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अंगरेज़ का रंगरेज़ हो जाना




अंगरेज़…. कहने लगा मैं आप पर एक कहानी लिखूंगा…

मेरी कहानी का पात्र… मेरी ही कहानी में प्रकट होकर कह रहा मैं उस रचयिता पर कहानी लिखूंगा जिसने मुझे रचा है…

दो कहानियां एक दूसरे में उलझ रही थीं… जैसे कल्पवृक्ष पर चढ़ती दो बेलें… अपनी अपनी कामनाएं दर्ज करती हुईं…

तुम्हारी जुल्फों के पेंच में अपनी कुछ साँसे उलझाना चाहता हूँ….

तुम्हारी गर्दन के तिल को अपने होठों पर रख लेना चाहती हूँ…

अपनी सुरमई आँखों में उतर जाने दो… अंगरेज़ से रंगरेज़ हो जाना चाहता हूँ…

तुमसे ही तो मेरी कहानियों में रंगीनियाँ आई हैं वरना आजतक यही गाती रही…

दिल की तस्सली के लिये, झूठी चमक झूठा निखार
जीवन तो सूना ही रहा, सब समझे आयी बहार
कलियों से कोई पूछता, हंसती हैं या रोती हैं
ऐसी भी बातें होती हैं….

लेकिन मैं आज यह कह सकती हूँ अब जीवन में ठहराव पाया है, तुम्हारे दो शब्दों के बीच ठहरने के लिए अब मुझे अपनी आती जाती दो साँसों के बीच ठहरना पड़ता है. उन ठहरे हुए पलों से ही मैंने अपने हृदय में एक पीड़ा का महल बनाया है. मैं उस महल की रानी हूँ… मेरे साम्राज्य में अब कोई संवाद नहीं करता… संवाद की उत्कंठा की पराकाष्ठा पर आकर ही मेरे मौन की परियां सोती हैं…

यह मौन आपका अपना निर्णय हैं वर्ना मैंने तो पहले ही दिन कह दिया था कि मुझे प्रेम है आपसे…

और क्या मैं अपने पात्र से बिना प्रेम किये उस पर कहानियाँ लिख सकती हूँ… लेकिन बस जैसे सबसे कहती हूँ वैसे कहना नहीं चाहती, और जैसे मुझे कहना है वैसे कहने के लिए किस्मत मौका नहीं देगी…

क़िस्मत को दोष मत दीजिए वो तो ख़ूब ज़ोर मार रही है. सारे बंधन तो हमारे अपने हैं जो रोक रहे हैं …..वैसे मेरी तरफ़ की कायनात तो पूरी शिद्दत से लगी हुयी है प्रकट होने के लिए, आपकी कायनात को आपसे ही सपोर्ट नहीं मिल रहा…

किस्मत से लड़ते हुए पाने की कोशिश में खो देने के बजाय जितना मिल रहा उतना ही संजो के रख लेना चाहती हूँ अब…. और फिर आपकी कायनात जो शिद्दत से लगी ही है, हो सकता है वही जीत जाए…

हाँ मेरी वाली कायनात बहुत स्ट्रोंग है…

मेरी वाली तो बस तटस्थ है… बस देख रही हूँ फिल्म की कहानी की तरह… सस्पेंस फिल्म… अगले सीन में क्या होने वाला है यह पहले पता चल जाए तो रोमांच ख़त्म हो जाता है…

देखती रहिए ….इस फ़िल्म में सारे मसाले मिलेंगे…

हाँ हॉलीवुड का हीरो भी है इसमें… कहते हुए मैं हंस दी… कुछ कामनाएं और जोड़ ली… कहने लगी- कभी सच में प्रकट हुए तो कैसे दिखोगे… मेरी कल्पनाओं ने तुम्हें जो रूप दिया है वह तो बड़ा अलग है छोटे बाल और लम्बी दाढ़ी…

उसने तुरंत कहा – …और हाथ में सिगरेट
oh yesssssssss i just love it लेकिन तुम्हें कैसे पता चला?… Read More

आज की नायिका: आत्महत्या की हार से जीवन को जीतनेवाली पद्मश्री कल्पना सरोज




कल्पना सरोज का जन्म महाराष्ट्र के एक कस्बे मुर्तजापुर में हुआ था. कल्पना एक दलित परिवार में जन्मी थीं. उनके पिता पुलिस में कांस्टेबल थे. पांच भाई बहनों में कल्पना सबसे बड़ी थीं.

