सम्पादक की कलम से : मिट्टी का जादू

धरती और मिट्टी का सम्बन्ध वैसा ही है जैसे एक स्त्री का कोख से होता है. कहते हैं स्त्री की देह अपने बच्चे के पोषण के लिए इस तरह से बनी है कि उसे जन्म लेने से लेकर देह से विदा हो जाने तक धरती ही की तरह धैर्यवान, ऊर्जावान और पोषणदायी बना रहना होता है. इसलिए प्रकृति ने स्त्री की देह को बनाया भी इसी तरह है और सभ्यता विकसित होने के साथ उसके कार्य भी ऐसे रहे जिससे उसकी कोमलता और उत्पादन क्षमता समृद्ध हो.

और हमने आधुनिक जीवन शैली को ऐसे अपना लिया कि जिस भारतीय समाज में स्त्री को कभी लक्ष्मी, कभी दुर्गा, तो कभी अन्नपूर्णा मान पूजा जाता था वहां उसे पुरुषों की दौड़ में शामिल करके उसमें पुरुषोचित्त गुण प्रत्यारोपित कर दिए. ऐसे में न वह स्वस्थ संतान देने योग्य रही ना ही अस्तित्व के दिए गुण और संस्कार देने के योग्य, पोषण तो बहुत दूर की बात है.

जो स्त्री अपने हाथों से बनाया अन्न खिलाकर अपने हाथों से बच्चों को खिलाती थी जिससे उनकी ढलती उम्र तक बच्चे उसे प्रेम और सेवा देते थे, ऐसे में आधुनिक माँओं ने बच्चों को बाहर का खाना खिलाकर बाहर का कर दिया, वह बाहर की दुनिया की ओर आकर्षित होता गया और फिर बुज़ुर्ग वृद्धाश्रम में भेजे जाने लगे.

ऐसा ही दुर्व्यवहार हम अपनी मिट्टी के साथ कर रहे हैं. माँ की तरह यह धरती भी है, सबकुछ इस मिट्टी से ही पल्लवित है चाहे संस्कार हो या अन्न ... इस मिट्टी से जुड़िये और उसका जादू अनुभव कीजिये, जितना आप मिट्टी के संपर्क में रहेंगे उतने स्वस्थ, ऊर्जावान और संस्कारवान रहेंगे. जितना आप बाहर का पैकेट बंद खाना खाएंगे उतनी आपकी चेतना बंद होती जाएगी, कुंठा, ईर्ष्या, चिंता आपकी चेतना और चित्त के विकास और शुद्धि को रोक देगा.

जितनी ऊंची इमारत में रहने लगेंगे उतने हम ज़मीन से कटते जाएंगे. जितना ज़मीन पर चलेंगे उतना उससे प्रेम और ऊर्जा मिलेगी. जितना ज़मीन में उगा, शुद्ध खाना कहेंगे आपके चेतना उतना विकास करेगी.

तो आइये इस अंक के माध्यम से उस मिट्टी को माथे पर लगाकर उससे स्वास्थ्य और पोषण का आशीर्वाद मांगे.

- माँ जीवन शैफाली

संपादक की कलम से : रोटी का जादू

स्वामी ध्यान विनय से मिलने से पहले हमारी कोर्टशिप के दौरान यानी जब हम ई मेल ईमेल खेल रहे थे या फोन फोन खेल रहे थे, तब मैं उनसे अक्सर एक सवाल पूछा करती थी, कि आप काम क्या करते हो?
तब उन्होंने कहा था चार सुबह और चार शाम की मिलाकर आठ रोटी का ही तो सवाल है उसके लिए काम करूं और काम सम्बंधित हज़ार झंझटें झेलूँ, इतना सब्र नहीं मुझमें इसलिए मैं कोई काम नहीं करता, क्योंकि पैसे कमाने से अधिक मैंने इतना प्रेम कमाया है कि जिसके दरवाज़े पर खड़ा हो जाऊं आठ रोटी वो खुशी खुशी खिला देगा.

पहले मुझे लगा मज़ाक कर रहे होंगे, जिस तरह की मेरी लाइफ स्टाइल थी उन दिनों मुझे लगता था कोई कैसे बिना काम के जी सकता है. लेकिन जब अपनी आँखों से देखा तो यकीन हुआ, सच में नौकरी जैसी चीज़ मैंने उनको कभी करते नहीं देखा...

