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व्यवस्थित अव्यवस्था आवश्यक है जीवन के लिए...

भावनात्मक अधोगमन के साथ ऊर्जा के उर्ध्वगमन के व्युत्क्रमानुपाती नियम के साथ समानानुपाती रूप से आगे बढ़ते रहिये। प्रेम और पैसे के जोड़ या घटाव के परिणाम की चिंता किये बिना दो समानांतर रेखा की तरह बिना किसी के मिले अपनी रेखा पर सीधे चलते रहिये... क्योंकि हर गोल-मोल रेखा भी सरल रेखा के अंश से ही बनती है। एक बार यह बात समझ आ गयी तो जीवन के सारे प्रमेय सिद्ध किये बिना भी सिद्धि पा जाएँगे।

लेकिन सिद्ध हो पाने की सारी यात्रा के दौरान दौड़ते रहना होगा रुधिर की तरह धमनियों में हृदय से ऊतकों तक और शिराओं के साथ लौट आना खाली होकर हृदय में। ये परिसंचरण केवल रुधिर का नहीं, चेतना के उन सूक्ष्म कणों का भी है जो इन रक्तवाहिनियों को चीरकर आवागमन से मुक्त हो जाना चाहती है...

ये जो मंगल लाल दिखाई देता है न वो एक ही दिन में न हो गया होगा। रक्त के इसी लाल रंग को उठाकर पोत आए थे मंगल के मुंह पर गरियाते हुए कि तुम्हारे कारण कुण्डली के जंगल में हमेशा मंगल ही होता रहा और जीवन भर मांगलिक दोष के साथ जिसके भी जीवन में कदम रखा अमंगल ही किया।

अब जान लो कि जीवन में जो कुछ भी अमंगल हुआ या किया वो सिर्फ इसलिए कि... Read More

जानेमन तुम कमाल करती हो....

बहुत विस्तृत है भाव जगत, जिन्हें शब्दों का बंधन रास नहीं आता, फिर भी अज्ञात को ज्ञात शब्दों में प्रस्तुत करने की मनुष्य की सीमा को तोड़ने की ज़िद लिए तुम हर बार शब्दों के समंदर में कूद जाती हो... जानेमन तुम कमाल करती हो....

कभी ठहर जाया करो उन दो दुनिया के बीच में कहीं तो उन दोनों को भी आराम आये, आवागमन के लिए बनी देह की झिल्ली के पार चेतना का विस्तार करती हो... जानेमन तुम कमाल करती हो....

कभी कभी समय के पीछे या कम से कम साथ चल लिया करो, कालचक्र से भागकर समय को चक्कर में डाल, दूर खड़ी यूं भोलेपन से मुस्कुराती हो.... जानेमन तुम कमाल करती हो...

लोग प्रेम को रोग कहते हैं, तुम पीड़ा से आवेशित ह्रदय पर 'टोनही' बन प्रेम का टोना करती हो... जानेमन तुम कमाल करती हो....

जो अगम है अगोचर है अज्ञेय है अविनाशी है... उसके स्वरूप सृजन के लिए तुम जां निसार करती हो... जानेमन तुम कमाल करती हो....

बस कुछ ऐसे ही कमाल की मजाल की है इस नाचीज़ ने... कुछ ख़ास बातें और विस्तृत रूप से पढ़ने के लिए लिंक्स ख़िदमत में हैं... हमेशा की तरह मेरा विश्वास उम्मीद से हैं... Read More

सीधे रस्ते की ये टेढ़ी सी चाल है...

जीवन विविधता से भरा हुआ है और आज मुझे आप सबसे ढेर सारी अलग-अलग बातें करनी है....

तो मैं अपने किशोरावस्था से शुरू करती हूँ, बचपन मेरा बहुत यादगार नहीं रहा होगा इसलिए मुझे याद नहीं... वैसे भी ध्यान बाबा कहते है जब आप 14 वर्ष और 23 दिन की हुई थीं तब आपके जीवन में एक बहुत बड़ा बदलाव आया था... आपकी वास्तविक यात्रा तभी शुरू हुई थी...

खैर आज बहुत अधिक आध्यात्मिक बात न करते हुए जीवन के कुछ सामान्य विषयों को लेते हैं -

तो जब मैंने किशोरावस्था में नया नया कदम रखा था तो मेरी चाल बड़ी गड़बड़ थी...

