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कुछ परियां काली भी होती हैं!




जब किस्मत मेहरबान होती है तो वो रंग नहीं देखती कि गोरी की किस्मत चमकाना है या काली की, बल्कि यदि रंग देखकर ही किस्मत चमकती होती तो रात के काले आसमान पर चमकते चाँद और सितारों की तरह काले रंग पर अधिक चमकती हुई दिखेगी।

और ऐसा ही कुछ हुआ RENEE KUJUR के साथ जो आज Indian Rihanna के नाम से ख्याति प्राप्त कर रही है.

भारत में जहाँ चेहरे की सुन्दरता गोरा रंग, तीखी नाक और पतले होंठ से नापी जाती है वहीं इसके ठीक विपरीत RENEE KUJUR ने ये साबित कर दिया कि कुछ परियां काली भी होती हैं।

आपका मेरा रंग तो फिर भी साफ़ है, नाक जैसी भी है कम से कम तीखी तो है, लेकिन भाग्य RENEE KUJUR जैसा हो तो छत्तीसगढ़ के जंगल में रहनेवाली 3 साल की लड़की गांव के किसी कार्यक्रम में जो पहली बार स्टेज पर आई तो उसके बाद उसकी यात्रा नहीं रुकी और आज वह भारतीय रेहाना के नाम से वायरल हो रही है.

मानो या ना मानो : क्या मार्गदर्शन करती हैं आत्माएं?




एक खुशहाल परिवार, न पैसे की दिक्कत, न आपसी कलह, न कोई और किल्लत… फिर ऐसा क्या हुआ कि दो भाइयों के पूरे परिवार ने एक साथ जान दे दी। दिल्ली के बुराड़ी इलाके में 11 लोगों की खुदकुशी की घटना ने देश भर को झकझोर कर रख दिया है। मामले में अभी परिवार के बुजुर्ग की आत्मा का असर माना जा रहा है। ऐसे में इसने रूह, आत्मा, झाड़-फूंक आदि को लेकर हमेशा से चली आ रही बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। आखिर यह आत्माओं को लेकर कोरा अंधविश्वास है या फिर किसी मनोवैज्ञानिक बीमारी का असर, विज्ञान और आस्था की उलझी गुत्थी को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं श्रीकांत शर्मा

उद्योगपति सुभाष त्यागी की पत्नी निशा की 1990 में किडनी ट्रांसप्लांट हुई थी। ऑपरेशन के बाद वह कोमा में चली गईं। एक महीना कोमा में रहने के बाद जब वह होश में आईं तो उन्होंने जो कुछ बताया, उसे सुन कर उनके परिजन हैरान रह गए।

निशा का कहना था कि उस एक महीने के दौरान कोई बुजुर्ग उनका ख्याल रखते थे। एसी के कारण उन्हें ठंड महसूस होती थी तो वह बुजुर्ग उन्हें कंबल ओढ़ाते थे और उन्हें प्यार से तसल्ली दिया करते थे, जबकि असल में उस दौरान उनके कमरे में देखभाल के लिए सिर्फ निशा की मां शांति ही मौजूद रहती थीं।

फेसबुक अड्डा :
शून्य का संगीत




एक खोह में खिंचता जा रहा था,
मैं केंचुली की तरह सतह को छोड़ रहा था और एक सुप्तावस्था में जा रहा था..

इस अवस्था में भी मैं वो सब बचा लेना चाहता था, मेरे पास जो भी था (या नहीं भी था) –
मैं बचाना चाहता था अपने भाई को, अपने परिवार को, उस कुल्फ़ी वाले को, कि
किसी स्वाद की स्मृति में बची रहे किनारे खड़ी लड़की की माँ से की गई इच्छा,
बेंच पर बैठे व्यक्ति के दूसरी ओर के आदमी को किये गये वादे,
ठेली वाले की आवाज़, जिससे वो बुला सके जाते हुए किसी को भी वापस, (बिना बताये) ये जताकर कि उसके पास कुछ महत्त्वपूर्ण है जो जाते हुए को चाहिए हो सकता है..

मैं बचा लेना चाहता था कुछ फूल जो प्रेयसी को दिये जाने से रह गये, कुछ कदम जो हमने साथ चले ही नहीं,
मैं बचाना चाहता था, उसके जाने के बाद उसकी परछाई भर अँधेरा..
मैं बचा लेना चाहता था वो नाम जो मैं अपनी पुत्री के जन्म पर उसे दूँगा..
उन विचारों को बचाना चाहता था, जिनका किया जाना अभी शेष है..
प्रकाश की उस खोह में घुल जाने से पहले मैं बचा लेना चाहता था किनारे खड़ा आखिरी पेड़, हवा के वेग से छूटता उसका सूखा पत्ता और...

