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तन नुं बनावे तम्बूर अने मन ना करे मंजीरा,
तो तमे मानजो के ए हशे, राधा ने कां मीरा




लोग अक्सर पूछते हैं मुझसे कि कृष्ण के बाद राधा के जीवन का इतिहास में कोई वर्णन नहीं मिलता… मैं उन्हें जिस रहस्यमय जगत में ले जाकर उत्तर देना चाहती हूँ वे मेरे साथ वहां तक चलने को राजी नहीं होते.

उन्हें साक्ष्य चाहिए तत्व के मानवीकरण के और मैं उन्हें अनुभव करवाना चाहती हूँ उस प्रक्रिया का जहाँ मानव तत्व में रूपांतरित हो जाता है.

राम और कृष्ण के मानवीय अवतार के रूप में ऐतिहासिक प्रमाण के अलावा हम उन्हें राम तत्व और कृष्ण तत्व कहते हैं. कहते हैं ॐ ही की तरह जब आप राम शब्द का जप करते हैं तो आपका सम्बन्ध ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के सीधे राम तत्व से जुड़ता है.

वैसे ही कृष्ण के लिए कहा जाता है कि आपको कृष्ण को पाना हो तो राधा को पुकारिए. क्या ऐसा मात्र मानवीय रूप में संभव है. जब तक हम इस बात को स्वीकार नहीं करेंगे कि भारत में जितने भी ग्रन्थ लिखे गए हैं वो अज्ञात को ज्ञात भाषा में उतारने का एक प्रयास मात्र है. जो अज्ञेय है वह इतना रहस्यमयी है कि आप उसमें रमे बिना उसे जान नहीं सकते, तब तक इसे समझना मुश्किल है…

और एक बार कोई इस रहस्यमयता में रम गया फिर वह इस ज्ञात संसार का नहीं रह जाता, फिर…READ MORE

नायिका -3 :
Introducing सूत्रधार




जैसे हर कहानी का एक नायक होता है, और एक नायिका होती है……. वैसे ही उस कहानी की बागडोर संभालने वाला एक सूत्रधार भी तो होता है……………

तो मैं हूँ सूत्रधार……………… बस इतना ही काफी है मेरे बारे में, क्योंकि कहानी के किरदार इतने महत्वपूर्ण है कि सूत्रधार का महत्व शून्य के बराबर है…. लेकिन… किंतु, परंतु………….. हमारी कहानी में सूत्रधार सिर्फ मैं नहीं हमारे पाठक भी होंगे, और इसमें कोई शक़ नहीं कि उनकी भूमिका भी अतिमहत्वपूर्ण है, क्योंकि कहानी को आगे तो आप ही बढाएँगे……….. जहाँ आप रुक गए वहाँ मैं हाजिर लेकिन सिर्फ आपकी मदद के लिए………….

तो नायक कभी कहता है मैं सड़क का आदमी तो कभी कहता है मैं हवा हूँ, कभी कहता है मैं कुछ नहीं, कभी कहता है हर जगह मैं ही तो हूँ, नायिका कहती है मैं तुम्हारी तुम, उसके बाद नायक चुप और नायिका हो जाती है उसका मौन…………….

ना इसका मतलब ये न समझिए कि नायक और नायिका एक दूसरे को जानते हैं…… नहीं, हर फिल्मी कहानी की तरह अभी दोनों की पहली मुलाकात बाकी है……….. और ये पहली मुलाकात कब होती है ये तो खुद सूत्रधार यानि आपको और मुझे भी नहीं पता………..

यदि जानना चाहते हैं तो जुड़े रहिये हमारी इस कहानी से, जो आपको लेकर जाएगी एक जादुई दुनिया में… आखिर नायिका के “जादू” को भी तो देखना है ना!…READ MORE

न उम्र की सीमा हो,
ना जन्मों का हो बंधन




यही बात कोई ग़ज़ल गायक अपनी गायकी में बयान करता है कि “न उम्र की सीमा हो, ना जन्मों का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन”., तब हमारे मुंह से बरबस निकल जाता है …”वाह”.

लेकिन यही बात जब वास्तविक रूप से जीवन में घटित होती है तो हमारे अन्दर ऐसा कौन सा विष बुझा इंसान या मसखरा जाग जाता है कि हम उस गीत का वास्तविक स्वरूप देख नहीं पाते.
क्यों हमारी दृष्टि इतनी संकुचित हो जाती है कि हम सम्मान की सारी हदें पार कर जाते हैं.

