Menu

बहुरुपिया और प्रतीक्षा का फल



एक ही कथानक पर दो कहानियां! दोनों में समानता और इस हद तक समानता कि शायद एक दूसरे का एक्सटेंशन कही जाए.

हंस पत्रिका के इस अंक में कहानीकार प्रियदर्शन की कहानी ‘प्रतीक्षा का फल’ और जनवरी 2018 से समालोचन ब्लॉग पर उपस्थित कहानीकार राकेश बिहारी की कहानी ‘बहुरूपिया’, दोनों ही कथानक के स्तर पर बहुत ही समानताएं लिए हुए हैं..

दोनों में ही एक लम्पट कवि है, दोनों की कहानियों में एक लड़की है जो छद्म नाम से उस कवि की भावनाओं का रस ले रही है.

राकेश बिहारी की कहानी में स्पष्ट है कि वह बदला है, मगर प्रियदर्शन की कहानी में यह स्पष्ट नहीं है कि वह शरारत किसकी है. दोनों ही कहानियों का अंत एक ही है, कि दोनों ही बहुत बुरी तरह से छल का शिकार होते हैं, दोनों ही उस जाल में खुद फंसते हैं, जो वे लड़कियों के लिए डालते थे.

तुम्हारा दिल या हमारा दिल है…



प्रतीक्षा चिरनिरन्तर है. वह प्रतीक्षा ही कैसी जो विरत हो जाये?

प्रतीक्षा प्रारंभ होती है कभी समाप्त नहीं होने के लिए!

प्रतीक्षा रोती है कलपती है लेकिन थकती नहीं!

प्रतीक्षा मोजड़ी में अनवरत चलने के घाव दे के आह को नित्य नव्य बना देती है!

प्रतीक्षा ऊपरी सतह से समतल राह सी दिखती है लेकिन अंतर में कंकड़-पत्थर के कठोर धरातल को चुनती है.

प्रतीक्षा नीले आकाश में छाए हुए बादलों में विरह की सघन पुरवैया के साथ डोलते हुए लौटते मानसून के साथ आये और आँखों से आँसू बन के बरस पड़े.

प्रतीक्षा मृत्यु और जीवन से अलग-थलग जीती है. लेकिन अपनेआप में स्वयं के एकली होने का बोध नहीं कराती. इसलिये नहीं उसमें यह सामर्थ्य नहीं...

मैं दीपक… तुम ज्योति…



दीपक अंधेरे में बैठता है… ज्योति ढिंढोरा पीट आती है दूर तलक…… कि वहाँ कोने में, अंधेरे में दीपक रखा है. जैसे चाँद सुन्दर इसलिये है कि चाँदनी खबर लाती है.

दीपक को व्याकरण ने ‘पुल्लिंग’ रखा है, ज्योति को ‘स्त्रीलिंग’. वैसे ही चाँद भी ‘पुल्लिंग’ की कतार में खड़ा होता है पर चाँदनी ….. ‘स्त्रीलिंग’ की कतार में.

पुरुष हमेशा गौण है और उसकी स्त्री हमेशा मुखर. “स्त्री” जो उस “पुरुष” से ही आ रही है. संसार से संवाद है मेरी “स्त्री” जिसका बीज मुझ (पुरुष) में ही है. “अभिव्यक्ति” है स्त्री, पुरुष है “मौन”.

मजाक की सीरियसनेस ठीक वैसे ही है, जैसे मौन की आवाज. जीवन की छोटी छोटी बातें बहुत बडा संदेश देती हैं.