कांस्टेबल पिता शिक्षा के महत्व को समझते थे, उन्होंने कल्पना को एक सरकारी स्कूल में भर्ती कराया. लेकिन कल्पना दलित थीं. स्कूल में उन्हें बाकी बच्चों के साथ नहीं बैठने दिया जाता था. भेदभाव और लगातार अपमान का शिकार होकर मात्र 10 साल की उम्र में सातवीं कक्षा में उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा.

दो साल बाद समाज के प्रेशर में उनके पिता को उनकी शादी करनी पड़ी. 12 साल की उम्र में कल्पना विवाह करके जिस घर में पहुंची, वहां दस लोग थे. उन्हें घर के सारे काम करने होते थे. खाना बनाना, साफ़ सफाई. लेकिन जरा सी गलती पर बेहद मार पड़ती. वो वहां पारिवारिक सदस्य नहीं गुलाम थीं. जब छह महीने बाद उनके पिता उनसे मिलने घर आये तो उन्होंने पाया कि उनकी लड़की एक चलती फिरती लाश में बदल चुकी है.

कुछेक साल बाद अंत में उनके पिता को उन्हें मायके वापस लाना पड़ा. वो चाहते थे कल्पना दुबारा शिक्षा ग्रहण करें. लेकिन पास पड़ोस की छींटाकशी, तानेबाजी प्रताड़ना में कल्पना को स्कूल जाने नहीं दिया. लेकिन कल्पना ने सिलाई का काम जरूर सीखना शुरू कर दिया. एक वैवाहिक महिला अपने मायके में रहते हुए बोझ और शर्म का कारण मानी जाती है. लगातार तानाकशी जिसमें मुख्य सलाह मर जाने की होती, ने कल्पना को विवश किया कि वो एक दिन जहर से भरी शीशी पी लें.

सौभाग्य से उनकी ऑन्टी ने उन्हें जहर पीते देखा और फिर उन्हें अस्पताल ले जाया गया. जहाँ डाक्टरों ने कहा उनका बचना चमत्कार ही होगा. अगर 24 घंटे में होश आ गया तो बचने की सम्भावना है. जब कल्पना ने अपनी आँखें खोली तो वो एक बदल चुकी इंसान थी. एक दृढ़ निश्चयी महिला जो अब मरने को नहीं लड़ने को तैयार थीं.

कल्पना मुंबई चली गयीं. अपने के चाचा के पास मुंबई के स्लम में उन्हें शरण मिली. कल्पना ने सिलाई सीखी हुई थी. उन्होंने दरजी का काम शुरू किया. दुर्भाग्यवश उनके पिता की नौकरी जाती रही. और कल्पना अपने परिवार की एकमात्र कमाने वाली सदस्य थीं. उन्होंने स्लम में ही एक कमरा किराये पर लिया, अपने पूरे परिवार को मुंबई बुलाया. अब पूरा परिवार सिलाई करके पेट पाल रहा था.

इसी बीच कल्पना की सबसे छोटी बहन बीमार पड़ी, और पैसे के अभाव में… Read More

मैं और मेरी किताबें अक्सर ये बातें करते हैं :
वर्जित बाग़ की गाथा




ये समीक्षा नहीं है, सचमुच समीक्षा नहीं है. समीक्षा तो पुस्तक की होती है, जीवित गाथाओं की नहीं. अच्छा बुरा पहलू तो लिखे हुए हरूफ़ का देखा जाता है, उन हरूफ़ का नहीं, जो रूह बनकर गाथाओं के शरीर में बसते हों. कुछ हर्फ आँखों से गुजरकर चेतना बनकर हमारे अचेतन मन में ज़िंदा रहते हैं, जैसे इन गाथाओं के वर्जित करार दिए गए चरित्र ज़िंदा है.

यदि ज़िंदगी को किसी इंसानी रिश्ते का नाम दिया जाए, तो आपको कौन-सा रिश्ता सबसे ज्यादा ज़िंदा लगता है? इस सवाल का जवाब इस पुस्तक में अमृता प्रीतम के शब्दों में मिलता है आशिक़ और दरवेश मन की एक ही अवस्था का नाम है, एक ही क्रांति का नाम है, जिसने उस तलब के कई क़दम उठा लिए होते हैं, मदहोशी से होशमन्दी की ओर उठाए क़दम जो बदन की सीमा से गुज़रकर असीम की ओर जाते हुए राह की होशमन्दी होते हैं.