व्यक्तिगत जीवन में चाहे वो कैसा भी हो यदि उसने समाज को कुछ सकारात्मक दिया है तो कम से कम उसका सम्मान करना हमारा धर्म है. आधुनिकता के साथ हमने LGBT जैसी कम्युनिटी को स्वीकार्यता दे दी, एक अभिनेत्री यदि अपने से दस पंद्रह वर्ष छोटे या बड़े लड़के से विवाह कर लेती है तो भी हमें स्वीकार्य है, लेकिन एक सामान्य स्त्री-पुरुष के अधिक वय अंतर के साथ विवाह को स्वीकार करने में हमने अपना हृदय बहुत छोटा कर लिया.

आवश्यकता है एक विस्तृत दृष्टिकोण की जीवन में यदि कुछ भी प्राकृतिक रूप से संभव है, तो उसे समाज में सम्मान अवश्य मिलना चाहिए.

हाँ अप्राकृतिक और ब्रह्माण्डीय नियम के विरुद्ध जो कुछ भी है, वह अवश्य विरोध दर्ज करने लायक है.…READ MORE

मानो या ना मानो : यात्रा एक तांत्रिक मंदिर की




ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई पुराणों में वर्णित विशाल दानव सामने उपस्थित हो गया हो. मोटी और पुष्ट जंघाएँ तथा कमर के नीचे व्याघ्र चर्म लपेटे हुए. इसके अलावा पूरे शरीर पर किसी भी प्रकार का कोई परिधान नहीं था. कंधे पर एक मोटा कद्दावर बकरा लिए हुए जब वह मेरे सामने आया तो मैं एक बारगी सिटपिटाकर सहम-सा गया, ऐसा लग रहा था जैसे विशाल हिमालय के नीचे कोई छोटी-सी पहाड़ी खड़ी हो.

उसने जोरों से हुंकार भरी. सच कह रहा हूँ, उस समय लगा, जैसे बांसों का जंगल परस्पर खड़खड़ा गया हो. हुंकार भरने के साथ ही त्रिजटा ने उस लम्बे चौड़े बकरे को जमीन पर खड़ा किया. वह जीवित बकरा त्रिजटा की विशाल मुट्ठी की कसावट से छूटते ही हड़बड़ाकर अपने पांवों पर खड़ा हुआ, तभी मेरे सामने ही उस त्रिजटा ने उस मोटे ताज़े कद्दावर बकरे को बाएं हाथ से ऊपर उठाया और दाहिने हाथ से उसकी गर्दन मरोड़ दी. एक झटके से गर्दन को खींचकर फेंक दिया और उसके गरम गरम निकलते हुए खून से अपना मुंह लगा लिया. यह सबकुछ पलक झपकते ही हो गया. कुछ ही क्षण में वह सारा खून गटक गया और फिर उसकी लाश को ज़मीन पर फेंक, दाहिने हाथ से मुंह पोंछ, जोरों से “जय भैरवनाथ” कहकर एक तरफ पत्थर की उभरी हुई चट्टान पर बैठ गया.

शिष्यों ने तुरंत टूटी हुई गर्दन को धड़ के साथ लगाकर रख दिया. मेरे लिए यह सबकुछ सर्वथा अप्रत्याशित था. एकबारगी तो मैं अत्यधिक जीवट वाला होने के बावजूद अन्दर से काँप गया और उसकी हुंकार से न चाहते हुए भी मेरा सारा शरीर थरथराने लगा, उसकी नज़र अब सीधे मुझ पर थी, मेरा चेहरा भय से पीला पड़ता जा रहा था, प्रयत्न करके भी मुंह से बोल नहीं निकल पा रहे थे, मेरा सारा शरीर पीपल के पत्ते की तरह काँप रहा था.

अकस्मात् वह व्यक्ति ज़ोरों से हंसा, लगा जैसे पहाड़ पर भूकंप आ गया हो, सारा पहाड़ हड़बड़ाकर नीचे गिर रहा हो, उस हड़बड़ाहट की ध्वनि के आघात से ही मैं ज़मीन पर मजबूरन बैठ-सा गया, परन्तु तभी मुझे सुध हो आई और साहस कर मैं पुन: अपने पैरों पर खडा हो सका.

उसने उस मरे हुए बकरे पर नज़र डाली, त्रिजटा ने कुण्ड से हाथ में जल लेकर कुछ मंत्र पढ़कर उस पर छिड़का और दूसरे ही क्षण वह बकरा जीवित होकर अपने पैरों पर खड़ा हो गया.

