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Day: April 19, 2018

Sandakphu Trek : तपस्वियों सी हैं अटल ये पर्वतों की चोटियाँ

“तपस्वियों सी हैं अटल ये पवर्तों की चोटियाँ ये बर्फ़ की घुमरदार घेरदार घाटियाँ ध्वजा से ये खड़े हुए हैं वृक्ष देवदार के गलीचे ये गुलाब के, बगीचे ये बहार के ये किस कवि की कल्पना का चमत्कार है ये कौन चित्रकार है, ये कौन चित्रकार !! ” प्रकृति, हम जीवधारियों के लिए ऑक्सीजन का […]

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कितनी फीकी थी मैं, सिन्दूरी हो जाऊं… ओ सैंया…

जिनके घर कॉलोनी के नहीं, मोहल्लों और गली के नामों से पहचाने जाते हैं वही जान सकते हैं मुम्बई की चाल में रहने वालों का इश्क. इसे पहली बार फिल्म ‘कथा’ में देखा था, पड़ोसी से शक्कर, चाय-पत्ती माँगने के बहाने मिलने जाना भी बहुत रोमांटिक लगता था. कॉलोनी में रहने वालों से हम पड़ोस […]

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Bipolar Mood Disorder : बहुत ही कन्फ़्यूजिंग बीमारी

हम भारतीय बोलते बहुत हैं इसीलिए बचपन से ही हमें विशेषण सुनने की आदत पड़ जाती है…. अरे यह तो आलसी है, वह तो बहुत गुस्सैल है… फलां तो नवाबजादा है जब देखो तब गाड़ियों, लड़कियों पर पैसे फूंकता रहता है… वह लड़की देखो… अपने आप को मिस इंडिया समझती है… उसका मेकअप कितना लाउड […]

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बहुरुपिया और प्रतीक्षा का फल

एक ही कथानक पर दो कहानियां! दोनों में समानता और इस हद तक समानता कि शायद एक दूसरे का एक्सटेंशन कही जाए. हंस पत्रिका के इस अंक में कहानीकार प्रियदर्शन की कहानी ‘प्रतीक्षा का फल’ और जनवरी 2018 से समालोचन ब्लॉग पर उपस्थित कहानीकार राकेश बिहारी की कहानी ‘बहुरूपिया’, दोनों ही कथानक के स्तर पर […]

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लोगों से बाद में, शहर और उसकी हर चीज़ से पहले प्यार करिए…

जिस उम्र में मेरे साथ की लड़कियां जान लेती थीं कि उन्हें पढ़ लिखकर क्या बनना है… उनका राजकुमार कुमार कैसा होगा… उस उम्र में मुझे इतना पता था कि पढ़ाई कोई भी करूँ मेरा ठिकाना कोई पहाड़ी शहर होगा… जहां ख़ूब सारी किताबें होंगी और सामने खिड़की पर खुलते पहाड़ होंगे… पिछले एक साल […]

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मैं दीपक… तुम ज्योति…

दीपक अंधेरे में बैठता है… ज्योति ढिंढोरा पीट आती है दूर तलक…… कि वहाँ कोने में, अंधेरे में दीपक रखा है. जैसे चाँद सुन्दर इसलिये है कि चाँदनी खबर लाती है. दीपक को व्याकरण ने ‘पुल्लिंग’ रखा है, ज्योति को ‘स्त्रीलिंग’. वैसे ही चाँद भी ‘पुल्लिंग’ की कतार में खड़ा होता है पर चाँदनी ….. […]

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तुम्हारा दिल या हमारा दिल है…

प्रतीक्षा चिरनिरन्तर है. वह प्रतीक्षा ही कैसी जो विरत हो जाये? प्रतीक्षा प्रारंभ होती है कभी समाप्त नहीं होने के लिए! प्रतीक्षा रोती है कलपती है लेकिन थकती नहीं! प्रतीक्षा मोजड़ी में अनवरत चलने के घाव दे के आह को नित्य नव्य बना देती है! प्रतीक्षा ऊपरी सतह से समतल राह सी दिखती है लेकिन […]

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