वो कैसे? आगे बताती हूँ... पहले ये जानिये कि घर से किसी काम से निकले हैं या घर लौट रहे हैं तो मोहल्ला जहाँ से शुरू होता मेरी बहनें अपनी नज़रें और गर्दन नीचे झुका के चलने लगतीं।

नई नई बड़ी हुई थी तो उनको देखा देखी मैं भी उनकी नक़ल उतारने लगी थी, मुझे लगा शायद लड़कियों को ऐसे ही चलना चाहिए। लेकिन फिर ये बड़ा फालतू सा काम लगा। अरे इतना भी क्या शर्माना लजाना। फिर जो गर्दन उठी तो फिर किसी के सामने नहीं झुकी... Read More

वो दुनिया मेरे बाबुल का घर ... 'ये' दुनिया ससुराल...

पिछले हफ्ते लगातार एक सवाल मुझसे अलग-अलग लोगों द्वारा पूछा गया, मेकिंग इंडिया का उद्देश्य क्या है?

सबको अलग-अलग जवाब दिए हैं, राष्ट्रवादियों को राष्ट्र सेवा, आध्यात्मिक लोगों को आध्यात्मिक सन्देश, जीवन को भरपूर जीने वालों को जीवन के सारे रंग उड़ेलते हुए सकारात्मक उद्देश्य....

अलग-अलग लोगों के लिए मेकिंग इंडिया की उपयोगिता अलग-अलग है. लेकिन इन सारे उद्देश्यों के पीछे मुख्य उद्देश्य क्या है... हमारा सनातनी उद्घोष "वसुधैव कुटुम्बकम"...

आज मेकिंग इंडिया को देखती हूँ, लोगों का उसके और मेरे प्रति प्रेम देखती हूँ, तो ध्यान बाबा की 2008 में उस समय कही गयी बात याद आती है जो उन्होंने हमारी पहली मुलाक़ात से पहले ही कह दी थी...

"सबसे कह रखा है, 'गलतियाँ करने से कभी मत डरना', और मुझसे तब तक पूछते रहो, जब तक सोल्यूशन ना मिल जाए या मैं ये न कह दूं कि "मुझे नहीं पता कल बताऊंगा".

मैं ऐसा ही हूँ, किसी से पहचान हो तो खुद उसको पता नहीं चलता और मैं उसके घर का सदस्य बन चुका होता हूँ, और आपको भी ऐसा होना है.

अब अगर ये कहोगी कि नहीं मैं तो ऐसी नहीं हूँ या मैं क्यों बनूँ ऐसी, तो सुनो जब हम साथ चलेंगे तो कोई एक ठिकाना तो होगा नहीं हमारा, कभी इस शहर, कभी उस गाँव, हर घर हमारा घर होगा और हर घर में अपने लोग बनाने होंगे, तब जाकर वो सब कुछ हम कर पाएंगे जो हमें करना है, जो नियति ने करने के लिए हमें चुना है.

और फिर पति में ही इतनी मगन न हो जाना कि बाकी ससुराल वालों को पहचान भी ना सको.... "... Read More

मनसा देवी की मानस पुत्रियों, पुत्र आस्तिक की रक्षा के लिए ममता का फूल खिलाए रखना

कहते हैं हमारी जीवन यात्रा के साथ साथ हमारी आध्यात्मिक यात्रा को नेपथ्य से कुछ लोग संचालित कर रहे होते हैं, जो उचित समय से पहले हमारे सामने अपनी उपस्थिति का कोई संकेत नहीं देते, ये उचित समय भी वही तय करते हैं और हमारी यात्राएं भी.

ऐसे में ब्रह्माण्ड के स्वर्णिम नियमों को सुचारू रूप से चलाने के लिए नियुक्त उच्च चेतनाओं को दो चेतनाओं के मिलन की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी, जिनके मिलने के बाद न सिर्फ उनकी आध्यात्मिक यात्राओं को उच्चतर आयामों तक ले जाने की तैयारी शामिल थी, साथ ही उनके मिलने के बाद ब्रह्माण्ड के उन्हीं स्वर्णिम नियमों की ज्योत को उचित पात्रों तक पहुंचाने का जिम्मा सौंपा जाना था.

और यह योजनाएं हर जीवित मनुष्य के साथ जुडी हैं, बस उसे देख पाने की पात्रता अर्जित करते ही ब्रह्माण्ड के रहस्य खुलने लगते हैं. इसलिए इसे मेरी व्यक्तिगत यात्रा के साथ जोड़कर मुझे अहम् के टीले पर बैठाने की आवश्यकता नहीं है, बस अंतर इतना है मैं कठिन तपस्या और कड़ी मेहनत के बाद साक्षी भाव से देख पाने का जो थोड़ा सा भी सामर्थ्य जुटा पाई हूँ. उसी थोड़े से सामर्थ्य पर आस्था रख जो कुछ भी जान पाई हूँ उसको आप सब तक पहुंचाने की बड़ी ज़िम्मेदारी मैंने अपने नाज़ुक कन्धों पर उठाने का दुस्साहस किया है.