बस एक दिन तुम लौट आना अपनी देह में…




एक बार कल्पना करके देखो उन किन्नरों के नारकीय जीवन की, जिनकी देह को बनाने के लिए प्रकृति ने हस्तक्षेप किया. और वो उसके हाथ की कठपुतली बनकर रह गए.. उनका अपनी ही देह पर कोई अधिकार न रहा… न वो खुद को पुरुष कह सकीं, न स्त्री…

मान लो तुम्हारी पुरुष हो जाने की इच्छा अगले जन्म में इतनी प्रबल न हो सकी और तुम स्त्री से पुरुष हो जाने की यात्रा में ऐसे ही किन्नर की देह में ही रुक गयी तो तुम्हारा अगला जन्म किस पीड़ा से गुज़रेगा तुम कल्पना नहीं कर सकती…

और अगला जन्म तो बहुत दूर की बात है, जो लड़कियां इस पागलपन में अपना लिंग परिवर्तन करवाने जैसा दुष्कर्म कर बैठती हैं, आप जानते हैं उनमें से अस्सी प्रतिशत ओपरेशन असफल हो जाते हैं, वो फिर ना स्त्री रह पाती हैं ना पुरुष और बीच की अवस्था क्या कहलाती है मुझे ये बताने की ज़रूरत नहीं…

ये सिर्फ फैशन और पुरुषों से बराबरी का दर्जा पाने का पागलपन होता तो भी मैं समझ सकती थी, लेकिन यहाँ मामला भावनाओं की विकृति का है. स्त्री देह का पुरुष देह के प्रति आकर्षण शाश्वत सत्य है, परन्तु स्त्री का स्त्री देह के प्रति आकर्षण उन नीली कामनाओं का दुष्परिणाम है जिसे पोर्न कहकर उत्तेजनाओं के बाज़ार में एक उत्पाद की तरह उपयोग किया जा रहा है.

इन्टरनेट पर बढ़ती इस तरह की सामग्री और LGBT Community का खुला प्रचार, जिसे बेशर्म प्रचार कहना अधिक उचित है, ने सिर्फ देह को ही नहीं भावनाओं को भी विकृत किया है.

धन्नो की आँखों में रात का सुरमा और चाँद का चुम्मा




एक कवि के व्यक्तित्व का पैमाना उसके जीवन में घटित घटनाएं नहीं होती, उस जीवन में उन तमाम असंगत या कभी-कभी क्रूर घटनाओं के बावजूद वो अपनी कविता कितने नाज़ुक शब्दों के साथ प्रस्तुत करता है, इससे उसके चरित्र और व्यक्तित्व को देखा जाना चाहिए…

सिर्फ देखा जाना ही काफी है, क्योंकि जिस गहरे तल पर या जिस ऊंचाई पर पहुँच कर कवि ने लिखा होता है वहां तक एक पाठक वैसे भी नहीं पहुँच सकता…

गुलज़ार मुझे ऐसे ही कवि लगते हैं, जो अपने शब्दों को शीशे को तराशकर बनाई किसी कलाकृति के समान रचते हैं… वो इतनी नाज़ुक होती हैं कि जिस नज़ाकत से उन्होंने बनाई है उसी नज़ाकत से आपको उसे पढ़ना होता है… ज़रा सा दबाव और सबकुछ चकनाचूर…

व्यवस्थित अव्यवस्था आवश्यक है जीवन के लिए…




भावनात्मक अधोगमन के साथ ऊर्जा के उर्ध्वगमन के व्युत्क्रमानुपाती नियम के साथ समानानुपाती रूप से आगे बढ़ते रहिये। प्रेम और पैसे के जोड़ या घटाव के परिणाम की चिंता किये बिना दो समानांतर रेखा की तरह बिना किसी के मिले अपनी रेखा पर सीधे चलते रहिये..। क्योंकि हर गोल-मोल रेखा भी सरल रेखा के अंश से ही बनती है। एक बार यह बात समझ आ गयी तो जीवन के सारे प्रमेय सिद्ध किये बिना भी सिद्धी पा जाएँगे।

लेकिन सिद्ध हो पाने की सारी यात्रा के दौरान दौड़ते रहना होगा रुधिर की तरह धमनियों में ह्रदय से ऊतकों तक और शिराओं के साथ लौट आना खाली होकर हृदय में। ये परिसंचरण केवल रुधिर का नहीं, चेतना के उन सूक्ष्म कणों का भी है जो इन रक्तवाहिनियों को चीरकर आवागमन से मुक्त हो जाना चाहती है…

सीधे रस्ते की ये
टेढ़ी सी चाल है…




मैं अपने किशोरावस्था से शुरू करती हूँ, बचपन मेरा बहुत यादगार नहीं रहा होगा इसलिए मुझे याद नहीं… वैसे भी ध्यान बाबा कहते है जब आप 14 वर्ष और 23 दिन की हुई थीं तब आपके जीवन में एक बहुत बड़ा बदलाव आया था… आपकी वास्तविक यात्रा तभी शुरू हुई थी… खैर आज बहुत अधिक आध्यात्मिक बात न करते हुए जीवन के कुछ सामान्य विषयों को लेते हैं –

तो जब मैंने किशोरावस्था में नया नया कदम रखा था तो मेरी चाल बड़ी गड़बड़ थी… वो कैसे? आगे बताती हूँ… पहले ये जानिये कि घर से किसी काम से निकले हैं या घर लौट रहे हैं तो मोहल्ला जहाँ से शुरू होता मेरी बहनें अपनी नज़रें और गर्दन नीचे झुका के चलने लगतीं।

नई नई बड़ी हुई थी तो उनको देखा देखी मैं भी उनकी नक़ल उतारने लगी थी...

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