और फिर हम भी उनके रंग में ऐसे रंगे कि संसार के वो सारे काम छूटते चले गए जिसे दो जून की रोटी कमाने के लिए करना कहते हैं... फिर भी आज हम जिस दरवाज़े पर खड़े हो जाएं लोग प्रेम से दो वक्त का खाना खिला देंगे. आखिर सारी भागा दौड़ी भी तो इस दो वक्त की रोटी के लिए ही तो है...

हाँ कुछ काम शौकिया कर रही हूँ, लेकिन वह भी राष्ट्र की उन्नति और समृद्धि के लिए, समृद्धि पैसों से नहीं, संस्कारों और जीवन शैली से, उसके लिए भी पैसा मैं नहीं कमाती, पूरा मेकिंग इंडिया परिवार बना लिया है, उनसे कह दिया है भई मेकिंग इंडिया आपका है मैं सिर्फ उसमें सेवा कर रही हूँ...

तो कहने का मतलब है कि जिस दो जून रोटी के लिए दुनिया इतनी भागा दौड़ी कर रही है, क्या वह दो जून की आपकी रोटी आपके स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है भी? या उसको खाकर, चालीस पचास के बाद ही हम शरीर को बीमारियों का घर बना लेते हैं?

तो आइये इस विषय में विस्तृत जानकारी लेते हैं डॉ मधुसूदन उपाध्याय से...

गेहूं ने बड़ा दुःख दीना - मधुसूदन

तो यह हाल है गेहूं की रोटी का, मैं तो घर में, ज्वार की रोटी, चने की रोटी, मक्का, बाजरा, सबकुछ मौसम के अनुसार उपयोग में लाती हूँ, उसके अलावा जो काम मैं करती हूँ वो भी आपको बताऊँ?

लेकिन वो बताने से पहले कुछ शिकायतें बता दूं जो मेरे मिटटी का जादू वीडियो देखने के बाद लोगों ने प्रतिक्रया स्वरूप की,

मिट्टी के बर्तन में पकाने से क्या हो जायेगा जब बनाने वाली सामग्री ही दूषित है.

दूसरी शिकायत इतना समय किसके पास है आजकल?

तो पहली शिकायत या आपकी यह समस्या तो मैं अभी दूर कर देती हूँ... सब्ज़ियों को बाज़ार से लाकर हम धोकर ही उपयोग में लाते हैं, तो उन सब्जियों को उपयोग में लाने से पहले 15 मिनट तक गौमूत्र अर्क या चूने के पानी में भिगोकर रख दें, उसमें लगे पेस्टीसाइड पूरी तरह से निकल जाएंगे.

दूसरी बात, मसाले पिसे हुए मत लाइए बाज़ार से, खड़े मसाले लाकर घर में कूट कर बनाइये. अंग्रेज़ी फ़ॉर्मूले से बने साबुन शैम्पू छोड़कर गोमय उत्पादों को अपनाइए. आप कहेंगे आजकल गोमय उत्पाद वाली वस्तुओं में भी मिलावट हैं.. तो घर में बनाइये, बहुत ही आसन है ये.

तो फिर आपकी दूसरी शिकायत सामने आएगी, इतना समय किसके पास है आजकल? और यही थोड़ी ना करना है जीवन में? पैसा कमाने के लिए बाहर निकलना पड़ता है, पति पत्नी दोनों को कामना पड़ता है. समाज में चार लोगों के बीच अच्छे कपड़े अच्छा घर अच्छा स्टेटस दिखाना पड़ता है, बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाने की भी मजबूरी है.

मतलब यह सब भागा दौड़ी सिर्फ अच्छे दिखने के लिए ही है ना? मतलब दो समय की रोटी के अलावा जो भी हम करेंगे दुनिया को दिखाने के लिए... और इस दिखावे की दुनिया के कारण हमने अपने जीवन से शान्ति सुकून और परिवार के सदस्यों से आत्मीयता को दांव पर लगा दिया, हम सेल्फ सेंटर्ड होते चले गए... मैं मेरा.. बस सबकुछ इसी के इर्द गिर्द घूम रहा है ....

जिस दिन आप इस मैं और मेरा के चक्कर से बाहर निकल जाते हैं तब अस्तित्व आपके लिए हज़ार दरवाजे खोल देता है... फिर आपको समय अलग से मिलता है या काम ऐसे होने लगते हैं कि जैसे सबकुछ आपके लिए ही हो रहा हो, सारी योजनाएं आपके लिए बनने लगती हैं, बस इसे साक्षी भाव से देखने जितना संयम आपको तप और ध्यान करना होता है.

