अपने जीवन का तो एक ही फंडा है जानम, हंसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानं

अपने जीवन का तो एक ही फंडा है जानम, हंसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानं

कहते हैं न एक साधे सब सधे... इसलिए आप जब संन्यास को साध लेते हैं तो आपकी सारी बातें एक साथ सधती चली जाती है. बस शर्त यही है कि आप संन्यास का वास्तविक अर्थ समझें.

संन्यास यानि सांसारिक चीज़ों को त्यागना नहीं है. बल्कि जो प्राकृतिक रूप से संसार में आया है सिर्फ उसे उसकी पूर्णता के साथ स्वीकारना है. इसका बहुत गहन अर्थ है.

संन्यास का अर्थ लोग गृहस्थ जीवन के त्याग से लेते हैं, बल्कि आप गृहस्थ जीवन में रहकर ब्रह्मचर्य साधते हुए सन्यासी हो सकते हैं. लेकिन ब्रहमचर्य का अर्थ होता है ब्रह्मा की चर्या, न कि वह जिसे हम सामान्य अर्थों में लेते हैं.

ब्रह्मा की चर्या का अर्थ होता है कमल के फूल पर विराजमान एक ऐसा व्यक्ति जिसकी नज़रें चारों तरफ होती है. अर्थात वह चारों दिशा में समान और साक्षीभाव से देखते हुए जी रहा हो. जिसके लिए जीवन कमल के कोमल फूल पर बैठने जैसा हो.

आधुनिक परिदृश्य में देखें तो यदि आप अपनी ऑफिस की कुर्सी पर भी बैठे हैं तो आपकी आँखों में कुर्सी का अहंकार नहीं किसी कमल के फूल पर बैठने से आई सजगता और कोमलता हो. फिर चाहे वह घर में हो या बाहर आपका संन्यास भाव आपकी दिनचर्या और स्वभाव में झलके.

और उसके लिए आवश्यक है कि हम प्रकृति से जुड़ें... जब हम प्रकृति से जुड़ने लगते हैं तो संसार की थोपी हुई वस्तु अपने आप छूटने लगती है, कुछ भी छोड़ना नहीं पड़ता. और जैसा मैं कहती हूँ आप कोई चीज़ त्यागने जाएंगे तो वह विरोध करेगी... आप त्याग नहीं सकते उसे चाहे कोई वस्तु हो चाहे कोई भाव, परन्तु जब आप प्रकृति के समीप आने लगते हैं तो आप पर त्याग अवतरित होता है.

तो मेरी इस आभा-सी दुनिया में भी मेरी मित्र सूची में ऐसे कई व्यक्तित्व हैं जिनका संन्यास भाव उनकी दिनचर्या से भले आप तय न कर पाए लेकिन उनका चेहरा बता जाता है कि ये संसार में रहते हुए... मन से संन्यासी हैं. और मैं इन लोगों से सीखती हूँ दो दुनिया को एक साथ जीना...

जिनको देखकर मन में कविता सा भाव जगता है -

जब संयम साधो तो साधते चले जाओ
जब संसार साधो साधते चले जाओ
यह मत देखो क्या साधा जा रहा है,
देखो यह कि क्या तुम्हें साधना आ रहा है...

मास्टर चाबी जब हाथ लग जाती है
तो पता है ना, सारे तालों में लग जाती है
यह मत देखो कि ताले खोलकर क्या मिलेगा
देखो यह कि बंद ताले में क्या चैन मिलेगा...

तो उठाओ खुद को और झोंक डालो
जो गम का ये छोटा सा बुलबुला है, उसे फोड़ डालो
यह मत देखो कि ये छोटे बुलबुले क्या बिगाड़ेंगे
देखो यह कि यही मिलकर कहीं नींद तो न उड़ाएंगे

चैन की नींद सोना है तो जीवन में जो ज़रूरी है वो करते चले जाओ,
खुद मुस्कुराओ, खिलखिलाओ औरों को भी हंसाओ
क्योंकि अपने जीवन का तो एक ही फंडा है जानम
हंसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानं

- माँ जीवन शैफाली

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