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Carolyn Hartz : चार पोतों की 70 साल की इस दादी जैसे आप भी हो सकते हैं युवा




मेरी त्वचा से मेरी उम्र का पता ही नहीं चलता… टिंग टोंग संतूर संतूर….
साठ साल के बूढ़े या साठ साल के जवान….

इस तरह के बहुत से विज्ञापन हम देखते आये हैं, विज्ञापन हमारे लिए हमेशा से कार्यक्रम के बीच में आने वाली बाधा रहे हैं… कभी कोई विज्ञापन पसंद भी आ जाता है तो मात्र मनोरंजन बन कर रह जाता है… हाँ खाने पीने की चीज़ें हो तो हम उसे रुच रुच कर देखते हैं… लेकिन वास्तविक रूप से हम उसे कितना अपना पाते हैं जीवन में??

क्या संतूर साबुन लगाने से आपकी त्वचा चमकदार हुई, फेयर एंड लवली लगा कर आप गोरे हो गए? या च्यवनप्राश खाकर जवान??

शरीर को निरोगी और हमेशा युवा बनाए रखने के लिए आपको कुछ भी खाना या लगाना नहीं होता… बल्कि जो आप खा रहे हैं या लगा रहे हैं उसे छोड़ना है…

पण्डित राज और लवंगी : गंगा की गवाही कि प्रेम न हारा और धर्म भी जीता




पण्डितराज ने आँख उठा कर देखा, दरबार के कोने में एक हाथ माथे पर और दूसरा हाथ कमर पर रखे खड़ी एक अद्भुत सुंदरी पण्डितराज को एकटक निहार रही थी. अद्भुत सौंदर्य, जैसे कालिदास की समस्त उपमाएं स्त्री रूप में खड़ी हो गयी हों.

पण्डितराज ने एक क्षण को उस रूपसी की आँखों में देखा, मस्तक पर त्रिपुंड लगाए शिव की तरह विशाल काया वाला पण्डितराज उसकी आँख की पुतलियों में झलक रहा था. पण्डित ने मौन के स्वरों से ही पूछा- चलोगी?

लवंगी की पुतलियों ने उत्तर दिया- अविश्वास न करो पण्डित! प्रेम किया है…

पण्डितराज जानते थे यह एक नर्तकी के गर्भ से जन्मी शाहजहाँ की पुत्री ‘लवंगी’ थी. एक क्षण को पण्डित ने कुछ सोचा, फिर ठसक के साथ मुस्कुरा कर कहा...

फ़ादर्स डे : एक था बचपन,
बचपन के एक बाबूजी थे




अतीत में पिता होने का अर्थ बेहद स्पष्ट था- एक ऐसा व्यक्ति जिसकी छवि बेहद सख्त हुआ करती थी… जिसकी जिम्मेदारियाँ परिजनों के बेहतर जीवन-यापन के लिए संसाधनों को जुटाने की थी… हद दर्जे तक व्यस्त… बच्चों के लालन-पालन के संदर्भ में लगभग अनुपस्थित या हमेशा पृष्ठभूमि में रहने वाला.

अर्द्धनारीश्वर की संकल्पना वाली हमारी संस्कृति ने पिता के वात्सल्य को माँ की ममता की तुलना में हमेशा कमतर आँका. ऐतिहासिक संदर्भों में अधिकांश वैश्विक संस्कृतियों ने भी पितृत्व की अवहेलना ही की है. दूसरी ओर, अपने अंदर उठने वाले अनुराग, स्नेह, दया, परवाह, दुलार की हूक की अनदेखी के लंबे इतिहास के कारण खुद पिता इस झूठ को स्वीकार करने लगा कि वह कठोर है और चुपचाप इस उपेक्षा को ओढ़ लिया, जबकि साक्ष्य के रूप में...

जानेमन तुम कमाल करती हो….




बहुत विस्तृत है भाव जगत, जिन्हें शब्दों का बंधन रास नहीं आता, फिर भी अज्ञात को ज्ञात शब्दों में प्रस्तुत करने की मनुष्य की सीमा को तोड़ने की ज़िद लिए तुम हर बार शब्दों के समंदर में कूद जाती हो… जानेमन तुम कमाल करती हो….

कभी ठहर जाया करो उन दो दुनिया के बीच में कहीं तो उन दोनों को भी आराम आये, आवागमन के लिए बनी देह की झिल्ली के पार चेतना का विस्तार करती हो… जानेमन तुम कमाल करती हो….

कभी कभी समय के पीछे या कम से कम साथ चल लिया करो, कालचक्र से भागकर समय को चक्कर में डाल, दूर खड़ी यूं भोलेपन से मुस्कुराती हो…. जानेमन तुम कमाल करती हो…

लोग प्रेम को रोग कहते हैं, तुम पीड़ा से आवेशित ह्रदय पर ‘टोनही’ बन प्रेम का टोना करती हो… जानेमन तुम कमाल करती हो….

जो अगम है अगोचर है अज्ञेय है अविनाशी है… उसके स्वरूप सृजन के लिए तुम जां निसार करती हो… जानेमन तुम कमाल करती हो….