इसलिए हमारी जीवन शैली में महिलों को बाहर नौकरी के लिए निकलने की आवश्यकता ही नहीं पडी, क्योंकि घर में ही इतने काम थे कि इतना समय ही नहीं था, लेकिन आधुनिक जीवन शैली काम कम करके आराम की सुविधाएं बढाती गयी, जिससे शारीरिक श्रम कम हो गया और लोग, बस दो समय खाना बनाने और खाने के अलावा अधिक कोई काम ही नहीं बचा, फिर मोटापा और कई बीमारियों ने हम पर आक्रमण कर लिया. फिर उसी मोटापे को कम करने के लिए हम गार्डन में घूमेंगे, व्यायाम करेंगे, जिम जाएँगे, लेकिन उसका उद्देश्य क्या है मोटापा कम करना, वह श्रम नहीं है, श्रम वह होता है जो उत्पादक हो, जिससे कुछ काम सधता हो, खुद के लिए भी परिवार के लिए भी और समाज के लिए भी.

हाँ, जो लोग मुझे शुरू से जानते हैं वो कह सकते हैं नौ सो चूहे खाकर बिल्ली हज को चली... लेकिन मैं एक बात बताऊँ जिसने नास्तिकता को पूरा पूरा जिया हो, वही पूरी तरह से आस्तिक हो पाता है, वैसे ही जिसने आधुनिकता को पूरा पूरा जिया हो और मेरी तरह उससे हुए नुकसान को झेला हो वही इस प्राचीन जीवन शैली की ओर पूर्ण समर्पण के साथ उन्मुख हो सकता है, और फिर मैं देख पाती हूँ कैसे एक एक करके अस्तित्व मेरे सामने अपनी योजनाएं प्रस्तुत करता जा रहा है. और जब अस्तित्व योजना बनाता है ना तो उस योजना में काम करने का आनंद और संतुष्टि अलग ही होती है.

समाज का अर्थ यही तो होता है ना जैसे हम परिवार के लिए काम करते हैं वैसे ही सारे परिवार मिलकर समाज के लिए काम करे और सारे समाज मिलकर देश के लिए काम करे. और देश विश्व के लिए... भारत विश्व गुरु किसी एक आदमी के काम करने से नहीं बनेगा, उसके लिए हर व्यक्ति को अपना सहयोग देना होगा. और मोदीजी इसी नीति पर काम कर रहे हैं. उनका स्वच्छता अभियान, उनकी स्टार्ट up योजना यह सबकुछ समाज और देश के लिए है.

लेकिन उसके लिए हर व्यक्ति को मोदीजी ही की तरह दिन के 16 से 18 घंटे श्रम करना होगा, वरना करते रहिये आप जिम में पैसे देकर excersize और खाते रहिये अपनी इसी आधुनिक जीवन शैली का खाना तो आप इस चक्रव्यूह से कभी बाहर नहीं निकल पाएंगे.

इस चक्रव्यूह से बाहर निकलना है तो आपको श्रम करना होगा, बिना श्रम के खाया हुआ भोजन आपको सिर्फ और सिर्फ रोग देगा और कुछ नहीं.

और ऐसा नहीं है कि नौकरी करते हुए महिलाएं ये सब नहीं कर सकती, मैं भी तो वेबसाइट चलाते हुए यह सब कर रही हूँ. और दूसरी बात इससे खर्चा भी कम ही होता है. एक तो रेडीमेड वस्तुएं महंगी होती है, नामी कंपनी की है तो कहना ही क्या.

तो मैं तो हर वस्तु घर में ही कूट पीसकर उपयोग में ला रही हूँ और बच्चों को भी इसकी ट्रेनिंग अभी से दे दी है, ताकि वे अपनी भारतीय जीवन शैली से अभी से परिचित हो जाएं, ताकि जब वो बाहर पढ़ाई के लिए जाएं भी तो बाहर के ही न होकर रह जाए, आपके संस्कार आपकी शिक्षा यहाँ अधिक काम आएगी, बड़े स्कूलों में पढाई गयी अंग्रेज़ी पढाई काम नहीं आएगी.

