल्झाइमर यानी मनोरोग होने का खतरा बढ़ जाता है. इससे बचना आवश्यक है.

अनावश्यक ही आयु, कद और वजन आदि के विषय में सोचना छोड़ देना चाहिए. इन सबके बारे में डॉक्टर है न चिन्ता करने के लिए. वह इसके लिए मोटी फीस लेता है और लोग हँसकर उसे पैसा देते है.

अपनी सेहत का ध्यान रखिए. जहाँ तक हो सके सादा और पौष्टिक भोजन ही खाना चाहिए. यदि शरीर स्वस्थ्य है तो उसे सम्भालकर रखिए, यदि अस्वस्थ है तो इलाज करवाइए और यदि कोई असाध्य रोग है तो किसी की सहायता लेने से परहेज मत कीजिए.

खुशी अथवा गम हर समय आँसू आते ही रहते हैं. उन्हें बह जाने दीजिए, रो लीजिए. सुख और दुःख दोनों को महसूस कर लीजिए और फिर स्वस्थ होकर आगे बढ़ जाइए. मनुष्य स्वयं ही एक ऐसा व्यक्ति है जो सारी जिन्दगी अपने साथ रहता है.

जब तक यह जीवन है तब तक प्रफुल्लित होकर रहना चाहिए. पता नहीं कब क्या होनी-अनहोनी घटित हो जाए. हर स्थिति के लिए स्वयं को तैयार रखना चाहिए. इससे दुख कम होता है.

 

जिन्हें आप प्यार करते हैं उनसे बार-बार अहसास करवाते रहिए कि आप उन्हें कितना चाहते हैं और सदा उन्हें याद करते रहते हैं. जीवन का पैमाना उन साँसों की संख्या से नहीं होता जिन्हें हम अपने भीतर लेते या बाहर छोड़ते हैं बल्कि उनसे होता है जो लम्हे हमारी साँस को लेकर चले जाते हैं.

हमें प्रतिदिन अपने जीवन को अपने तरीके से जीने की आवश्यकता है. यह मानकर चलना चाहिए कि हर दिन आखिरी दिन है और हर साँस आखिरी है. इस सोच के साथ जीने से इन्सान को न मृत्यु से डर लगता है और न ही जीवन से. इसे याद करते रहने से जीवनयात्रा सरल और सुगम हो जाती है.

हर समय स्वयं को दोषी ठहराना बन्द कर दीजिए. अनावश्यक का यह अपराध-बोध जिजीविषा को समाप्त करता है. जब भी मन में उदासी के भाव आने लगें, उस समय किसी मॉल में या बाजार में घूमने चले जाइए, किसी पड़ोसी या किसी मित्र के घर उनसे मिलने चले जाइए.

देश-विदेश जहाँ मन करे और साधन आज्ञा दें वहाँ कहीं भी यात्रा के लिए जाइए. जहाँ जाकर मन अशान्त हो वहाँ बिल्कुल नहीं जाना चाहिए. मन को शान्त रखने के लिए पुस्तकें पढ़ सकते हैं. हल्का-फुल्का योग कर सकते हैं, पुराने फोटो देखकर मधुर स्मृतियों का स्मरण कर सकते हैं. इन सबसे भी बढ़कर प्रभु का नाम जप सकते हैं. वही सब दुखों को दूर करने की परम औषधि है.

– चन्द्र प्रभा सूद

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