हाँ कुछ लोग जिनकी यात्रा का रास्ता थोड़ा और लंबा है वो  इस पर व्यंग्य कसकर निकल जाने को स्वतन्त्र हैं, कुछ होंगे जिनमें कुछ जिज्ञासा का बीज अंकुरित होगा, और उनमें से कुछ ऐसे भी होंगे जो उस खोज के रास्ते पर चल निकले हैं जहाँ मेरी ये बातें उनकी अंधेरी राह में उम्मीद का कोई छोटा सा दीपक बन राह को थोड़ा सा और रोशन कर जाएगा.

तो मुद्दा यह है कि मैं जीवन में कभी कोई तीर्थस्थल नहीं गयी, कभी ऐसी आकांक्षा भी नहीं जागी, ना ही ऐसा कोई भक्तिभाव जागा. देखने वालों ने सीधे सीधे नास्तिक करार दिया.

जो दिखाई नहीं दिया लोगों को और कदाचित मुझे भी, वो था पुत्र "आस्तिक" की संभावना का बीज. पुत्र किसका यह आगे उजागर करूंगी....  Read More

ऐसे बनाएं आम के अचार का सूखा मसाला

पहले मैं कुछ भी बनाने को अपनी डायरी या पाकशास्त्र की पुस्तक पर निर्भर थी. पर अब इतने वर्षों की रसोई के अनुभव से इतना तो हुआ है कि अंदाज़ से, उपलब्ध सामग्री से मन को लगे वैसे वैसे सामग्री ले कर वस्तु ठीक ठाक बन जाती है.

आम का अचार भी पहले बहुत सावधानी से वर्ष भर के लिए बनाती थी. पर यह केवल गर्मियों में ही भाता है. ज़्यादा पुराना अचार बाद में कोई खाता नही. फिर अंत में उसे यहां वहां दे दो या फेंक दो.

तो आजकल मैं दो तीन कच्चे आम लाती हूँ और उसका ताज़ा अचार बनाती हूँ. सूखा मसाला तैयार करके रखती हूं जिसे कच्चे आम में मिला देती हूं.

अचार एक आयुर्वेदिक औषधि है. पाचन के अलावा यह त्रिदोष संतुलन में भी सहायक है. इसीलिए इसमें सब कुछ जैविक उयोग में लाएं.

नमक सेंधा या पीसा खड़ा नमक हो. तेल भी  - Read More

स्वाद, सेहत भरा अदरक पिंडखजूर जूलियंस

सामग्री

अदरक 250 ग्राम
पिंडखजूर 200 ग्राम
भूनें बादाम 50 ग्राम

8 नींबू का रस
लाल मिर्च 10 ग्राम
काला नमक 1 छोटा चम्मच
सादा नमक 1 छोटा चम्मच

विधि

पिंडखजूर को साफ़ कर गुठलियाँ निकाल दें.

अदरक को धोकर छील लें.

अदरक और पिंडखजूर दोनों को लम्बाई में काटें.

अब इसमें नींबू का रस, काला और सादा नमक, बादाम, लालमिर्च पावडर डालकर पूरी सामग्री अच्छी तरह मिला लें.

इसे एक काँच के जार में डालकर 5-6 दिन धूप में रख दें... Read More

 

थाइरोइड को संतुलित रखने के लिए मुखवास

कहते हैं थाइरोइड की बीमारी महिलाओं में अधिक होती है इसलिए वो बहुत जल्दी अवसाद और मोटापे से घिर जाती है. मुझे इसका उलटा कारण नज़र आता है. अपने खानपान की अनियमितता, घर का बचा हुआ बासी खाने की आदत के कारण हार्मोनल बदलाव से जल्दी प्रभावित होती है.

यूं तो आप सामान्य व्यक्ति का भी थाइरोइड नियमित रूप से जांचेंगे तो खानपान, कार्यशैली और मौसमी बदलाव के कारण थाइरोइड कम ज्यादा ही निकलेगा लेकिन शरीर इसको अपने अनुसार संतुलित करता रहता है.

खैर कारण जो भी हो यदि आपका थाइरोइड बढ़ा हुआ है तो मैं आज आपको एक विशेष तरह का मुखवास बनाना सिखाती हूँ जिसके खाने से थाइरोइड संतुलन में लाभ मिलेगा. साथ ही ये ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रोल को भी नियंत्रण में रखेगा. अतिरिक्त वसा के कम होने से मोटापे से भी निजात मिलेगी...

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