तो मैंने इस बार अमचूर, त्रिफला, गोमय मंजन, साबुन, पापड़, बड़ी, आंवला केरी का अचार, मुरब्बा, आंवला कैंडी, सबकुछ घर में बनाया है. यहाँ तक कि अब मैं गोमय साबुन भी घर में बनाने जा रही हूँ, जिसका ज़िक्र मैंने आप सबसे किया था, बहुत जल्दी यह साबुन मैं आप सब तक पहुंचाने वाली हूँ.

अब तो यह हो गया है कि मैं स्वामी ध्यान विनय की तरफ जैसे ही उत्साह से देखती हूँ वह तुरंत समझ जाते हैं, लगता है फिर कोई नया आइडिया आया है आपके दिमाग में... तो दिमाग में ये आइडियाज़ तभी आएँगे जब दिमाग तेज़ चलेगा, और दिमाग मेरा आपका और बच्चों का तभी तेज़ चलेगा जब आप दो वक्त की रोटी सही तरीके से खा रहे होंगे. कहते हैं ना जैसा खाएंगे अन्न वैसा रहेगा मन... तो आप जिस क्षेत्र में कम कर रहे हैं उसमें कुछ नए आईडिया कुछ नए ट्विस्ट लाना चाहते हैं तो अपने खाने के तरीके में भी कुछ ट्विस्ट लाइए, फिर देखिये जीवन में कैसे होता है जादू...

सच में इसी दो वक्त की रोटी में ही ये सारा जादू, जिस दिन आप इस जादू को समझ जाएंगे आपके जीवन में अद्भुत परिवर्तन आएगा. इसलिए सबसे पहले अपने बच्चों को सिखाइए इस रोटी का जादू. उन्हें छोटे छोटे जादू पर अचंभित होने दीजिये, तभी वे अस्तित्व के बड़े बड़े जादू के लिए तैयार हो पाएँगे.

आइये अपने बच्चों की खातिर फिर घर लौट चलें...

- माँ जीवन शैफाली

MITTI COOL : घर में लाएं मिट्टी का फ्रिज और बीमारियों को करें विदा

कुछ कर गुज़रने की चाह में उन्होंने कुछ लीक से हटकर सोचा। और 1988 में एक स्थानीय देनदार से 30,000 रूपए उधार लेकर एक छोटा सा व्यवसाय शुरू किया – मिट्टी के तवा / तवड़ी का। उनकी यह नवीन सोच इतनी अधिक सफल रही कि कुछेक दिनों में ही उनके बनाए सारे तवे बिक गए। उनकी फैक्ट्री में एक मशीन लगी थी जिससे 700 तवा प्रतिदिन के दर से उत्पादन होता था। इस मशीन की प्रेरणा उन्हें एक टाइल्स फैक्ट्री के हैंड प्रेस मशीन से मिली जिसके उपयोग से एक ही दिन में कई गुना अधिक उत्पादन करना संभव था जबकि तवों को अगर हाथों द्वारा कुम्हार के चाक पर बनाया जाता तो अधिकतम 100 तवों का निर्माण ही संभव था। अब तो समय और आधुनिकता के साथ इन तवों का नॉन – स्टिक कोटेड मॉडल (तीन साइजों में) भी उपलब्ध है।

सिलसिला चलता रहा और वर्ष 1990 में मनसुखभाई ने अपने कारखाने का रजिट्रेशन करा लिया और कंपनी का नाम दिया “मनसुखभाई राघवभाई प्रजापति”।

इसके बाद भी मनसुखभाई रुके नहीं और इस सफल प्रयोग के बाद 1995 में टेराकोटा के वॉटर फ़िल्टर जिसमें चीनी-मिट्टी के कैंडल लगे हुए होते हैं, भी बनाने लगे। यह विचार और इसकी क्रियान्वयन भी बेहद सफल रही। इसने मार्केट में इतनी जल्दी प्रसिद्धि पाई कि मनसुखभाई इसे पेटेंट भी कराए और यहीं से जन्म हुआ “मिट्टीकूल” (MittiCool) के अद्भुत सफर का... READ MORE

बच्चों को अभी से सिखाइए किसानी के गुर, प्रकृति से प्यार और एक-एक पौधे की कीमत

दो साल पहले परिवार का केरल जाना हुआ था. पापा के दोस्त के यहाँ रहने की व्यवस्था हुई जो वहाँ एक स्कूल में प्रिंसिपल थे. उस स्कूल की सबसे खास बात थी कि वहां हर क्लास के बच्चों के हिस्से ज़मीन का एक टुकड़ा आता था जिसमें उन्हें खेती करनी होती थी. बच्चे अपने-अपने हिस्से का सही प्रयोग करने और अपने खेत को ज्यादा बेहतर बनाने के लिए एड़ी- चोटी का जोर लगाए रखते. मेस में खाने की सब्जियों का एक बड़ा हिस्सा स्कूल के खेत से ही पूरा हो जाता.