खुद अमृता प्रीतम द्वारा लिखित वर्जित बाग़ की गाथा को लेकर कुछ हर्फ को पढ़ लिया जाए तो इस पुस्तक में समाहित बाकी 22 गाथाओं के उलझे धागों के सिरे इसी भूमिका पर आकर खुलेंगे. जिसकी शुरुआत होती है छठा तत्व (सुधांशु द्वारा लिखी गाथा) से, फिर सपनों के बीज (जसबीर भुल्ला की गाथा) की सुगंधित नज़्म से होते हुए आप प्रेतनी (प्रबोध कुमार सान्याल की गाथा) तक पहुँचते हैं तब तक वर्जित शब्द के मायने बदल चुके होते हैं, जो कन्यादान (राजेश चन्द्रा की गाथा) तक पहुँचते-पहुँचते सुपरनेचुरालिज़्म तक आ जाते हैं, जिसे यदि अलौकिक कहेंगे तो बाकि सारी गाथाओं के साथ नाइंसाफी होगी, क्योंकि आपको बाकी सारी गाथाओं में हर भावना अलौकिक ही नज़र आएँगी, जिसका सुरूर ऋत आए ऋत जाए (देविन्दर द्वारा लिखित गाथा) तक बना रहता है.

यदि यहाँ इन सारी 22 गाथाओं को कोई समझने या समझाने का प्रयास करें, तो ऐसी और 22 पुस्तकों की रचना हो सकती है.

कुछ विचार, कुछ लोग और कुछ रिश्ते दुनियावी तौर पर वर्जित क़रार दिए जाते हैं, लेकिन कायनाती तौर पर ख़ुदाई रोशनी को धारण किए हुए होते हैं.

इस पुस्तक के हरूफ़ ने यदि आपके हृदय के वर्जित स्थान पर बिना आपके अनुमति के अतिक्रमण नहीं किया, तो समझिएगा आप अमृता प्रीतम के उस वर्जित क़रार दी गई ऊँचाई पर नहीं पहुँच पाए हैं, जहाँ तक सबसे पहले वें पहुँची हैं और आदम और हव्वा के हर गुनाह को अपने नाम कर उन्हें दोषमुक्त किया है
सूरज देवता दरवाज़े पर आ गया

किसी किरण ने .… Read More

लक्ष्मी और दुर्गा का ब्रह्माण्डीय नृत्य




संसार में भाषा का आविष्कार करने वाले कौन हैं ये तो मैं नहीं जानती लेकिन इतना मैं यकीन से कह सकती हूँ कि आविष्कार के बाद इसका सबसे अधिक उपयोग और उस पर प्रयोग लड़कियों ने किया होगा…

बातें करती हुई लड़कियों को कभी ध्यान से देखा है? उनका सारा संसार उनके संवाद की डोर पर आ बैठता है और वो उस डोर पर रस्सीकूद खेलती हुई न जाने कितने विषयों को अपने आसपास उछाल देती हैं…

उन सांसारिक विषयों से ही उनके आसपास एक ऐसा आभामंडल तैयार हो जाता है जिसमें प्रवेश करने को देवता भी तरसते होंगे… विषय को विकार समझ कर देवताओं के गीत गाने वाले क्या जाने आखिर मुक्ति के लिए देवताओं को भी तो इसी मनुष्य रूप में ही तो आना है ना…

वैसे बातें कोई बहुत बड़े विषयों पर नहीं होती, लेकिन उनके छोटे-छोटे अनुभव ही उनके लिए विराट संसार होते हैं…

हम दोनों वही दो बातें करती हुईं लड़कियाँ हैं… जिनके आसपास का संसार हमारे पांवों की थाप पर नृत्य करता है, जिसकी तरंगे इतनी ऊंची जाती हैं कि न जाने कितनी ही योगिनियाँ अपने ग्रह छोड़कर हमारे सामने अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होकर साथ में नृत्य करने लगती हैं…

मैं उम्र में और कदाचित अनुभवों में भी उससे बड़ी हूँ… मैंने योगिनियों के अनगिनत स्वरूपों को अपने आसपास नृत्य करते देखा है… उसका रोद्र रूप भी और उसकी परम करुणा भी… लेकिन वह अभी अपने आध्यात्मिक अनुभवों से गुज़र रही है… शक्ति के सारे स्वरूप के दर्शन के अनुभवों को भोगते हुए अपने आत्मिक बल ध्यान और साधना से चेतना को उच्च से उच्चतर आयामों में प्रवेश करवाना सीख रही है…