यह मेरे लिए दूसरा बड़ा आश्चर्य था…READ MORE

नव युग चूमे नैन तिहारे, जागो, जागो मोहन प्यारे…




पूर्व में सूर्योदय हो चुका है। बाल अरुण अपनी पूर्ण आभा से प्रकाशित हो अपने प्रखर तेज से दसों दिशाओं को आलोकित करने वाला है। नभ में विहग पंक्ति रक्ताभ्र मेघ पर ऐसे सुशोभित है मानो किसी स्वर्णमय पात्र में कस्तूरी का छिड़काव किया हो।

रात भर कोलाहल कर रहे सियारों का स्वर मन्द हुआ है। धूर्त निशाचर उजाला हुआ जान कहीं छिप गए हैं। पापी कुकर्मी और रात के अँधेरे में ही अपनी जीविका की प्रत्याशा पाले और इसलिए अंधकार ही जिनका अभीष्ट है ऐसे दुर्विनीत दुरात्माओं की दुर्दमनीय मलीन आत्मा किसी दुराशा से दोलायमान है।

प्रकृति के विपरीत विकृति में ही निरंतर सुख खोजते गुप्त कार्यों में लगे गोप्ता और उनका सहजता से संरक्षण करने वाले निषिद्ध कर्म को ही विहित कर्म मानने वाले, रोग की आशंका से अनजान भोग को ही सर्वस्व जानने वाले, इन्द्रियाधीन, अविजित मनसा, सुख के वास्तविक अर्थ से अनजान स्वयं दुखों का वरण करने वाले, अपचारी जनों का अपकर्ष हुआ है।.…READ MORE

ब्रह्माण्ड
बहुत ही प्यारा
दोस्त है मेरा




एक बार गई तो ब्लड सैम्पल लेने वाला बिलकुल नया था। मैं उसकी पहली पेशंट थी। पुराने वाला उसे सिखा रहा था।
पुराने वाले ने पूछा – आपको ठीक है न? कोई ऐतराज़ तो नहीं?
नहीं – मैंने कहा।
घबराने की कोई बात नहीं, ठीक से हो जाएगा, उसने कहा।
मैंने देखा, वो जो नया लड़का था, तक़रीबन बीस के आसपास होगा, उसके हाथ काँप रहे थे। मैंने उसके हाथ पे अपना हाथ रखा और कहा – घबराने की कोई बात नहीं, मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। हर किसी का कोई न कोई पहला दिन होता ही है।
वो मुस्कुराया हल्का सा। उसके हाथ काँपने बंद हो गए।
मैंने अपनी प्रेम ऊर्जा और करुणा ऊर्जा उसमें डाल दी थी। हमारी ऊर्जा मिल चुकी थी।
मैं आराम से देख रही थी उसे नीडल प्रिक करते हुए। बिलकुल भी दर्द नहीं किया उसने। ऐसे काम किया जैसे बहुत तज़ुर्बेकार हो। मुस्कुराते हुए हम दोनों ने एक दूसरे को शुक्रिया कहा।
जब एक घंटे बाद मैं वहाँ से गुज़री तो .…READ MORE

उत्पादक श्रम अर्थकारी और अनुत्पादक श्रम अनर्थकारी




उत्पादक श्रम अर्थकारी और अनुत्पादक श्रम अनर्थकारी होता है। सन्तानोत्पत्ति हेतु संसर्ग करना अर्थकारी है।

केवल भोगेच्छा पूर्ति हेतु पहले सहवास करना, फिर विरक्ति होने पर पुनः भड़काऊ सामग्री की शरण में जाना, पश्चात मानसिक अशांति होने पर ड्रग्स आदि का सेवन और वहाँ से विखंडित व्यक्तित्व की पूर्ति हेतु विकृतियों को अपनाना, कुल मिलाकर एक अंतहीन चक्र है जिसे ही शास्त्रों में तृष्णा माना गया है।

जिम जाना, अनुत्पादक श्रम है, कुँए से पानी खींच लाना उत्पादक। अनुत्पादक श्रम में शरीर का व्यायाम तो होता है किंतु चित्त की शुद्धि नहीं होती।

कुँए से पानी खींच कर लाने में, जब पसीना बहता है तो उसके साथ चित्त के विकार भी बह जाते हैं। हल चलाने वाले और भेड़ चराने वाले, स्वभाव से ही साधु होते हैं। – सरदार पूरणसिंह, यूँ ही नहीं कहते।

परोपकार हेतु श्रम करना, जिसे सेवा कहते हैं, वह इससे भी अगला चरण है, जिससे आत्मतत्व .…READ MORE

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