आश्चर्यजनक है कि आजकल के स्कूलों में जो तमाम प्रोजेक्ट दिए जाते हैं, बच्चों के मानसिक विकास के नाम पर, उसमें खेती करना नहीं आता. हमारे बच्चे नहीं जानते खुद की मेहनत से उगाई गाजर को सोंधी मिट्टी से खींचने का आनन्द, या ओस में डूबे मटर के पौधे की खूबसूरती. मानसिक विकास के लिये प्रकृति से प्यार करना सीखने से बेहतर क्या हो सकता है? खेतों से बेहतर उन्हें कहाँ मालूम होगा एक-एक पौधे की कीमत?... Read More

 

खो रहा है घास के तिनकों और मिट्टी से इत्र निचोड़ने का हुनर

कानपुर से पश्चिमोत्तर 80 किलोमीटर दूर गंगा किनारे एक शहर जहां खुशबुओं का कारोबार होता है. कन्नौज की नालियों से भी इत्र की खुशबू उठती है.

वक्त का तकाजा है कि आज यह कारोबार धीरे धीरे मर रहा है और वह भी जो घास के तिनकों और मिट्टी से इत्र निचोड़ने का हुनर रखता है.

कहतें हैं एक ज़माने में कन्नौज के कारीगर किसी भी चीज से इत्र निचोड़ने का हुनर जानते थे, किसी भी मतलब किसी भी चीज से.

बारिश का पानी सोखकर धरती गर्भ धारण करती है. आसमान और धरती के इस निषेचन से जन्मी खुशबू चित्त को खुशगवार बनाती है. गंध भावनाओं को प्रभावित करती है और भावनायें व्यवहार को. ये अतीत की यादों में ले जाकर किसी को जला सकती है, वर्तमान के पलों को रूमानियत से भिगो सकती है.

मिट्टी इत्र बनाने के लिये मिट्टी के बर्तनों को स्टीम डिस्टिलेटर में डालकर कोयले की आंच पर तपाया जाता है. वहां से निकली भाप प्रेशर से तांबे के बर्तनों में इकट्ठा होती है. तांबा सोखकर ये भाप चंदन तेल के संपर्क में जाती है.

और फिर यहाँ से जो भाप निकलती है उसमे ऑयल बेस होता है जिसे कंडेन्सर में डालने पर आखिर में जो तरल मिलता है उससे गीली मिट्टी की खुशबू रिसती है.

गीली मिट्टी की खुशबू विचलित मन शांत कर स्थिर बनाती है. कभी मानसिक तौर पर अस्थिर लोगों का उपचार इस मिट्टी इत्र से किया जाता है.

आज परफ्यूम बनाने वाली बड़ी कंपनियां विदेशों में इसे रेन परफ्यूम के नाम से लेबल लगी बोतलों में ऊंची कीमतों पर बेचती हैं. भारत का दुर्भाग्य रहा है यहाँ अपनी परम्परा, संस्कृति, ज्ञान, हुनर की कद्र तब होती है जब कोई विदेशी आकर इसे समेट ले जाता है.

खैर बात चली थी इत्र की... कहाँ से कहाँ चली जाती है..... READ MORE

प्रकृति स्वयं बैठ चुकी है ड्राइविंग सीट पर

प्राचीन काल में, जब सरस्वती नदी बहती थी और अरावली की ऊंचाई, वर्तमान से काफी अधिक थी, सिंधु और सरस्वती के दोआब में ऐसा ही मौसम रहा करता था, तब यह क्षेत्र अत्यंत समृद्ध, उपजाऊ और गोचारण के सर्वाधिक अनुकूल था। प्रसिद्ध डक भडली की भविष्यवाणी में वैशाख की बरसात को मृगों की प्यास बुझाने वाली बताया गया है।