छोटी है तो कभी कभी भयभीत भी हो जाती है… तो दौड़ी चली आती है मेरे पास… लेकिन वह आज भी मुझसे इस बात के लिए नाराज़ है आप पिछली दीपावली पर आपके नगर आने पर भी मुझे मिली नहीं, मेरे प्रश्न का उत्तर देना तो दूर पूरा प्रश्न सुना तक नहीं…

मैं जवाब देना चाहती हूँ कि योगिनियों के… Read More

जिसने गोधन पाया वही स्वास्थ्य से धनवान कहलाया




गोमूत्र का उपयोग खेत में कीटनाशक बनाने के लिए उपयोग करते हैं और अब मानव जगत के कल्याण के लिए औषधियाँ बनाना शुरू कर दिए हैं। मानव जगत में ऐसी कोई बीमारी नहीं जो गोमूत्र से ठीक नहीं होती, वायरस को खत्म कर देता है गोमूत्र, चाहे कैसा भी वायरस हो, कितना भी खतरनाक वायरस हो, सब वायरस खत्म कर देता है, रक्त शुद्धिकरण के लिए गोमूत्र का उपयोग किया जाता है, कोई अंग जैसे किडनी, स्टमक, लिवर खराब हो रहा हो तो उसके लिए गोमूत्र दिया जाता है, शरीर मे खुजली हो रही हो या अन्य त्वचा रोग हुआ हो उसके लिए गोमूत्र का उपयोग किया जाता है, सर्दी बुखार नहीं होता है।

गोमूत्र से कैंसर भी इसलिए ठीक होता है क्योंकि गोमूत्र डेड सेल को शरीर से बाहर निकाल देता है। ये काम नेचुरल रूप से स्प्लीन करता है लेकिन यूरिया इतना ज्यादा मात्रा में जाता है कि पूरा डेड सेल स्प्लीन संभाल नहीं पाता।.… Read More

जापान लव इन टोक्यो : हिंदुस्तानी दिल का जापान भ्रमण




मार्च 2015 की एक रात 9 बजे प्लेन टोक्यो के नरिटा एयरपोर्ट पे लैंड किया. 20 मिनट में इम्मीग्रेशन, बैगेज और कस्टम्स से बाहर. इम्मीग्रेशन अफसर ने वीज़ा पे एक मोहर लगाई और एक बड़ा सा स्टैम्प चिपकाया. थोड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि विकसित देशों में सिर्फ आगमन की मोहर लगाई जाती है.

टोक्यो के लिए स्काई ट्रैन का टिकट और मेट्रो का तीन दिन का पास तीन व्यक्तियों के लिए लगभग 100 डॉलर का था. पूरा पैसा कॅश देना पड़ा क्योकि वे क्रेडिट कार्ड नहीं स्वीकार करते. यह था दूसरा आश्चर्य क्योंकि अमेरिका और यूरोप में तो एक डॉलर या यूरो भी क्रेडिट कार्ड से पे कर सकते है.

खैर 80 मिनट बाद होटल पहुँच गए. रूम में जब टॉयलेट गए तो तीसरा आश्चर्य. टॉयलेट पूरी तरह से स्वचालित.

अब मैं थोड़ी सी टॉयलेट की बात करूँगा; इसके लिए क्षमायाचना..… Read More

कृष्ण :
विरह का
अनंत अनुराग




बरसों पहले देखा एक तैलचित्र अब तक मेरी स्मृति में सो रहा है । भगवान कृष्ण का वह चित्र महाभारत युद्ध के बाद का था, संभवत: राजा रवि वर्मा का बनाया हुआ । बात चूंकि बहुत पुरानी हो चुकी है इसलिए पक्के तौर पर नहीं कह सकता । चित्र अपनी गरिमा और गुणधर्म में रवि वर्मा की कला से मिलता जुलता था ।

रणभूमि में हजारों शवों के बीच कृष्ण अकेले खड़े हैं और सीने पर हाथ रख कर स्तंभित देख रहे हैं । भाव यह कि अरे यह मैंने क्या कर दिया ! अथवा इस महाविध्वंस को रोका जा सकता था। वह दृष्टि चित्रकार की अपनी थी। निश्चय ही चित्र को बनाते हुए गांधारी और कृष्ण के संवाद उसके मन में कौंधे होंगे। जब शोकसंतप्त गांधारी कृष्ण को शाप देने को उद्यत होती हैं और वे कहते हैं कि माता हर बार मैं ही तो मरा हूं! हर घाव मेरा ही है!! हर रिसती हुई आत्मा का अंश मैं ही हूं !!! क्या तुम्हारे पुत्र और क्या पांडवों के पुत्र और क्या जन सामान्य?..… Read More