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Day: September 1, 2018

मानो या न मानो : सिर्फ़ सोचने भर से सब हो जाता है

Pareidolia का अर्थ खोजने जाएंगे तो वो कहेंगे Pareidolia is a psychological phenomenon in which the mind responds to a stimulus, usually an image or a sound, by perceiving a familiar pattern where none exists. उनके हिसाब से ऐसी कोई वस्तु वास्तविक रूप से नहीं होती बस यह आँखों का भ्रम या आप इसे Illusion […]

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ज्योतिषाचार्य राहुल सिंह राठौड़ : तुच्छ सुखों की कामना में न गंवाएं, अनमोल है मनुष्य जन्म

आप की अदालत में रजत शर्मा जी ने मनोज तिवारी जी से सवाल पूछ लिया कि आप हमेशा अपना रोल बदल लेते हैं. आप कभी क्रिकेटर बनने के लिए लगे, कभी फिजिकल एजुकेशन के टीचर बनना चाहते थे, बाद में गायक बनें, फिर अभिनेता बनें और अब आप भाजपा के दिल्ली प्रदेश के अध्यक्ष बन […]

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आभासी संवाद : आस्तिक और नास्तिक के बीच

जब जब नास्तिकता और आस्तिकता के बीच बहस होगी, जीत हमेशा नास्तिकता की ही होगी क्योंकि नास्तिक व्यक्ति अपनी नास्तिकता को लेकर सबसे बड़ा आस्तिक निकलेगा. और आस्तिक व्यक्ति हमेशा उसकी नास्तिकता पर भी आस्था रखेगा, क्योंकि बिना आस्था के तो आस्तिक भी आस्तिक कहाँ रह जाएगा. वो स्वीकार करेगा नास्तिक को उसकी पूरी नास्तिकता […]

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जीवन-लीला : कृष्ण तत्व का जन्मोत्सव

नायक से मिलने से पहले नायिका जीती थी मध्य मार्ग में… थोड़ा-थोड़ा, थोड़ा-सा प्यार, थोड़ी-सी नफ़रत, थोड़ी-सा जीवन, थोड़ी-सी मृत्यु… और आज? नायिका – आज अपनी परछाई बनाकर तुम मुझे वहां तक ले गए हो जिसे अति कहते हैं… extreme में जीना, खतरनाक ढंग से जीना… जीने का और कोई तरीका ही नहीं होता जानती […]

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फेसबुक अड्डा : कविताएं गाती तस्वीरें

कुछ कविताएं ज़हन की उन तस्वीरों पर बनती हैं जो हमारे नितांत एकाकीपन की साथी होती हैं, जिनका आपके अपने सिवा कोई राज़दार नहीं होता. कुछ कविताएं उन तस्वीरों पर बनती हैं जिनको देखते से ही लगे किसी ने आपके उस एकाकीपन को सार्वजनिक कर दिया और शब्द अचानक आई बारिश की तरह उन पर […]

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बुज़ुर्गों का ध्यान रखने में भारत सबसे अंतिम नंबर पर!

ग्लोबल रिटायरमेंट इंडेक्स में 34 देशों में किये गये एक सर्वे में हमारा देश सबसे आखिरी नम्बर पर यानि कि 34वें नम्बर पर आया है। सेवानिवृत्त होने के बाद लोगों की दशा खराब हो जाती है। बुज़ुर्गों की तरफ जो ध्यान देना चाहिए वो नहीं दिया जाता। सरकार और परिवार दोनों को इस मुद्दे पर […]

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हरिशंकर परसाई के व्यंग्य : सच्चाई, सहजता और हास्य का संगम

आम इंसान की ज़िंदगी, ज़िंदगी की विषमताएँ, विषमताओं में संतोष और संतोष में छिपी पीड़ा! इन भावों को परसाई की लेखनी ने उत्कृष्ट रूप से गढ़ा है। हरिशंकर परसाई की भाषा में चुटीले व्यंग्य की प्रधानता है। उनके एक -एक शब्द धारदार है। जो सामाजिक व्यवस्था पर चोट करते प्रतीत होते हैं। आज की सामाजिक […]

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