वैशाख में बरसात होना, वरदान और अभिशाप दोनों है। प्रकृति के लिए वरदान और मनुष्य के लिए अभिशाप। इन दिनों कोई खेती नहीं करता, खुली ज़मीन होती है, गाएं जी भर कर चरती हैं, मक्खी मच्छर का प्रकोप भी नहीं होता है और गर्मी शान्त हो जाती है, साथ ही यदि जुलाई में अच्छी बरसात हो गई तो अनेक बहुमूल्य वनौषधियाँ भी उगेंगी, जिनका अस्तित्व बहुत ज़रूरी है।

खैर, राज्य सरकार ने गायों के लिए चारा डिपो इत्यादि से हाथ खड़े कर दिये हैं, भू माफियाओं ने गौचर दाब लिए हैं, किसान अब ऐसी फसलें उगाते हैं जिनका भूसा गायों के लिए उपयुक्त नहीं होता, नगरों में गाय पालना ही अपराध है, ऐसे में उनका बीज बचाने का दायित्व इंद्र भगवान ने संभाल लिया है... READ MORE

गोमय साबुन और शैम्पू : स्वदेशी वस्तु के उपयोग और स्वस्थ जीवन की ओर बढ़ाएं कदम

कहते हैं जब आप में शिष्यत्व भाव प्रबल हो जाता है तो गुरु अपने आप प्रकट होने लगते हैं. मेरी आध्यात्मिक यात्रा में कई गुरुओं का आशीर्वाद व मार्ग दर्शन मुझे प्राप्त हुआ है. ऐसे ही वैद्य राजेश कपूर के दर्शन भी अस्तित्व की योजना अनुसार जादुई रूप से प्राप्त हुए.

वैसे तो दीक्षा लेने की प्रक्रिया होती है लेकिन मुझे लगता है वैद्य राजेश कपूर के जिस दिन प्रथम बार चरणस्पर्श करने का सौभाग्य मिला, उसी दिन मुझे उनसे दीक्षा प्राप्त हो गयी थी. क्योंकि उसके बाद जो जीवन शैली में परिवर्तन आये वे इतने अद्भुत हैं कि मैं स्वयं अचंभित होती हूँ.
मेरे कई वीडियो से आप सब ने जाना होगा कि फरवरी में वैद्य जी से मिलने के बाद पिछले तीन महीनों से मैं और मेरा पूरा परिवार खाना मिट्टी, लोहे और पीतल के बर्तनों में ही पका और खा रहा है. जिससे हम थाइरॉइड, शुगर, बीपी जैसी आम बीमारियों से हमेशा के लिए सुरक्षित हो चुके हैं.

शक्कर की बजाय हम खांड और गुड़ का उपयोग कर रहे हैं. नमक सिर्फ सेंधा और काला ही उपयोग में लाते हैं या फिर बाज़ार से खड़ा नमक लाकर उसे घर में ही हाथ से कूटकर उपयोग करते हैं.

यहाँ तक कि मैंने पिछले तीन महीनों से साबुन और शैम्पू का उपयोग पूरी तरह से बंद कर दिया है. उसकी जगह बालों में आंवला रीठा शिकाकाई और नहाने के लिए गेहूं के आटे का उपयोग करती हूँ. मेरे कई मित्रों और सखियों को भी मैंने इस बात के लिए प्रेरित किया है.

लेकिन कई लोगों के पास इतना समय नहीं होता कि वे आंवला रीठा शिकाकाई लाकर कूटे और फिर उबालकर बालों में लगाए. तो वे कई दिनों से मुझसे ऐसे साबुन और शैम्पू बनाने के लिए अनुरोध कर रहे थे जो इन सब झंझटों से मुक्त करें. और जैसा कि मेरे साथ हमेशा होता है, जब मैं ह्रदय से कोई इच्छा रखती हूँ तो अवश्य पूरी होती है. तो मैं कई दिनों से ऐसे साबुन और शैम्पू की खोज में थी जो गोमय उत्पादों से बना हो, जो न सिर्फ शरीर को साफ़ करे बल्कि एक नई ऊर्जा से आपको भर दे. और इसके अलावा उसकी कीमत भी कम हो.

ऐसे में मुझे ऐसे साबुन और शैम्पू मिल गए जो गोमय उत्पादों से बने हैं यानी गौमूत्र, गोबर, मिट्टी और भस्म से.

पहली बार उपयोग करने के बाद ही मुझे लगा जैसे खज़ाना मिल गया हो...Read More

कुम्हारन के हाथ तो सदैव मिट्टी में सने रहते हैं...