बस कुछ ऐसे ही कमाल की मजाल की है इस नाचीज़ ने… कुछ ख़ास बातें और विस्तृत रूप से पढ़ने के लिए लिंक्स ख़िदमत में हैं… हमेशा की तरह मेरा विश्वास उम्मीद से हैं…

ओमुआमुआ :
वह अतीत का अग्रदूत!




चलें ओमुआमुआ पर? सम्भव है? कल्पना तो एक क्षण में पहुँच जाती है. लेकिन सच यह है कि उसकी गति बहुत तेज़ है. वह अब हमसे दूर इस रफ़्तार से जा रहा है कि हम उस तक अपनी तकनीकी के प्रयोग से पहुँच न पाएँगे. बस उसे स्वयं से दूर जाता निहारेंगे. अँधेरे आसमान में घूमती एक लाल चट्टानी दण्डिका. अग्रदूत का विदा-नृत्य!

दूर देस से दूत आया है. आया है और आकर निकल जाएगा. लेकिन घर से निकलने-निकलने में उसे बीस हज़ार साल लग जाएँगे.

ओमुआमुआ! हवाई भाषा में इस शब्द का अर्थ अग्रदूत होता है. वह जो न जाने कितनी दूर से यात्रा करते-करते हमारे सौरमण्डल में प्रवेश कर गया. हवाई में स्थित एक टेलिस्कोप से उसे वैज्ञानिकों ने देखा और उसकी पुष्टि की. फिर उस पर चर्चाएँ चल पड़ीं. कौन है? क्या धूमकेतु? कहाँ से आया है? कहीं कोई रेडियो-सिग्नल तो नहीं किसी अन्य प्रजाति का? जीवन का कोई संकेत?

सौरमण्डल में भटकते हर पत्थर पर हम जीवन ढूँढ़ते फिरते हैं. हमने ओमुआमुआ पर भी यही तलाशने का प्रयास किया. नहीं, यह धूमकेतु नहीं था. धूमकेतु जब सूर्य के समीप आते जाते हैं, तो उनके एक पूँछ उग आती है. साथ में एक आवरण भी चारों ओर. इस आवरण को कॉमा नाम दिया जाता है. धूमकेतु की पूँछ और यह आवरण कॉमा बने होते हैं वाष्प और धूल से.

गुड्डी मिली? : किरदार के भीतर और बाहर की दुनिया




जीवन में घटने वाली हर महत्वपूर्ण घटना एक फिल्म के समान होती है जिसकी स्क्रिप्ट नियति द्वारा पहले से लिख दी गयी है, साथ में आपका किरदार भी.

अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप अपना वास्तविक चरित्र उसमें लाए बिना उस किरदार को अपने अभिनय से कितना सशक्त बनाते हो.

बावजूद इसके कि कई बार आपको फिल्म का अंत मालूम नहीं होता लेकिन यह अनभिज्ञता की स्थिति ही अभिनेता के लिए एक मौका है जब वो अपना पूरा पूरा इस कदर किरदार को समर्पित कर दे कि फिल्म बनाने वाले को भी उसका अंत बदलना पड़ जाए.

और फिल्म देखने वालों को भी अचंभित होना पड़े कि इस शख्स से इस किरदार को इतनी कुशलता से निभा ले जाने की उम्मीद तो नहीं थी.

वरना अभिनेता तो शाहरुख़ भी है जो हर फिल्म में शाहरुख ही नज़र आता है और अभिनेता कमल हसन भी है जिसके किसी किरदार में कमल कहीं नज़र नहीं आता. और एक अभिनेता संजीव कुमार भी थे जो एक ही फिल्म में नौ अलग अलग भूमिकाएं निभाकर लोगों को दांतों तले ऊंगली दबवा देते थे.

और यदि कहीं फिल्म में सस्पेंस है तो फिर कहना ही क्या. ऐसी फिल्म एक ही बार देखने लायक होती है...

एक कवि और उनकी कविताएं : दुष्यन्त कुमार




मेरी प्रगति या अगति का
यह मापदंड बदलो तुम,
जुए के पत्ते-सा
मैं अभी अनिश्चित हूँ ।

मुझ पर हर ओर से चोटें पड़ रही हैं,
कोपलें उग रही हैं,
पत्तियाँ झड़ रही हैं,
मैं नया बनने के लिए खराद पर चढ़ रहा हूँ,
लड़ता हुआ
नई राह गढ़ता हुआ आगे बढ़ रहा हूँ ।

अगर इस लड़ाई में मेरी साँसें उखड़ गईं,
मेरे बाज़ू टूट गए,
मेरे चरणों में आँधियों के समूह ठहर गए,
मेरे अधरों पर तरंगाकुल संगीत जम गया,
या मेरे माथे पर शर्म की लकीरें खिंच गईं,

तो मुझे पराजित मत मानना,
समझना –
तब और भी बड़े पैमाने पर
मेरे हृदय में असंतोष उबल रहा होगा,
मेरी उम्मीदों के सैनिकों की पराजित पंक्तियाँ
एक बार और
शक्ति आजमाने को
धूल में खो जाने या कुछ हो जाने को
मचल रही होंगी ।

एक और अवसर की प्रतीक्षा में
मन की कंदीलें जल रही होंगी ।

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