जीवन... तुम बस मिट्टी ही रह जाना, तो पूरे हो सकेंगे सारे सार्थक काज, तुम पात्र बन जाने की अपेक्षा मत रखना, तुम वृक्ष में लगे फल का स्वप्न नहीं देखना, अपने आँचल में लहरा देना धान, गेहूं, सरसों और गन्ना, जीभ की स्वाद कलिकाओं को सारे स्वाद का सौभाग्य देना और पेट को भरे रहने का आशीर्वाद...

तुम पोषण करना मिट्टी से जुड़े संस्कारों को... तुम सूखे की दरारों के साथ बन जाना वर्षा की प्रार्थना, हवन की वेदी बनाने के लिए तुम देना अपना सहयोग ताकि अग्नि देवता को प्रसन्न करने दी जा रही आहुति से उठती सुगंध से प्रकृति की साँसें पवित्र हो... READ MORE

निरोगी जीवन के उपाय : मिट्टी के बर्तन

अच्छा एक बात बताइए आपने कभी सुना है फलाने राजा मधुमेह से मरे, फलाने ऋषि को हाई बीपी था और वो हृदयघात से मरे? या फलानी रानी का थाइरोइड बढ़ा हुआ था इसलिए वह इतनी मोटी थी?

क्या तब मीठा नहीं खाया जाता था? क्या राजभोग और 56 पकवान नहीं बनते थे? बनते थे वो भी शुद्ध घी में… फिर ऐसी कौन सी उनके पास जादुई छड़ी थी कि यह जो आजकल तरह तरह की बीमारियों का हव्वा बना रखा है उस समय उनको नहीं हुई?

पहली बात वो गाय का शुद्ध घी खाते थे, मशीन की बनाई शक्कर नहीं खाते थे, आयोडीन वाला नमक नहीं खाते थे, सब्जियों में कीटनाशक नहीं डलता था, दूसरी बात, बाद में तेल का उपयोग हुआ भी तो तिलहन से बनने लगा, अभी की तरह सोयाबीन, सन फ्लावर और राईस ब्रान का नकली तेल नहीं, शुद्ध सरसों, तिल और मूंगफली का तेल.

हम शुरू से मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाते और खाते आये हैं, बाद में सोना, चांदी, कांसा, लोहे और कलई लगे पीतल के बर्तन भी उपयोग में आये. लेकिन उसके पीछे लम्बे प्रयोग हुआ करते थे, किस धातु से क्या पौषक तत्व मिलेंगे और क्या नुकसान होगा, इसका एक लंबा अनुभव और रिसर्च करने के बाद जीवन में उपयोग में लाया जाने लगा.

लेकिन ऐसी जीवन शैली के लिए समय लगाना होता है. इन बर्तनों को बाइयों के भरोसे झूठे नहीं छोड़ सकते, उन्हें तुरंत मांझ धोकर रखना होता है.

और भी बहुत सारी सावधानियां रखना होती हैं जिसे मैं आगे बता रही हूँ, लेकिन यह उस तकलीफ से कई गुना कम है जो आप तरह तरह की बीमारियाँ पालने में उठाते हैं या डॉक्टर्स की फीस देने में खर्च करते हैं... READ MORE

केले के पत्तों से पाएं स्वस्थ शरीर, घने बाल, सुन्दर त्वचा और बीमारियों से मुक्ति

दक्षिण भारत में तो केले के पत्तों का उपयोग भोजन को लपेटने के लिए तथा भोजन करने के लिए थाली की जगह करते ही हैं। आप भी अपनी थाली में केले के पत्ते बिछाकर भोजन करें। बच्चों को नूडल्स, चावल, इडली या टिफिन में व्यंजनों को इन पत्तों में लपेट कर दें, क्योंकि बच्चे एकदम से नूडल्स वगैरह खाना नहीं छोड़ेंगे तो यह विकल्प काम आएगा।

खासकर वे लोगो जो अभी मिट्टी, ताम्बे या पीतल के बर्तन उपयोग में नहीं ला पा रहे, उनके लिए यह बेहतर विकल्प है। केले के पत्ते न होने पर आप थाली में पलाश के पत्तों को रख सकते हैं जिससे दोने पत्तल बनते हैं। कोशिश करें घर में डिस्पोजेबल प्लास्टिक का उपयोग करने के बजाय पारंपरिक दोने पत्तल का ही उपयोग किया जाए।
ये सारे उपाय उन लोगों के लिए बहत फायदेमंद साबित होंगे जिनको डायबिटीज, ब्लड प्रेशर और थाइरोइड जैसी बीमारियों ने और एलोपैथिक दवाइयों ने अपने चुंगल में फांस रखा है।

ऐसी बहुत सारी जानकारियाँ आप इस वीडियो में देख सकते हैं। मैं ऐसे अन्य उपाय समय समय पर आपको बताती रहूँगी।

आइये लौट चलें फिर घर की ओर यानी भारत की प्राचीन सनातन जीवन शैली की ओर... READ MORE

एक गाँव जो पुकारता है…

परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है, पर आवश्यक नहीं कि सभी परिवर्तन हितकारी ही हों. बदलाव की कुछ बयारें ऐसी होती हैं जो सुकून देती हैं और कुछ जीवन को दूभर बना जाती हैं. मेरा बचपन गाँव में बीता, शहर आने के बाद भी मैं गाँव से सदैव जुड़ा रहा, इसलिए न केवल शहर में होने वाले बदलाव बल्कि ग्राम्य-जीवन में आने वाले बदलावों को भी निकट से देखता-समझता रहा हूँ.

निःसंदेह आज के गाँव भौतिक धरातल पर पहले से अधिक संपन्न हुए हैं, सुख-समृद्धि आई है, लोगों के जीवन-स्तर में व्यापक सुधार हुआ है, आमदनी और खर्च करने की क्षमताएँ बढ़ीं हैं; पर उन्होंने अपनी सहजता, उदारता और परायों को भी अपना बना लेने वाली चिर-परिचित आत्मीयता खो दी है. शहर की आबो-हवा ने वहाँ भी पाँव पसारना-जमाना शुरू कर दिया है. लोगों की खुशियों को किसी की नज़र लग गई है. वे भी शहरी आडंबर एवं चोंचलों के ज़बरदस्त शिकार हुए हैं. उनके तीज-त्योहारों में भी बाज़ार का बाजारूपन प्रविष्ट हुआ है.

इस बार दीपावली के अवसर पर मैंने अपने गाँव के अधिकांश घरों को चीनी झालरों से सजे देखा.सुना था, संपन्नता विकृति लेकर आती है. उसे देख भी लिया. जबकि मुझे याद है कि अपने बचपन में मैं देखता था कि करीब एक महीने पूर्व से ही घर की रँगाई-पुताई शुरू हो जाती थी, कई दिन पूर्व ही दीप और मिट्टी के गोल ढिबरी की तरह के ‘चुक्के’ मंगवाए जाने शुरू हो जाते थे, घर की महिलाएँ मिल-बैठकर दीपों के लिए बाती बनाना शुरू कर देती थीं.

त्योहार से पूर्व उनकी तैयारियाँ एक उत्सवनुमा परिवेश रचती थीं. किसी-न-किसी रीति या मान्यता के बहाने समाज एक-दूसरे के निकट आता था. घर के सभी सदस्य एक साथ मिलकर हुक्का-पाती निकालते थे, जिसमें दरिद्रता को दूर भगाने और लक्ष्मी को आग्रहपूर्वक घर बुलाने का आमंत्रण होता था. आज इन रीतियों के प्रति ग्राम्य-समाज में भी एक उदासीनता देखने को मिलती है. शायद लोग तथाकथित पढ़े-लिखों की नकल करना चाहते हैं.

हाँ, बिहार में छठ अपनी पारंपरिकता के साथ आज भी मौजूद है. पर उसमें भी नाते-रिश्तेदारों, सगे-संबंधियों की पहले जो सहभागिता होती थी, संबंधियों तक प्रसाद-ठेकुआ आदि भेजने का पहले जो चलन था, उसमें कमी आई है. लोग बहुत व्यस्त हुए हैं, उनके पास अपनों के लिए भी शायद समय नहीं बचा है. और इसीलिए गाँव के लोग भी पहले की तुलना में एकाकी और आत्मकेंद्रित हुए हैं.

अब वहाँ प्रेमचंद का वह गाँव नहीं दिखता जहाँ किसी का छप्पर चढ़ाने के लिए बिन बुलाए अनेक लोग भागे चले आते थे; बल्कि उसकी जगह एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए ताक-झाँक बढ़ गया है.

मुझे ध्यान है कि... READ MORE